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हमारा पेट भरने वाला किसान कर्ज़ में क्यों मरता है?

एन. सिंह · ·6 मिनट

ज़रा बाज़ार के इस साधारण से अर्थशास्त्र पर विचार कीजिए।

एक साबुन बनाने वाली कंपनी, एक बिस्कुट बनाने वाली फैक्ट्री, एक मोबाइल बनाने वाली विदेशी कंपनी या एक कार बनाने वाला उद्योगपति—जब वह अपना उत्पाद बाज़ार में उतारता है, तो उसके पैकेट पर एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) कौन तय करता है? वह कंपनी स्वयं तय करती है! वह अपनी लागत जोड़ती है, बिजली, कच्चा माल, कर्मचारियों का वेतन जोड़ती है, और अंत में अपना बीस से तीस प्रतिशत मुनाफा जोड़कर उत्पाद पर कीमत छाप देती है। कोई सरकार या ग्राहक उससे यह नहीं कह सकता कि “तुम साबुन दस रुपये में ही बेचो!”

लेकिन अब उस अभागे भारतीय किसान को देखिए जो 140 करोड़ लोगों का पेट भरने के लिए रात के अंधेरे में बर्फीले पानी से खेत सींचता है, भरी दोपहरी में हल चलाता है, और खाद-बीज के लिए अपनी पत्नी के जेवर गिरवी रखता है।

जब वह छह महीने की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद अपनी गेहूं, धान, प्याज या टमाटर की फसल लेकर सरकारी मंडी या बाज़ार में पहुँचता है, तो क्या वह अपनी फसल की कीमत खुद तय कर सकता है?

बिल्कुल नहीं! वहाँ बैठा आढ़तिया और व्यापारी तय करता है कि किसान की मेहनत किस भाव पर खरीदी जाएगी। और अक्सर भाव ऐसा होता है कि किसान की लागत भी नहीं निकलती। कई बार तो भाव इतना गिर जाता है कि किसान को अपनी मेहनत का टमाटर और गोभी सड़कों पर फेंक कर रोते हुए घर लौटना पड़ता है!

यह कैसी व्यवस्था है जहाँ कार बनाने वाला अरबपति बनता जाता है, और पूरी दुनिया का पेट भरने वाला अन्नदाता कर्ज़ के बोझ तले फांसी के फंदे पर झूल जाता है?


मंडी से संसद तक: संगठित किसान विरोधी अर्थशास्त्र

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ में इस संस्थागत लूट के तीन मुख्य चक्रव्यूहों का विश्लेषण करते हैं:

  1. औद्योगिक मुद्रास्फीति बनाम कृषि अवस्फीति (Inverted Price Index): पिछले पचास वर्षों में डीजल के दाम 100 गुना बढ़े, ट्रैक्टर के दाम 80 गुना बढ़े, खाद और कीटनाशक के दाम 60 गुना बढ़े; परंतु गेहूं और धान के सरकारी समर्थन मूल्य (MSP) में मात्र 15 से 20 गुना की ही वृद्धि हुई! किसान जो खरीदता है वह अत्यधिक महंगा है, और जो बेचता है वह मिट्टी के भाव बिकता है।
  2. उपभोक्ता को खुश रखने के लिए किसान की बलि: सरकारें हमेशा शहरों के मध्यम वर्ग और उद्योगपतियों को खुश रखना चाहती हैं ताकि महंगाई का हल्ला न मचे। जैसे ही किसान को अपनी फसल का थोड़ा अच्छा दाम मिलने लगता है (जैसे प्याज या गेहूं), सरकार तुरंत विदेशों से आयात खोल देती है या निर्यात पर बैन लगा देती है ताकि बाज़ार में दाम गिर जाएं! यानी सरकार खुद किसान की जेब काटकर शहरी उपभोक्ता को सब्सिडी देती है।
  3. आढ़तियों और दलालों का खूनी शिकंजा: खेत से लेकर उपभोक्ता की थाली के बीच 5 से 6 बिचौलिए होते हैं। किसान से आलू 5 रुपये किलो खरीदा जाता है, और शहर के सुपरमार्केट में वही आलू चिप्स के रूप में 400 रुपये किलो और सामान्य रूप से 30 रुपये किलो बिकता है। बीच का 80% मुनाफा वह बिचौलिया डकार जाता है जिसने कभी खेत में एक दिन कुदाल नहीं चलाई!

किसान बनाम उद्योगपति: देश की दोहरी नीतियां

पैमाना कॉर्पोरेट उद्योगपति देश का अन्नदाता किसान
मूल्य निर्धारण अपनी लागत और मनचाहा मुनाफा जोड़कर खुद तय करता है मंडी का दलाल और सरकार की अफसरशाही तय करती है
कर्ज़ का संकट लाखों करोड़ का बैंक लोन न चुकाने पर लोन राइट-ऑफ हो जाता है पचास हजार के कर्ज़ पर बैंक घर की कुर्की करता है, जेल भेजता है
प्राकृतिक आपदा फैक्ट्री में आग या नुकसान पर 100% बीमा क्लेम मिलता है ओलावृष्टि या सूखे पर फसल बीमा कंपनियां क्लेम खारिज कर देती हैं
सामाजिक दर्जा वीआईपी लाउंज, आर्थिक सम्मेलनों और संसद में रेड कारपेट दिल्ली की सीमाओं पर लाठियां, आंसू गैस और कील-कांटे

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का मार्मिक प्रहार

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ (जो उन्होंने स्वयं भारतीय किसान और भारतीय सेना के सम्मान में समर्पित की है) में लिखते हैं:

“बाज़ार का सबसे क्रूर और निर्दयी नियम यह है कि जो चीज़ इंसान को जीवित रखती है—अन्न—उसकी कीमत मिट्टी के मोल रखी जाती है; और जो चीज़ें केवल विलासिता हैं, उनकी कीमतें आसमान छूती हैं। किसान इसलिए नहीं मरता कि फसल नहीं हुई; किसान इसलिए मरता है क्योंकि उसकी फसल की लूट को सरकारी संरक्षण प्राप्त है। इस देश में हर साल हज़ारों किसान आत्महत्या करते हैं, लेकिन संसद में एक दिन भी शोक प्रस्ताव पारित नहीं होता; जबकि किसी बड़े उद्योगपति के शेयर गिर जाएं तो वित्त मंत्रालय तुरंत राहत पैकेज का एलान कर देता है! यह देश अन्नदाता के पसीने पर नहीं, अन्नदाता के कफन पर नाच रहा है!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 138-139)

लेखक आगे एक बहुत बुनियादी समाधान की ओर संकेत करते हैं:

“जब तक किसान को उसकी फसल की वास्तविक लागत (स्वामीनाथन आयोग का C2+50% फॉर्मूला) की कानूनी गारंटी नहीं मिलेगी, तब तक किसान सम्मान निधि के छह हजार रुपये फेंकना केवल उसके घावों पर नमक छिड़कने जैसा उपहास है।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 144)


किसान को कर्ज़-मुक्त और स्वाभिमानी बनाने के चार कदम

  1. एमएसपी (MSP) की कानूनी गारंटी: न्यूनतम समर्थन मूल्य को केवल प्रशासनिक घोषणा न रखकर कानूनी अधिकार (Legal Right) बनाया जाए; एमएसपी से कम पर खरीद करने वाले व्यापारी को गैर-जमानती जेल हो।
  2. स्वामीनाथन आयोग की C2+50% सिफारिश लागू हो: लागत का निर्धारण केवल बीज-खाद से न हो, बल्कि किसान और उसके पूरे परिवार के शारीरिक श्रम और ज़मीन के किराए को जोड़कर उस पर 50% शुद्ध मुनाफा दिया जाए।
  3. गाँव स्तर पर कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग: हर पाँच पंचायतों के बीच आधुनिक सौर-ऊर्जा संचालित कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण इकाइयां लगाई जाएं ताकि किसान मजबूरी में औने-पौने दाम पर फसल न बेचे।
  4. फसल बीमा का सीधा नियंत्रण ग्राम सभा के हाथ: निजी बीमा कंपनियों का अरबों का मुनाफा बंद कर फसल क्षति का आकलन ग्राम सभा और कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा सीधे सैटेलाइट से हो और 72 घंटे में मुआवजा खाते में आए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

यदि हमारा पेट भरने वाला किसान ही भूख और कर्ज़ से मर जाएगा, तो क्या हम अपनी बहुमंजिला इमारतों में बैठकर नोट और सोने के सिक्के खाकर जिंदा रह पाएंगे?

भारतीय कृषि की इस भयावह त्रासदी, बाज़ार के षड्यंत्र और किसान आंदोलन की वास्तविक आत्मा को समझने के लिए एन. सिंह की कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह अध्याय हर उस नागरिक को पढ़ना चाहिए जो रोज़ सम्मान से अन्न ग्रहण करता है।

बाज़ार का सबसे क्रूर और निर्दयी नियम यह है कि जो चीज़ इंसान को जीवित रखती है—अन्न—उसकी कीमत मिट्टी के मोल रखी जाती है; और जो चीज़ें केवल विलासिता हैं, उनकी कीमतें आसमान छूती हैं। किसान इसलिए नहीं मरता कि फसल नहीं हुई; किसान इसलिए मरता है क्योंकि उसकी फसल की लूट को सरकारी संरक्षण प्राप्त है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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