शंकराचार्य, अवतारवाद और बौद्ध धम्म का आत्मसातीकरण — कैसे विद्रोह को पूजा में बदला गया
एन. सिंह · ·5 मिनट
इतिहास में किसी भी क्रांतिकारी विचार को कुचलने के दो रास्ते होते हैं: पहला, तलवार और हिंसा के बल पर उसका कत्लेआम करना; और दूसरा, उससे भी अधिक घातक रास्ता—उस क्रांतिकारी को पूजनीय बनाकर मंदिर में स्थापित कर देना और उसकी मूल क्रांतिकारी शिक्षाओं पर ताला लगा देना।
तथागत बुद्ध के साथ भारत में यही हुआ। जिस महामानव ने वेदों की अपौरुषेयता को नकारा, जन्मजात वर्ण-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाईं, और यज्ञ-बलि के पाखंड को उखाड़ फेंका, उसी बुद्ध को कालांतर में हिंदू धर्म के दशावतारों में ‘भगवान विष्णु का नौवां अवतार’ घोषित कर दिया गया! यह इतिहास का सबसे चतुर और कपटपूर्ण आत्मसातीकरण (Assimilation) था।
एन. सिंह अपनी विचारोत्तेजक पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ में इस वैचारिक षड्यंत्र का पर्दाफाश करते हुए लिखते हैं:
‘जब पुरोहितवाद तर्क, विज्ञान और लोककल्याण के मोर्चे पर बुद्ध के विचारों का मुकाबला न कर सका, तो उसने बौद्ध दर्शन के ही मूल तत्वों को चुराकर एक नया आवरण तैयार किया। आदि शंकराचार्य ने बौद्ध दर्शन के ‘शून्यवाद’ और ‘विज्ञानवाद’ को लेकर अद्वैत वेदांत की नींव रखी, जिसके कारण तत्कालीन विद्वानों ने शंकराचार्य को ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ (छिपा हुआ बौद्ध) तक कह दिया!
लेकिन इससे भी बड़ा खेल था पुराणों में बुद्ध को अवतार बना देना। विष्णु पुराण और भागवत पुराण में लिख दिया गया कि असुरों और दैत्यों को वेदों के मार्ग से भटकाने और उन्हें यज्ञ-विमुख करने के लिए भगवान विष्णु ने ‘बुद्ध’ का रूप धरा! सोचिए, बुद्ध को भगवान भी बना दिया गया और साथ ही यह भी स्थापित कर दिया गया कि उनकी शिक्षाएं असुरों को भटकाने वाला छलावा थीं! इस एक रणनीतिक चाल ने तथागत के सामाजिक विद्रोह को पूरी तरह निष्प्रभावी कर दिया।’
— ‘बुद्ध धम्म और भारत’
आत्मसातीकरण की त्रिसूत्रीय रणनीति
- दार्शनिक अपहरण (Philosophical Co-optation): शंकराचार्य ने बौद्धों से ही संन्यास व्यवस्था, मठ पद्धति (मठाम्नाय) और तर्कशास्त्र सीखा। बौद्ध संघ की तर्ज पर चार धामों में चार मठ स्थापित किए गए। परंतु अंतर यह रहा कि बौद्ध मठों में सभी जातियों और वर्गों के लिए द्वार खुले थे, जबकि इन नए मठों में वर्ण-व्यवस्था और पुरोहितवादी सर्वोच्चता को पुनः स्थापित कर दिया गया।
- अवतारवाद की मीठी विष-बेल: अवतारवाद ऐसा जादुई शिकंजा है जिसमें किसी भी विद्रोही को समाहित किया जा सकता है। बुद्ध को विष्णु का अवतार मान लेने के बाद आम जनता में यह भ्रम फैल गया कि बुद्ध और हिंदू धर्म में कोई मौलिक अंतर नहीं है। जब अंतर ही नहीं बचा, तो एक अलग बौद्ध धम्म और संघ की क्या आवश्यकता?
- शिक्षाओं का विकृतिकरण: अवतार तो बना दिया गया, परंतु बुद्ध की ‘चार आर्य सत्य’, ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ और ‘अनात्मवाद’ की शिक्षाओं को विद्यालयों और समाज से पूरी तरह गायब कर दिया गया। बुद्ध की प्रतिमाएं रख ली गईं, परंतु उनके विचार दफन कर दिए गए।
आज के दौर में भी वही हथकंडे
यह प्रक्रिया केवल प्राचीन काल तक सीमित नहीं थी; आज भी आधुनिक राजनीति और समाज में वही रणनीति अपनाई जा रही है:
- क्रांतिकारियों का ‘फोटो-करण’: आज भी किसी क्रांतिकारी विचारक (जैसे भगत सिंह, आंबेडकर, पेरियार या बुद्ध) के विचारों से व्यवस्था को खतरा लगता है, तो उसकी जयंतियां मनाना, उसकी विशाल मूर्तियां बनाना और उस पर मालाएं चढ़ाना शुरू कर दिया जाता है, ताकि युवा पीढ़ी केवल उनकी पूजा करे, उनके विचारों को पढ़कर व्यवस्था के खिलाफ सवाल न पूछे!
- इतिहास का पुनर्लेखन: आज भी यह साबित करने की पुरजोर कोशिशें होती हैं कि बौद्ध धम्म कोई स्वतंत्र जीवन-दर्शन नहीं था, बल्कि वह केवल हिंदू धर्म की ही एक छोटी-मोटी शाखा था, ताकि उसकी समतावादी और जाति-विरोधी धार को कुंद किया जा सके।
तथागत बुद्ध और अवतारवाद में मौलिक अंतर
हमें यह स्पष्ट समझना होगा कि बुद्ध किसी ईश्वर के अवतार नहीं थे, और न ही वे किसी अलौकिक शक्ति के दूत थे:
| विशेषता | पौराणिक अवतारवाद | तथागत बुद्ध का धम्म |
|---|---|---|
| मूल आधार | ईश्वरीय इच्छा और भाग्य | मनुष्य का अपना कर्म और पुरुषार्थ |
| सामाजिक व्यवस्था | चातुर्वर्ण्य और जन्मना जाति का समर्थन | जाति-भेद का पूर्ण खंडन, मानवीय समता |
| मुक्ति का मार्ग | ईश्वरीय कृपा, पूजा-पाठ, यज्ञ और बलि | प्रज्ञा, शील, समाधि और अष्टांगिक मार्ग |
| सत्य की कसौटी | वेद और शास्त्र ही अंतिम प्रमाण हैं | तर्क, प्रत्यक्ष अनुभव और जनहित ही कसौटी |
हमें आज क्या करना चाहिए?
- बुद्ध को ‘अवतार’ नहीं, ‘शिक्षक’ मानना: बुद्ध को किसी मंदिर में बंद भगवान मानने के बजाय उन्हें एक महान वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और मानवतावादी शिक्षक के रूप में स्वीकार करें।
- मूल सूत्रों का स्वाध्याय: केवल दूसरों द्वारा गढ़ी गई कहानियों पर विश्वास न करें; पालि त्रिपिटक, धम्मपद और बुद्ध के प्रामाणिक वचनों का सीधा अध्ययन करें।
- प्रतीकों की राजनीति से सावधान रहें: जब भी कोई नेता या संगठन किसी महापुरुष की पूजा का ढोंग रचे, तो उससे पूछें कि वह उस महापुरुष के समता, शिक्षा और न्याय के सिद्धांतों पर कितना अमल कर रहा है।
एक विचारणीय सवाल
यदि बुद्ध केवल विष्णु के अवतार थे, तो फिर सदियों तक उनके अनुयायी भिक्षुओं पर अत्याचार क्यों हुए और नालंदा की लाखों बौद्ध पांडुलिपियों को क्यों जलाया गया?
विद्रोह को भक्ति में बदलकर क्रांति का गला घोंटने के इस ऐतिहासिक षड्यंत्र को समझने के लिए पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का यह अध्याय हर सत्य-शोधक को पढ़ना चाहिए।
किसी क्रांतिकारी को समाप्त करने का सबसे चतुर तरीका यह है कि उसे मंदिर के गर्भगृह में बैठाकर उसकी पूजा शुरू कर दी जाए ताकि उसकी बातों को कोई न सुने।