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'मनो पुब्बंगमा धम्मा' — सारे सुख-दुःख की जड़ आपका मन है, पूजा-पाठ नहीं

एन. सिंह · ·4 मिनट

जब आप किसी ज्योतिषी के पास जाते हैं, तो वह कहता है: “शनि की साढ़े साती चल रही है, राहु खराब है, फलां नग की अंगूठी पहन लो या यह अनुष्ठान करवा लो, सब ठीक हो जाएगा!”

मनुष्य सदियों से अपने दुःखों का कारण बाहर खोजता रहा है—तारों में, ग्रहों में, पड़ोसियों के जादू-टोने में या किसी काल्पनिक श्राप में।

लेकिन 2500 वर्ष पूर्व तथागत बुद्ध ने जब अपना धर्मग्रंथ ‘धम्मपद’ शुरू किया, तो उन्होंने पहली ही पंक्ति में संसार के इस सबसे बड़े भ्रम पर ऐसा हथौड़ा चलाया कि अंधविश्वास की पूरी दीवार ढह गई।

धम्मपद की पहली दो गाथाएं कहती हैं:

मनोपुब्बंगमा धम्मा मनोसेट्ठा मनोमया।
मनसा चे पदुट्ठेन भासति वा करोति वा।
ततो नं दुक्खमन्वेति चक्कं’व वहतो पदं॥ (गाथा-१)

अर्थात्: मन ही सभी धर्मों (मानसिक अवस्थाओं) का अगुआ है। मन ही प्रधान है, सब कुछ मन से ही बना है। यदि कोई मनुष्य मैल से भरे दूषित मन से बोलता या कर्म करता है, तो दुःख उसके पीछे ऐसे ही चलता है जैसे गाड़ी खींचने वाले बैल के खुर के पीछे पहिया चलता है।

और दूसरी गाथा कहती है:

मनसा चे पसन्नेन भासति वा करोति वा।
ततो नं सुखमन्वेति छाया’व अनपायिनी॥ (गाथा-२)

अर्थात्: यदि कोई व्यक्ति निर्मल, शांत और प्रसन्न मन से बोलता या कर्म करता है, तो सुख उसकी कभी न छूटने वाली परछाईं की तरह हमेशा उसके साथ चलता है।


आधुनिक मनोविज्ञान और तथागत का दर्शन

अपनी पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ के दूसरे भाग में लेखक नथुनी सिंह धम्मपद के इस पहले सूत्र का ऐसा तात्विक विवेचन प्रस्तुत करते हैं जो आधुनिक न्यूरोसाइंस और मनोचिकित्सा (Cognitive Behavioral Therapy) को भी मात देता है।

बुद्ध कहते हैं कि बाहर कोई स्वर्ग या नरक नहीं है।

  • जब आपके मन में ईर्ष्या, क्रोध, वासना, लोभ और अहंकार का ज्वार उठता है, तो आप उसी क्षण नरक में जल रहे होते हैं। आपका रक्तचाप बढ़ता है, दिल की धड़कनें तेज होती हैं, और आपके शरीर में ज़हरीले हॉर्मोन रिसने लगते हैं।
  • और जब आपके मन में क्षमा, मैत्री, करुणा और अनासक्ति होती है, तो आप उसी क्षण स्वर्ग के परम विश्राम का अनुभव करते हैं।

इसलिए किसी मंदिर, मस्जिद या नदी में जाने से पहले अपने मन की जांच कीजिए। यदि भीतर मैल है, तो गंगा में सौ गोते लगाने के बाद भी आप वैसे ही पापी बाहर निकलेंगे जैसे भीतर गए थे!


किताब से कड़वा सच

“बुद्ध का धम्म कोई विश्वास (Belief System) नहीं है, वह शुद्ध मनोविज्ञान (Mind Science) है। बुद्ध ने मनुष्य को किसी अदृश्य ईश्वर की कठपुतली बनने से आज़ाद कर दिया। उन्होंने कहा—तुम अपने भाग्य के विधाता स्वयं हो। ‘अत्त दीपो भव’ (अपना दीपक स्वयं बनो)। तुम्हारे दुःखों का कारण कोई दूसरा नहीं, तुम्हारी अपनी ही अंधी तृष्णा और अज्ञान है। और जिस दिन तुम अपने मन को देखना सीख लोगे (विपश्यना), उसी दिन सारे दुःखों की श्रृंखला टूट जाएगी।”
— ‘बुद्ध धम्म और भारत’ (भाग-२, तात्विक विवेचन)


असली समाधान क्या है?

  1. विचारों का साक्षी भाव (Mindfulness): जब भी क्रोध या बेचैनी आए, तुरंत प्रतिक्रिया न दें। एक गहरी सांस लें और अपने भीतर उठ रहे विचार को बिना लड़े केवल एक दृष्टा की तरह देखें।
  2. वाणी का संयम: बोलने से पहले मन की कसौटी पर परखें—क्या जो मैं बोलने जा रहा हूँ वह सत्य है? क्या वह आवश्यक है? क्या उसमें करुणा है? यदि नहीं, तो मौन रहें।
  3. दैनिक ध्यान का अभ्यास: दिन में कम से कम 20 मिनट शांत बैठकर अपनी आती-जाती सांसों (आनापानसती) का निरीक्षण करें, ताकि मन की भटकन शांत हो सके।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

अगर आपके घर का पंखा खराब हो जाए, तो क्या आप बिजली के खंभे पर नारियल फोड़ते हैं या पंखे की मोटर ठीक करते हैं? फिर जब आपका जीवन और मन अशांत हो, तो बाहर के पाखंडों में भटकने के बजाय अपने मन की मरम्मत क्यों नहीं करते?

धम्मपद के इस क्रांतिकारी मनोवैज्ञानिक रहस्य को समझने के लिए पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का यह भाग ज़रूर पढ़ें।

मनो पुब्बंगमा धम्मा मनोसेट्ठा मनोमया—मन ही सभी प्रवृत्तियों का अगुआ है, मन ही श्रेष्ठ है, सब कुछ मन से ही निर्मित है। यदि दूषित मन से कोई बोलता या करता है, तो दुःख उसके पीछे ऐसे चलता है जैसे बैल के पैरों के पीछे गाड़ी का पहिया।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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