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अधूरी जातिगत जनगणना: आँकड़ा नहीं, भ्रम
यदि जातिगत जनगणना में केवल यह गिन लिया जाए कि किस जाति की कितनी संख्या है, तो वह मात्र सांख्यिकीय जानकारी होगी, सामाजिक यथार्थ नहीं।
आज़ाद कलम
लेख, टिप्पणियाँ और पुस्तकों से उपजे विचार—65 लेख। पढ़िए, सोचिए, और सवाल कीजिए।
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यदि जातिगत जनगणना में केवल यह गिन लिया जाए कि किस जाति की कितनी संख्या है, तो वह मात्र सांख्यिकीय जानकारी होगी, सामाजिक यथार्थ नहीं।
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आज़ाद कलम किसी विचारधारा या पक्ष का प्रचार नहीं, बल्कि सवाल, विचार और संवाद की जगह है।
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तथागत बुद्ध केवल संन्यास के उपदेशक नहीं थे; उन्होंने दीघ निकाय के 'सिगालोवाद सुत्त' में गृहस्थों के लिए धन कमाने, निवेश करने और मजदूरों के अधिकारों का ऐसा अचूक फॉर्मूला दिया जो आज के अंधे कॉर्पोरेट लालच का एकमात्र इलाज है।
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2600 वर्ष पूर्व जब प्राचीन समाज में स्त्री को केवल भोग और दासी की वस्तु माना जाता था, तब तथागत बुद्ध ने पितृसत्ता की बेड़ियों को तोड़कर 'भिक्षुणी संघ' की स्थापना की। थेरीगाथा और नारी गरिमा का अमर इतिहास।
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मुंशी प्रेमचंद के गोदान के 'होरी' से लेकर बिमल रॉय की 'दो बीघा ज़मीन' और महबूब खान की 'मदर इंडिया' तक — हमारे साहित्य और कला ने किसान की जिस बेबसी और स्वाभिमान को अमर किया, क्या आज़ाद भारत ने उसे भुला दिया?
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जिस हरित क्रांति ने देश को भुखमरी से बचाया, आज उसी ने हमारी धरती को बंजर और पानी को जहरीला बना दिया। बठिंडा से बीकानेर जाने वाली 'कैंसर एक्सप्रेस' का वह भयानक सच जो पूरे देश के लिए चेतावनी है।
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खेतों को जोड़ने के लिए आई चकबंदी गाँव के लेखपालों और अफसरों की सबसे बड़ी काली कमाई का अड्डा कैसे बन गई? दो फीट मेड़ के लिए भाइयों का कत्ल और अदालतों में पचास साल से लटके मुकदमों की खौफनाक दास्तान।
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खेत में पसीना बहाने वाला असली किसान (बटाईदार) न सरकारी खरीद में फसल बेच सकता है, न उसे कर्ज़ मिलता है, न मुआवजा। ज़मीन का मालिक शहर में बैठकर सरकारी योजनाएं डकारता है और बटाईदार फांसी पर झूलता है।
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चुनाव आयोग, सीबीआई, ईडी, सीवीसी और न्यायपालिका — जब लोकतंत्र के इन पहरेदारों पर सत्ता का रिमोट कंट्रोल चलने लगे, तो निष्पक्ष चुनाव और संविधान की रक्षा कौन करेगा?
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दक्षिण भारत ने जनसंख्या रोकी, शिक्षा और स्वास्थ्य में अव्वल रहा; उत्तर भारत की आबादी बेलगाम बढ़ी। क्या 2026 के परिसीमन में दक्षिण को उसके अच्छे काम की सजा मिलेगी और उत्तर को आबादी बढ़ाने का इनाम?
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चार वर्णों से चार हज़ार जातियां कैसे बन गईं? क्या जाति भगवान ने बनाई थी या यह सत्ता, विवाह-नियमों और अंग्रेजों के औपनिवेशिक षड्यंत्र से उपजी एक ऐतिहासिक विकृति है?
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जिस संविधान में 75 वर्षों में 106 से अधिक बार संशोधन करने पड़े हों, क्या वह आज की 21वीं सदी की चुनौतियों से निपटने में पूरी तरह सक्षम है? संविधान के पुनरावलोकन का साहसिक और तार्किक विमर्श।
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जब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, तब विदेशी खुफिया एजेंसियां, अंतरराष्ट्रीय एनजीओ और रेटिंग सिंडिकेट भारत में जातिगत व धार्मिक दरारों को क्यों हवा दे रहे हैं?
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लोकतंत्र (Democracy) का मतलब केवल वोट गिनना और बहुमत की सरकार बनाना है; लेकिन गणतंत्र (Republic) का मतलब है कि संविधान और कानून सबसे कमज़ोर व्यक्ति की भी रक्षा करे। क्या हम गणतंत्र से फिसलकर 'मॉबोक्रेसी' बन रहे हैं?
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जयप्रकाश नारायण के एक आह्वान पर लाखों छात्रों ने पढ़ाई छोड़ दी, इंदिरा गांधी की सत्ता हिल गई और जनता पार्टी की सरकार बनी। लेकिन दो साल में ही यह आंदोलन आपस की सिरफुटौव्वल में क्यों खत्म हो गया?
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किसने भारत की नींव रखी और किसने संस्थाओं को खोखला किया? नेहरू का समाजवाद, शास्त्री का नैतिक साहस, इंदिरा की तानाशाही और वाजपेयी के गठबंधन की लाचारी का एक वस्तुनिष्ठ ऐतिहासिक मूल्यांकन।
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संविधान के अनुच्छेद 1 में लिखा 'इंडिया दैट इज़ भारत' आज राजनीतिक दंगल का अखाड़ा बन चुका है। क्या 'इंडिया' केवल औपनिवेशिक प्रशासनिक लेबल है और 'भारत' हमारी आत्मिक चेतना?
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सदियों के निर्वासन के बाद दीक्षाभूमि नागपुर में लाखों शोषितों ने धम्म की शरण ली। 'नवायण' के रूप में बुद्ध का पुनर्जन्म — समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की अमर प्रतिज्ञा।
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छह महीनों तक धधकते रहे पुस्तकालय 'धर्मगंज' की राख में केवल ताड़पत्र नहीं जले, बल्कि भारत का वैज्ञानिक चिंतन, दर्शन और वैश्विक गौरव स्वाहा हो गया।
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जब बुद्ध के तार्किक और समतावादी विचारों को तर्क से परास्त न किया जा सका, तो उन्हें विष्णु का नौवां अवतार बनाकर उनकी सामाजिक क्रांति को कैसे बेअसर कर दिया गया?
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जिस धरती पर तथागत ने 45 वर्षों तक करुणा और प्रज्ञा की वर्षा की, वहीं से उनका धम्म कैसे निर्वासित हुआ? संघ की आंतरिक दुर्बलताओं और रूढ़िवादी षड्यंत्रों की पड़ताल।
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न जटाहि न गोत्तेन न जच्चा होति ब्राह्मणो: बुद्ध ने जन्मजात श्रेष्ठता के अहंकार को तोड़कर मानवीय शील, त्याग और सत्य को सच्चा ब्राह्मणत्व घोषित किया।
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हवन कुंड में घी-अन्न स्वाहा करने और मूक पशुओं के रक्त से ईश्वर को प्रसन्न करने की चेष्टा पर तथागत का क्रांतिकारी संदेश: सौ वर्षों का यज्ञ बनाम एक क्षण का आत्म-शोधन।
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धम्मपद की पांचवीं गाथा आज के ध्रुवीकृत, हिंसक और सोशल मीडिया की ट्रोल-संस्कृति के लिए सबसे अचूक दवा है। जानिए प्रतिशोध के चक्रव्यूह से बाहर निकलने का बुद्ध सूत्र।
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धम्मपद की पहली ही गाथा संसार के सारे कर्मकाण्डों को ध्वस्त कर मानसिक विज्ञान की नींव रखती है। जानिए कैसे आपका मन ही आपका सबसे बड़ा शत्रु और सबसे बड़ा मित्र है।
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खूंखार हत्यारा उंगलीमाल जब भिक्षु बना और वैशाली की सबसे सुंदर नगरवधू आम्रपाली जब संघ की शिष्या बनी—जानिए कैसे तथागत ने अपराधियों और बहिष्कृतों को गले लगाकर समाज बदला।
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वजी संघ और लिच्छवि गणराज्य की संसदीय प्रणाली को बुद्ध ने बौद्ध संघ की रीढ़ बनाया। जानिए भारत में लोकतंत्र केवल पश्चिम की देन नहीं, बल्कि तथागत की प्राचीन विरासत है।
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कठोर काया-क्लेश और सांसारिक विलासिता—दोनों चरम अतियों को नकार कर भगवान बुद्ध ने सारनाथ की धरती से संतुलन का जो सूत्र दिया, वह आज के तनावग्रस्त इंसान के लिए सबसे बड़ी औषधि है।
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राजमहल के अकूत वैभव, सुंदर पत्नी और नवजात शिशु को छोड़कर आधी रात में निकल पड़ने का वास्तविक अर्थ क्या था? बुद्ध के गृहत्याग का एक अनूठा और क्रांतिकारी दृष्टिकोण।
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लॉर्ड मैकाले की बनाई क्लर्क बनाने वाली शिक्षा नीति ने गाँव के बच्चे को यह सिखा दिया कि खेत में पसीना बहाना शर्म की बात है। जानिए शिक्षा और कृषि के इस आत्मघाती अलगाव का सच।
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महात्मा गांधी ने कहा था कि यदि गाँव नष्ट हो गए तो भारत नष्ट हो जाएगा। जानिए आधुनिक अनियंत्रित शहरीकरण की दौड़ में हमने बापू के स्वावलंबी गाँव के सपने को कैसे दफन कर दिया।
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जिसके पुरखों ने जंगलों को काटकर बंजर धरती को उपजाऊ खेत बनाया, आज उसी की औलाद उसी खेत के पास ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करने पर मजबूर है। जानिए ग्रामीण सर्वहाराकरण का सच।
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पीढ़ी-दर-पीढ़ी बंटवारे के बाद आज 86% भारतीय किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम ज़मीन बची है। जानिए कैसे खंडित खेत आधुनिक तकनीक और आजीविका दोनों के लिए चुनौती बन गए हैं।
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उपभोक्ता अपनी थाली के लिए महंगाई से त्राहि-त्राहि करता है और खेत में किसान अपनी उपज फेंकने पर मजबूर होता है—जानिए बीच के 90% मुनाफे को कौन निगल रहा है।
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जब खेती में लागत भी न निकले और सम्मान भी छिन जाए, तो गाँव से पलायन विकास नहीं, बल्कि सभ्यता का उजड़ना है। जानिए क्यों आज कोई पिता अपने बेटे को किसान नहीं बनाना चाहता।
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जब उपजाऊ तीन-फसली खेतों पर कंक्रीट के जंगल और एक्सप्रेसवे खड़े किए जाते हैं, तो किसान केवल अपनी ज़मीन नहीं खोता, आने वाली पीढ़ियों की रोटी भी खो देता है।
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नेहरूवियन भारी उद्योग मॉडल से लेकर नीति आयोग तक—जानिए कैसे भारत की विकास योजनाओं ने कृषि को केवल सस्ते कच्चे माल की खदान समझकर बर्बाद किया।
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अकबर की ज़ब्ती प्रणाली से लेकर लॉर्ड कॉर्नवालिस के स्थायी बंदोबस्त तक—जानिए कैसे भारत की सामुदायिक उपजाऊ धरती को लगान वसूलने की जागीर बना दिया गया।
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अंग्रेज़ों के तिनकठिया कानून से लेकर आधुनिक कॉरपोरेट मंडी कानूनों तक—जानिए क्यों हर दौर की सत्ता किसान के संघर्ष को कुचलने और बदनाम करने का प्रयास करती है।
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अगर बीमार व्यक्ति का दिन-रात वजन और बुखार ही नापते रहें, लेकिन उसे न खाना दें न दवा, तो क्या वह ताकतवर बन पाएगा? केवल जातियों को गिनने से नहीं, समृद्धि के इस असली रास्ते से बनेगा भारत महान।
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हर पार्टी अपनी सुविधा के हिसाब से किसी न किसी महापुरुष का पोस्टर टांग लेती है। लेकिन क्या हमने पूछा कि अम्बेडकर का बंधुत्व, भगत सिंह का समाजवाद और सावरकर का राष्ट्र-मॉडल वास्तव में क्या था?
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मुंशी प्रेमचंद का होरी आज भी मरा नहीं है; वह आज भी कर्ज़ की पोटली सिर पर बांधे बीज और खाद की कतार में धूप में खड़ा है। साहित्य और सिनेमा के आईने में किसान की अनकही व्यथा।
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गाड़ी चलाने वाला ड्राइवर अगर सिर्फ पीछे देखने वाले शीशे (Rear-view Mirror) में देखता रहेगा, तो गाड़ी का एक्सीडेंट होना तय है। हमारे नेता 400 साल पुराने मुगलों पर भाषण क्यों देते हैं, आज के अस्पतालों और नौकरियों पर क्यों नहीं?
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जो ज़मीन जोतता है वह किसान है या जिसके नाम खतौनी का पन्ना दर्ज है? जब तक इस सवाल का हल नहीं होगा, नीतियां कागज़ों पर ही दम तोड़ेंगी।
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यरवदा जेल में गांधी जी का आमरण अनशन और 1932 में बाबासाहेब का बेमन से किया गया समझौता — क्या आरक्षित सीटों के आज के सांसद सचमुच अपने समाज की आवाज़ उठा पाते हैं?
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जिस गोली की लागत मात्र ₹2 होती है, उस पर ₹100 का एमआरपी क्यों छपता है? सरकारी अस्पतालों की बर्बादी और प्राइवेट मेडिकल माफिया का वह गठजोड़ जिसने गरीबों को बर्बाद कर दिया।
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माइनस 40 डिग्री तापमान में 35 हज़ार कमाने वाला एक गरीब किसान का बेटा सीमा पर पहरा देता है, और टैक्स चोरी करके सेवन-स्टार होटलों में पार्टियां करने वाले खुद को देश का मालिक बताते हैं।
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कार बनाने वाला कार की कीमत खुद तय करता है, लेकिन 140 करोड़ लोगों का पेट भरने वाला किसान अपनी फसल की कीमत खुद तय नहीं कर सकता। मंडी से लेकर संसद तक की कड़वी सच्चाई।
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इतिहास बताता है कि मुगलों और अंग्रेजों ने 'सोने की चिड़िया' भारत को लूटा। लेकिन आज़ादी के बाद उद्योगपतियों और नेताओं की मिलीभगत से जो लूट चल रही है, उसका सच क्या है?
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संसद में बैठकर देश के भविष्य का फैसला करने वाले नेताओं ने क्या कभी सीमा पर गोली की आवाज सुनी है? एन. सिंह का वह क्रांतिकारी विचार जो राजनीति से दलालों और अवसरवादियों का सफाया कर सकता है।
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जिस नेता को आप धूप और पसीने में लाइन लगाकर चुनते हैं, वह बाद में फाइव स्टार होटलों में स्विमिंग पूल किनारे मौज करता और करोड़ों में बिकता दिखाई देता है। लोकतंत्र सेवा है या सबसे बड़ा धंधा?
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कभी गाँव में किसी एक के घर दुख आता था, तो पूरा गाँव दौड़ा चला आता था। आज पंचायत के चुनावों ने एक ही कुएं और एक ही चौपाल पर बैठने वाले पड़ोसियों को जानी दुश्मन बना दिया है।
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होटल में आप पैसे देते हैं, रुकते हैं और मौज करते हैं — होटल को बचाना आपकी जिम्मेदारी नहीं होती। लेकिन अपने घर के लिए आप जान भी दे सकते हैं। क्या हम भारत को सिर्फ एक होटल समझ रहे हैं?
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सोशल मीडिया पर इस बात पर तालियां बटोरना बहुत आसान है कि चाय कौन बनाएगा और बर्तन कौन धोएगा। लेकिन क्या घर और समाज में औरत को उसके हिस्से का सम्मान, संपत्ति और फैसले लेने का हक मिल रहा है?
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संसद में तालियों की गड़गड़ाहट के साथ महिला आरक्षण बिल तो पास हो गया, लेकिन उसके साथ जोड़ी गई दो शर्तों ने इस वादे को सालों के लिए अधर में लटका दिया। परिसीमन और जनगणना का पूरा सच।
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महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी और दलित महिलाओं के अलग कोटे की मांग उठ रही है। यह मांग सुनने में न्यायसंगत लगती है, लेकिन ज़मीन पर क्या होगा? क्या इससे झोपड़ी में रहने वाली सबसे गरीब महिला के चूल्हे की आग बदलेगी?
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गाँव में जब महिला प्रधान बनती है, तो कुर्सी पर उसका पति बैठता है। संसद में 33% आरक्षण आने के बाद क्या हमें 'सांसद-पति' और 'विधायक-पति' का नया कल्चर देखने को नहीं मिलेगा — आवाज़ किसी और की, दिमाग किसी और का?
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गाँवों में जिनके पास पहले से पक्के मकान और ज़मीनें हैं, वे रिश्वत देकर सरकारी आवास और पट्टे हथिया लेते हैं; जबकि प्लास्टिक की पन्नी तानकर सोने वाला बेसहारा परिवार कभी सरकारी सूची में आ ही नहीं पाता।
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एक बच्चा एयर-कंडीशंड स्कूल में लाखों रुपये फीस देकर पढ़ता है और दूसरा गाँव के जर्जर सरकारी स्कूल में टाट-पट्टी पर बैठता है। क्या सिर्फ जाति देखकर दोनों को एक ही तराजू पर तौलना न्याय है?
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दूध को जब उबाला जाता है, तो मलाई ऊपर आ जाती है। यदि सारी मलाई एक ही बिल्ली चट कर जाए, तो भूखी बिल्लियों का क्या होगा? आरक्षित वर्गों के भीतर जो लोग संपन्न हो चुके हैं, वे ही आज उस मलाई पर कुंडली मारकर बैठे हैं।
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जब किसी को बुखार हो, तो डॉक्टर दवा इसलिए देता है ताकि मरीज अपने पैरों पर खड़ा हो सके। लेकिन अगर कोई पूरी जिंदगी दवा के सहारे बिस्तर पर ही पड़ा रहे, तो क्या वह कभी सेहतमंद हो पाएगा?
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नेताओं के लिए भाषणों में जाति गणना की मांग करना बहुत आसान है, लेकिन जब रजिस्टर लेकर प्रगणक दरवाजे पर पहुंचता है, तो सामने आने वाले सवालों का जवाब किसी के पास नहीं होता।
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चुनावी रैलियों में 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' का नारा गूंजता है। लेकिन क्या किसी ने पूछा कि उस 85% के भीतर का सबसे कमज़ोर इंसान आज भी वहीं क्यों खड़ा है जहां पचास साल पहले था?
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हम कहते हैं कि भारत बदल रहा है और जाति खत्म हो रही है। लेकिन अगर जाति सचमुच खत्म हो गई, तो चुनाव में उसका गणित क्यों बैठता है और शादी में उसका नाम क्यों पूछा जाता है?
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गिनती अपने आप में बुरी नहीं होती, लेकिन जब गिनती का मकसद सिर्फ यह देखना हो कि किस जाति को किसके खिलाफ भड़काया जाए, तो वह न्याय नहीं बल्कि समाज को तोड़ना है।