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बटाईदार किसान का अनसुना क्रंदन — जो खेत जोतता है, सरकारी कागजों में उसका वजूद ही नहीं!

एन. सिंह · ·6 मिनट

भारतीय गाँवों के कृषि यथार्थ का एक बहुत ही कड़वा और खौफनाक सच यह है कि देश के कुल कृषि रकबे का लगभग 35 से 40 प्रतिशत हिस्सा उन किसानों द्वारा जोता जाता है, जिनके पास अपनी खुद की एक इंच ज़मीन भी नहीं है!

इन्हें अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है—कहीं ‘बटाईदार’, कहीं ‘अधिया’, कहीं ‘काश्तकार’, और कहीं ‘शेयरक्रॉपर’ (Sharecropper)।

ज़रा इस बटाईदार किसान के जीवन की दिनचर्या देखिए:

  • ज़मीन किसी अमीर बाबू, शहर में बसे सरकारी अफसर, या दबंग जमींदार की होती है जो गाँव छोड़कर लखनऊ, दिल्ली या पटना के वातानुकूलित फ्लैटों में रहते हैं।
  • वह मालिक बटाईदार से मौखिक (unwritten) समझौता करता है कि खाद, बीज, जुताई और सिंचाई का सारा खर्च बटाईदार उठाएगा, और फसल पकने पर आधी या एक-तिहाई फसल मालिक के दरवाजे पर मुफ्त पहुंचाएगा!
  • यदि बाढ़ आ जाए, सूखा पड़ जाए, या ओले गिर जाएं—तो मालिक का कुछ नहीं बिगड़ता; सारा नुकसान उस अभागे बटाईदार के सिर पर गिरता है।

लेकिन इस कहानी का सबसे दर्दनाक और घिनौना मोड़ तब आता है जब सरकार की ‘किसान कल्याणकारी योजनाएं’ शुरू होती हैं!

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के ₹6,000 किसके बैंक खाते में जाते हैं? शहर में बैठे ज़मीन मालिक के खाते में! फसल नष्ट होने पर बीमा का मुआवजा किसे मिलता है? ज़मीन मालिक को! बैंक से सस्ता केसीसी (Kisan Credit Card) लोन किसे मिलता है? ज़मीन मालिक को!

और जिस बटाईदार किसान ने रात-रात भर जागकर अपनी छाती के लहू से फसल सींची थी, सरकारी मंडी में उसकी फसल तक नहीं खरीदी जाती क्योंकि उसके पास ज़मीन की खतौनी का कागज़ नहीं होता!

एन. सिंह अपनी कालजयी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के अध्याय 4 में पूछते हैं: क्या इस देश में ‘किसान’ केवल ज़मीन के कागज़ का नाम है, या उस हाड़-मांस के इंसान का जो धरती का सीना चीरकर अन्न उगाता है?


मौखिक बटाईदारी: कानून की नजर में अदृश्य किसान

आज़ादी के बाद उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम (UPZA & LR Act) और अन्य राज्यों के भूमि कानूनों में बटाईदारी को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया था। कानून का इरादा था कि ‘जो जोते, उसकी ज़मीन’ (Land to the Tiller)।

परंतु व्यवहार में इसका उलटा हुआ:

  1. लिखित समझौते पर पूर्ण प्रतिबंध: ज़मीन मालिकों को यह डर रहता है कि यदि उन्होंने बटाईदार के साथ कोई लिखित अनुबंध (Written Agreement) किया, तो बटाईदार ज़मीन पर अपने मालिकाना हक का दावा ठोक देगा। इसलिए सारा लेन-देन केवल मौखिक और नकद में होता है।
  2. संस्थागत ऋण से पूर्ण वंचना: क्योंकि उसके पास कोई सरकारी कागज़ नहीं है, कोई भी सरकारी बैंक बटाईदार को एक रुपये का कर्ज़ नहीं देता। मजबूर होकर उसे गाँव के सूदखोर महाजनों से 36% से 60% सालाना ब्याज पर कर्ज़ लेना पड़ता है।
  3. आत्महत्याओं के आंकड़ों में भी पहचान की चोरी: जब कोई बटाईदार कर्ज़ के दलदल में फंसकर ज़हर खा लेता है, तो पुलिस और प्रशासन उसकी मौत को ‘किसान की आत्महत्या’ मानने से ही इनकार कर देते हैं! वे रिपोर्ट लिख देते हैं कि “मृतक के नाम पर कोई खेती की ज़मीन नहीं थी, इसलिए यह किसान आत्महत्या नहीं है!” यानी जीते जी तो उसे किसान नहीं माना, मरने के बाद भी उसकी शहादत छीन ली गई!

ज़मीन का कागज़ी मालिक बनाम वास्तविक बटाईदार किसान

तुलना का बिंदु कागज़ी मालिक (शहर में बैठा अनुपस्थित भूस्वामी) वास्तविक बटाईदार किसान (मेहनतकश सर्वहारा)
शारीरिक श्रम शून्य; कभी धूप, धूल या कीचड़ में कदम नहीं रखा 24 घंटे हाड़-तोड़ मेहनत; ठंड में रात भर पानी लगाना
लागत का जोखिम शून्य; केवल अपनी ज़मीन देकर घर बैठे आधी फसल पाना खाद, बीज, डीजल, कीटनाशक और कटाई का 100% खर्च
सरकारी लाभ पीएम-किसान, सोलर पंप, बीज सब्सिडी और बैंक लोन प्राप्त सरकारी योजनाओं के पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन का भी अधिकार नहीं
संकट में स्थिति सूखा पड़ने पर भी बटाईदार से अपना तय हिस्सा वसूलना सूखा या ओला पड़ते ही परिवार सहित भूखमरी और आत्महत्या

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का हृदयविदारक चित्रण

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के अध्याय 4 में लिखते हैं:

“भारतीय कृषि का सबसे क्रूर और अनकहा रहस्य यह है कि जो खेत का मालिक है, वह कभी खेत में हल नहीं चलाता; और जो दिन-रात खेत में पसीना और लहू बहाता है, सरकारी राजस्व के कागजों में उसका कोई नाम तक दर्ज नहीं है। बटाईदार किसान इस देश का सबसे अभागा नागरिक है। वह ज़मीन की प्यास बुझाने के लिए अपना खून तक पानी की तरह बहा देता है, लेकिन जब फसल बिकने की बारी आती है तो आढ़तिया उससे कहता है कि अपनी खतौनी लाओ! जिस देश का अन्न भंडार ऐसे करोड़ों अदृश्य बटाईदारों के पसीने से भरता हो, उस देश की संसद में बटाईदारों के अधिकारों पर एक दिन की भी चर्चा न होना हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी संवेदनहीनता है!”
— एन. सिंह (उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव, पृष्ठ 118-119)

लेखक आगे राजस्व व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं:

“हमारी राजस्व संहिताएं आज भी अंग्रेजों के जमाने की पटवारी व्यवस्था पर टिकी हैं। पटवारी वही लिखता है जो रसूखदार मालिक चाहता है। जब तक बटाईदार को कानूनी पहचान नहीं मिलेगी, तब तक भारत की कृषि कभी संकट से बाहर नहीं निकल सकती।”
— (उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव, पृष्ठ 124)


बटाईदार किसानों को न्याय दिलाने के चार कानूनी कदम

  1. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना मॉडल का राष्ट्रीयकरण: आंध्र प्रदेश के ‘Licensed Cultivators Act’ की तर्ज पर हर बटाईदार को ज़मीन के मालिकाना हक को छेड़े बिना ‘काश्तकार पात्रता कार्ड’ (Loan & Crop Eligibility Card) दिया जाए जिससे वह सीधे बैंक से लोन और फसल बीमा ले सके।
  2. फसल क्षति का मुआवजा सीधे जोतने वाले को: सैटेलाइट और जीपीएस मैपिंग से यह दर्ज हो कि वास्तव में उस सीजन में खेत किसने बोया था; आपदा का सारा मुआवजा सीधे वास्तविक काश्तकार के खाते में जाए।
  3. सरकारी मंडियों में बिना खतौनी के फसल खरीद: बटाईदार को ग्राम प्रधान या कृषि अधिकारी के सत्यापन के आधार पर अपनी फसल एमएसपी पर सीधे सरकारी केंद्र पर बेचने का कानूनी अधिकार हो।
  4. मॉडल लीज़ एग्रीमेंट (NITI Aayog Model Agricultural Land Leasing Act): नीति आयोग द्वारा तैयार किए गए लीज़ कानून को सभी राज्यों में तुरंत लागू किया जाए ताकि ज़मीन मालिक के मन से ज़मीन छिनने का डर समाप्त हो और वह लिखित अनुबंध कर सके।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

जो किसान पूरे देश की भूख मिटाने के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा देता है, क्या आजाद भारत के इतिहास में उसे एक ‘किसान’ कहलाने का भी हक नहीं मिलना चाहिए?

भारतीय कृषि के इस सबसे बड़े अनसुलझे दर्द, बटाईदारी के क्रूर सच और ज़मीनी सुधारों के मार्ग को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का यह चौथा अध्याय हर संवेदनशील इंसान को पढ़ना चाहिए।

भारतीय कृषि का सबसे क्रूर और अनकहा रहस्य यह है कि जो खेत का मालिक है, वह कभी खेत में हल नहीं चलाता; और जो दिन-रात खेत में पसीना और लहू बहाता है, सरकारी राजस्व के कागजों में उसका कोई नाम तक दर्ज नहीं है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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