मंडल से पंचायत तक — गाँव में सत्ता आई या गाँव टूट गया?
एन. सिंह · ·6 मिनट
आज से तीस-चालीस साल पहले के किसी भी भारतीय गाँव की याद कीजिए।
गाँव में यदि किसी एक गरीब की बेटी की शादी होती थी, तो पूरा गाँव अपनी बेटी मानकर खड़ा हो जाता था। कोई अपने घर से अनाज लाता था, कोई चारपाइयां बिछाता था, और कोई बारात के स्वागत के लिए हलवाई के पास कड़ाही संभालता था। यदि किसी घर में विपत्ति आ जाए या किसी की मृत्यु हो जाए, तो तीन दिनों तक उस घर का चूल्हा पड़ोसी के घर से जलता था। सुख-दुख साझा थे, चौपाल एक थी, और गाँव के बुजुर्गों का फैसला अदालत के फैसले से बड़ा माना जाता था।
परंतु आज उसी गाँव में जाकर देखिए!
गाँव के बीचों-बीच नफ़रत की अदृश्य परंतु पक्की दीवारें खिंच चुकी हैं। एक ही कुएं और एक ही मेड़ पर खड़े होने वाले चचेरे-तहेरे भाई एक-दूसरे की जान लेने पर आमादा हैं। आए दिन थाने में झूठी एफआईआर, लाठीचार्ज, हत्याएं और अदालतों में मुकदमों के ढेर लगे हुए हैं।
सवाल यह है कि सदियों से अकाल, मुगलों और अंग्रेजों के अत्याचारों को झेलकर भी जो भारतीय गाँव अपनी समरसता और सामुदायिक एकता को बचाए रख सका था—वह गाँव आज आज़ादी के बाद के सत्तर सालों में अचानक अंदर से इतना खोखला और विखंडित कैसे हो गया? क्या 73वें संविधान संशोधन और मंडल आयोग की जातिगत राजनीति ने गाँव में लोकतंत्र पहुंचाया, या गाँव की आत्मा की ही हत्या कर दी?
73वां संविधान संशोधन और पंचायत चुनाव: विकेंद्रीकरण का काला सच
1992 में संविधान के 73वें संशोधन द्वारा पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया गया। उद्देश्य अत्यंत पावन था—महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ के सपने को साकार करना और सत्ता को दिल्ली व लखनऊ से निकालकर सीधे गाँव की चौपाल तक पहुंचाना।
परंतु व्यवहार में इस व्यवस्था ने भारतीय गाँव को तीन विनाशकारी बीमारियों का शिकार बना दिया:
- पंचायत चुनाव बना करोड़ों का सट्टा बाजार: पहले गाँव का प्रधान बुजुर्गों की सहमति से चुना जाता था जो निष्पक्ष और त्यागी होता था। आज एक ग्राम प्रधानी का चुनाव जीतने के लिए प्रत्याशी 25 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपये तक पानी की तरह बहाते हैं! शराब की पेटियां बांटी जाती हैं, साड़ियां बांटी जाती हैं, और मुर्गे काटे जाते हैं। जो जीतता है, उसका पहला काम विकास करना नहीं, बल्कि चुनाव में खर्च किए गए 50 लाख रुपये को घूस और कमीशन से वसूलना होता है!
- जातिगत आरक्षण और स्थायी वैमनस्य: हर पांच साल में जब प्रधानी की सीट का आरक्षण बदलता है (कभी महिला, कभी ओबीसी, कभी एससी, कभी सामान्य), तो जातियों के बीच पुरानी दुश्मनी की आग में नया घी पड़ जाता है। चुनाव हारने वाला पक्ष जीतने वाले पक्ष के खिलाफ पांच साल तक केवल साजिशें रचता है और सरकारी विकास कार्यों में अड़ंगे लगाता है।
- चौपाल और न्याय पंचायत का विनाश: पहले गाँव के आपसी विवाद बुजुर्गों की पंचायत में सुलझ जाते थे। आज छोटे-छोटे झगड़ों में भी लोग सीधे थाने और कचहरी भागते हैं जहाँ पुलिस और वकील दोनों पक्षों को लूटकर कंगाल कर देते हैं।
पारंपरिक भारतीय गाँव बनाम आधुनिक चुनावी पंचायत
| आयाम | प्राचीन/पारंपरिक ग्राम व्यवस्था | आधुनिक चुनावी पंचायती राज व्यवस्था |
|---|---|---|
| सामाजिक सम्बंध | सामुदायिक सहयोग, पारिवारिक भाव और सुख-दुख की साझेदारी | वोट-बैंक आधारित गुटबाजी, अविश्वास और स्थायी रंजिश |
| नेतृत्व का आधार | चरित्र, निष्पक्षता, बुजुर्गियत और त्याग | धनबल, बाहुबल, शराब का वितरण और जातिगत संख्या |
| न्याय व्यवस्था | गाँव की खुली पंचायत में सर्वसम्मति से त्वरित और मुफ्त न्याय | पुलिस थाने के दलाल, मुकदमों की अंतहीन तारीखें और भारी खर्च |
| सरकारी धन का उपयोग | गाँव के तालाब, कुएं, चकमार्ग और पेड़ों की सामूहिक देखरेख | कमीशनखोरी, फर्जी मस्टर रोल और सीमेंट की घटिया नालियों में बंदरबांट |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की मार्मिक पीड़ा
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय ‘गाँव का विखंडन’ में लिखते हैं:
“लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण के नाम पर हमने पंचायतों में जो व्यवस्था थोपी, उसने सत्ता तो गाँव तक नहीं पहुंचाई, लेकिन गाँव के सदियों पुराने आपसी प्रेम, भाईचारे और चौपाल की संस्कृति को हमेशा के लिए चकनाचूर कर दिया। अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई थी, लेकिन हमारे राजनेताओं ने पंचायत चुनावों के जरिए घर-घर में फूट डालकर अपना वोट-बैंक पक्का कर लिया। आज गाँव का भाई अपने ही सगे भाई का सिर फोड़ रहा है क्योंकि एक अमुक दल के झंडे के नीचे है और दूसरा तमुक दल के। जिस दिन गाँव की चौपाल टूटी, उसी दिन भारत का हृदय टूट गया!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 88-89)
लेखक आगे एक बहुत भयावह दृश्य दर्ज करते हैं:
“गाँव में अब रात को अलाव के किनारे बैठकर किस्से-कहानियां नहीं सुनी जातीं; अब अलाव के किनारे इस बात की साजिशें रची जाती हैं कि विरोधी गुट के लड़के पर धारा 307 या एससी/एसटी एक्ट का झूठा मुकदमा कैसे दर्ज कराया जाए! क्या गांधी जी ने इसी ग्राम स्वराज का सपना देखा था?”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 92)
गाँव की आत्मा को बचाने के चार क्रांतिकारी उपाय
- पंचायत चुनाव पूर्णतः निर्दलीय व पार्टी-मुक्त हों: पंचायत चुनावों में किसी भी राजनीतिक दल के सिंबल, पोस्टर या पार्टी हस्तक्षेप पर पूर्ण प्रतिबंध हो।
- सर्वसम्मति से चुने जाने पर भारी वित्तीय प्रोत्साहन: जो ग्राम पंचायत बिना मतदान के, सर्वसम्मति से अपने गाँव का मुखिया और वार्ड सदस्य चुनेगी, उस पंचायत को सरकार विकास के लिए एक करोड़ रुपये का विशेष अतिरिक्त अनुदान दे।
- ग्राम सभा को वास्तविक वीटो पावर: प्रधान या सचिव का कोई भी बिल या भुगतान तब तक पास न हो जब तक गाँव के 50% मतदाताओं की खुली बैठक में उसका भौतिक सत्यापन न हो जाए।
- पारंपरिक ग्राम न्यायालयों का पुनरुद्धार: छोटे दीवानी और पारिवारिक झगड़ों को सुलझाने के लिए सेवानिवृत्त शिक्षकों और प्रतिष्ठित बुजुर्गों की मध्यस्थता अदालतें बनाई जाएं ताकि लोगों का कचहरी जाना बंद हो।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या हम चुनावी लोकतंत्र के नाम पर अपने ही गांवों को कुरुक्षेत्र बनाते रहेंगे, या फिर से वही आत्मीय, समरस और आत्मनिर्भर भारतीय गाँव लौटाने का संकल्प लेंगे?
भारतीय गाँव के इस दर्दनाक रूपांतरण, राजनीति की विष-बेल और इसके वास्तविक समाधान को समझने के लिए एन. सिंह की कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह अध्याय हर ग्रामीण और नीति-निर्माता को ज़रूर पढ़ना चाहिए।
लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण के नाम पर हमने पंचायतों में जो 73वां संशोधन थोपा, उसने सत्ता तो गाँव तक नहीं पहुंचाई, लेकिन गाँव के सदियों पुराने आपसी प्रेम, भाईचारे और चौपाल की संस्कृति को हमेशा के लिए चकनाचूर कर दिया।