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नेहरू, शास्त्री, इंदिरा से वाजपेयी तक — भारतीय प्रधानमंत्रियों का निष्पक्ष ऑडिट

एन. सिंह · ·6 मिनट

भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यहाँ देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों का मूल्यांकन निष्पक्ष इतिहासकार की दृष्टि से नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के अंध-समर्थकों या अंध-विरोधियों की दृष्टि से किया जाता है।

  • एक खेमा पंडित जवाहरलाल नेहरू को देश की हर आधुनिक समस्या (कश्मीर से लेकर गरीबी तक) का एकमात्र विलेन घोषित कर देता है;
  • दूसरा खेमा इंदिरा गांधी के आपातकाल और संस्थागत तानाशाही को पूरी तरह भुलाकर उन्हें केवल ‘आयरन लेडी’ का तमगा देता है;
  • और तीसरा खेमा लाल बहादुर शास्त्री और अटल बिहारी वाजपेयी के जटिल राजनीतिक समझौतों को अनदेखा कर उन्हें केवल मसीहा बना देता है।

एन. सिंह अपनी कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय 9 (‘भारत के प्रधानमंत्री और भारत के लिए उनका योगदान’) में किसी भी दलीय पूर्वाग्रह से मुक्त होकर देश के प्रमुख प्रधानमंत्रियों का एक निर्मम, वस्तुनिष्ठ और साक्ष्य-आधारित ऑडिट प्रस्तुत करते हैं।


1. पंडित जवाहरलाल नेहरू: आधुनिक नींव बनाम आर्थिक व सामरिक विफलता

  1. सकारात्मक योगदान:
    • 1947 में जब पाकिस्तान और एशिया-अफ्रीका के दर्जनों नव-स्वतंत्र देश सैनिक तानाशाही में बदल गए, तब नेहरू ने भारत में संसदीय लोकतंत्र, स्वतंत्र चुनाव आयोग और स्वायत्त न्यायपालिका की मजबूत नींव रखी।
    • आईआईटी (IIT), आईआईएम (IIM), एम्स (AIIMS), इसरो (ISRO) और परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना कर वैज्ञानिक चेतना (Scientific Temper) को राष्ट्रीय नीति बनाया।
  2. ऐतिहासिक विफलताएं:
    • सोवियत मॉडल का अंधानुकरण: लाइसेंस-परमिट-कोटा राज ने भारतीय उद्यमिता का गला घोंटा। प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य की घोर उपेक्षा कर केवल भारी उद्योगों पर ध्यान दिया।
    • सामरिक अदूरदर्शिता: 1962 में चीन के हाथों हुई भयानक पराजय और कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र ले जाना उनकी सबसे बड़ी कूटनीतिक भूल साबित हुई।

2. लाल बहादुर शास्त्री: नैतिक शुचिता और ‘जय जवान जय किसान’

  • शास्त्री जी का 18 महीने का कार्यकाल भारतीय नेतृत्व का स्वर्ण काल था। जब 1965 में पाकिस्तान ने हमला किया, तो बिना किसी हिचकिचाहट के उन्होंने सेना को अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर लाहौर की ओर कूच करने का आदेश दिया।
  • अमेरिका द्वारा पीएल-480 गेहूं रोकने की धमकी पर उन्होंने पूरे देश से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने का आह्वान किया और स्वयं अपने घर में चरखा कातकर व सादा जीवन जीकर मिसाल पेश की।
  • श्वेत क्रांति (अमूल/NDDB) और हरित क्रांति की वास्तविक आधारशिला शास्त्री जी के ही छोटे से कार्यकाल में रखी गई थी।

3. इंदिरा गांधी: राष्ट्रीय शौर्य बनाम लोकतांत्रिक संस्थाओं का दमन

  1. सामरिक शिखर (1971): पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बांग्लादेश का निर्माण और 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों का ऐतिहासिक आत्मसमर्पण इंदिरा गांधी के अदम्य साहस का प्रमाण था। 1974 का पोखरण-1 परमाणु परीक्षण भारत की संप्रभुता का ऐलान था।
  2. लोकतंत्र का विनाश (1975 का आपातकाल): जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनके चुनाव को अवैध घोषित किया, तो अपनी कुर्सी बचाने के लिए उन्होंने पूरे देश पर 21 महीने का काला आपातकाल थोप दिया। प्रेस सेंसरशिप, लाखों विपक्षी नेताओं को जेल, और न्यायपालिका में ‘कमिटेड ज्यूडिशियरी’ की जहरीली परंपरा शुरू की जिसने सुप्रीम कोर्ट की रीढ़ तोड़ दी।

4. अटल बिहारी वाजपेयी: परमाणु शक्ति और गठबंधन की मर्यादा

  • 1998 में अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह किए बिना पोखरण-2 के पाँच सफल परमाणु परीक्षण करके भारत को घोषित परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाया।
  • स्वर्णिम चतुर्भुज (Golden Quadrilateral) और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से देश के बुनियादी ढांचे का कायाकल्प किया।
  • परंतु 24 दलों के गठबंधन की मजबूरियों के कारण वे क्रोनी कैपिटलिज्म और राजनीतिक दलबदल पर प्रभावी लगाम नहीं लगा सके।

प्रमुख प्रधानमंत्रियों का तुलनात्मक रिपोर्ट कार्ड

प्रधानमंत्री कार्यकाल सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि सबसे बड़ी विफलता / संस्थागत नुकसान
जवाहरलाल नेहरू 1947–1964 मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं, आईआईटी/एम्स, वैज्ञानिक चेतना 1962 चीन युद्ध में पराजय, लाइसेंस-कोटा राज
लाल बहादुर शास्त्री 1964–1966 1965 युद्ध में शौर्य, ‘जय जवान जय किसान’, स्वावलंबन असमय ताशकंद में रहस्यमयी मृत्यु, छोटा कार्यकाल
इंदिरा गांधी 1966–77, 80–84 1971 में पाकिस्तान का विभाजन, 1974 पोखरण परमाणु परीक्षण 1975 का आपातकाल, न्यायपालिका और संविधान का दमन
अटल बिहारी वाजपेयी 1998–2004 पोखरण-2, राष्ट्रीय राजमार्ग क्रांति, सर्व शिक्षा अभियान गठबंधन की मजबूरियां, गुजरात 2002 की प्रशासनिक लाचारी

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का निष्पक्ष मूल्यांकन

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय 9 में लिखते हैं:

“आजाद हिन्दुस्तान को सैकड़ों तरह के संघर्षों का सामना करना पड़ा। ये संघर्ष ज़मीन, भाषा, क्षेत्र और धर्म से सम्बन्धित थे। जब हम अपने प्रधानमंत्रियों को देखते हैं, तो पाते हैं कि हर नेता ने देश को कुछ दिया भी और देश से कुछ छीना भी। नेहरू ने यदि हमें लोकतंत्र और संस्थाएं दीं, तो आर्थिक जकड़न भी दी। इंदिरा गांधी ने यदि हमें 1971 का गौरव दिया, तो उसी हाथ से हमारे नागरिकों के मौलिक अधिकार छीनकर जेलों में ठूंस दिया। आज की राजनीति का सबसे बड़ा पाखंड यह है कि वह अपने नेता के अवगुणों पर पर्दा डालती है और विरोधी नेता के सद्गुणों को भी गाली देती है। जब तक भारतीय नागरिक अपने प्रधानमंत्रियों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करना नहीं सीखेगा, तब तक वह केवल राजनीतिक प्रचार तंत्र (Propaganda) का शिकार बनता रहेगा।”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 82-83)


राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक नेतृत्व के चार सबक

  1. संस्थाओं की स्वायत्तता का सम्मान: कोई भी नेता चाहे कितना ही लोकप्रिय क्यों न हो, वह संविधान, संसद और न्यायपालिका से बड़ा नहीं हो सकता।
  2. सैनिक और किसान की सर्वोच्च प्राथमिकता: शास्त्री जी का मंत्र आज भी प्रासंगिक है—सुरक्षा और अन्न आत्मनिर्भरता के बिना कोई देश आजाद नहीं रह सकता।
  3. वंशवाद से मुक्ति: प्रधानमंत्री की कुर्सी किसी परिवार की बपौती नहीं होनी चाहिए; मेरिट और जनसेवा ही सर्वोच्च नेतृत्व की कसौटी हो।
  4. राष्ट्रीय हित दलगत राजनीति से ऊपर: विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष का एक साझा राष्ट्रीय दृष्टिकोण होना अनिवार्य है।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या हम अपने नेताओं की अंध-भक्ति और अंध-विरोध से बाहर निकलकर उनके कार्यों का निष्पक्ष ऐतिहासिक हिसाब मांगने का साहस जुटा पाएंगे?

भारतीय प्रधानमंत्रियों की नीतियों, सफलताओं और भूलों के इस प्रामाणिक दस्तावेज़ को गहराई से समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह नौवां अध्याय हर नागरिक को ज़रूर पढ़ना चाहिए।

इतिहास किसी नेता का मूल्यांकन उसके द्वारा लगाए गए नारों से नहीं, बल्कि इस बात से करता है कि उसने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कितना मजबूत बनाया या अपने व्यक्तिगत अहंकार के लिए उन्हें कितना रौंदा।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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