वैशाली का संथागार — भगवान बुद्ध ने दुनिया को पहला लोकतांत्रिक समाज कैसे सिखाया?
एन. सिंह · ·4 मिनट
जब भी लोकतंत्र की बात होती है, तो हमारे स्कूल-कॉलेजों में प्राचीन यूनान (ग्रीस) के एथेंस का नाम रटा दिया जाता है।
लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस समय एथेंस में लोकतंत्र की शुरुआती बातें हो रही थीं, उससे सदियों पहले बिहार की पावन धरती पर वैशाली का लिच्छवि गणराज्य (Vajji Confederacy) दुनिया का सबसे परिपक्व, विकसित और सफल लोकतांत्रिक गणराज्य चला रहा था!
वैशाली में कोई राजा वंशानुगत नहीं होता था। वहाँ 7,707 राजाओं (प्रतिनिधियों) की एक संसद थी, जिसे ‘संथागार’ कहा जाता था।
वहाँ गुप्त मतदान (Salaka-Gahapana) होता था, प्रस्ताव (Natti) रखे जाते थे, वाद-विवाद होता था, कोरम (गणपूर्ति) पूरा न होने पर सभा स्थगित होती थी, और बहुमत से कानून पास होते थे!
भगवान बुद्ध वैशाली के इस गणतांत्रिक मॉडल से गहरे प्रभावित थे। उन्होंने बौद्ध भिक्षु संघ की पूरी कार्यप्रणाली को वैशाली के इसी लोकतांत्रिक संविधान पर आधारित किया।
सात अपरिहाणीय धर्म: लोकतंत्र की अमर नियमावली
अपनी पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ के पहले भाग में लेखकद्वय नथुनी सिंह और विमला सिंह महापरिनिर्वाण सुत्त के उस ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख करते हैं जब मगध के साम्राज्यवादी राजा अजातशत्रु ने वैशाली पर हमला करने की योजना बनाई थी।
अजातशत्रु ने अपने मंत्री वर्षकार को बुद्ध के पास यह जानने भेजा कि क्या वैशाली को जीता जा सकता है?
बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद से पूछा:
- “आनंद! क्या वज्जी लोग संथागार में नियमित और बार-बार सभाएं करते हैं?” (आनंद ने कहा: हाँ भंते!)
- “क्या वे सभा में एकजुट होकर बैठते हैं और एकजुट होकर निर्णय लागू करते हैं?” (हाँ भंते!)
- “क्या वे प्राचीन स्थापित कानूनों का उल्लंघन नहीं करते और मनमाने नए कानून नहीं थोपते?” (हाँ भंते!)
- “क्या वे अपने बड़ों और वृद्धों का आदर करते हैं और उनकी सलाह सुनते हैं?” (हाँ भंते!)
- “क्या वे महिलाओं और कुल-वधुओं के साथ कोई दुर्व्यवहार या ज़बरदस्ती नहीं होने देते?” (हाँ भंते!)
- “क्या वे अपने धार्मिक स्थलों और चैत्यों का संरक्षण करते हैं?” (हाँ भंते!)
- “क्या वे बाहर से आने वाले संतों, विद्वानों और साधकों को पूर्ण सुरक्षा और सम्मान देते हैं?” (हाँ भंते!)
तथागत ने वर्षकार की ओर देखकर कहा: “जब तक वैशाली के नागरिक इन सात नियमों का पालन करते रहेंगे, तब तक दुनिया की कोई भी महाशक्ति उन्हें पराजित नहीं कर सकती!”
किताब से कड़वा सच
“बुद्ध का संघ दुनिया का पहला ऐसा संस्थान था जहाँ प्रवेश करते ही व्यक्ति की जाति, कुल, गोत्र और वर्ण विलीन हो जाते थे। जिस प्रकार गंगा, यमुना, अचिरावती और सरयू समुद्र में मिलकर अपना नाम खो देती हैं और केवल ‘समुद्र’ कहलाती हैं, उसी प्रकार क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र—सभी संघ में मिलकर केवल ‘श्रमण’ कहलाते थे। वहाँ कोई व्यक्ति किसी का मालिक नहीं था; सब कानून (विनय) के अधीन थे और हर निर्णय मतदान से होता था। यह भारत का वास्तविक लोकतांत्रिक गौरव था जिसे बाद की सामंती व्यवस्था ने मिटा दिया।”
— ‘बुद्ध धम्म और भारत’ (भाग-१, पृष्ठ 24-27)
असली समाधान क्या है?
- लोकतंत्र को केवल चुनाव न समझें: लोकतंत्र केवल 5 साल में एक बार वोट डालने का नाम नहीं है; यह दैनिक जीवन में एक-दूसरे के विचारों को सुनने और संवाद (Dialogue) करने की संस्कृति है।
- संसद और विधानसभाओं में मर्यादा: शोर-शराबे और बिलों को बिना बहस पास कराने के बजाय वैशाली के संथागार की तरह गंभीर, गरिमापूर्ण और तार्किक विमर्श की परंपरा लौटे।
- महिलाओं की स्वायत्तता और सुरक्षा: जिस समाज में महिलाओं का अनादर हो, वह लोकतंत्र कभी टिकाऊ नहीं हो सकता।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या आज की भारतीय संसद और हमारी राजनीतिक पार्टियां वैशाली के संथागार और बुद्ध के उन ‘सात अपरिहाणीय नियमों’ की कसौटी पर खरी उतरती हैं?
भारत की इस गौरवशाली गणतांत्रिक विरासत को जानने के लिए पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का यह अध्याय हर भारतीय को गर्व और आत्ममंथन से भर देता है।
जब तक वज्जी लोग नियमित सभाएं करेंगे, एकमत से निर्णय लेंगे, अपने संविधान का पालन करेंगे और बुजुर्गों का सम्मान करेंगे, तब तक उनका पतन असंभव है—यह तथागत का पहला राजनीतिक सूत्र था।