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नारी शक्ति वंदन और परिसीमन — कब और कैसे सच होगा 33% का वादा?

एन. सिंह · ·6 मिनट

सितंबर 2023 में जब देश के नए संसद भवन का उद्घाटन हुआ, तो विशेष सत्र में सबसे पहला और ऐतिहासिक कानून पारित किया गया—‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’।

संसद के दोनों सदनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष ने एक स्वर में मेजें थपथपाईं, महिला सांसदों ने एक-दूसरे को बधाई दी, और पूरे देश के मीडिया ने इसे आज़ाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा महिला समर्थक कदम घोषित कर दिया। ऐसा लगा मानो अगले ही चुनाव से संसद में एक तिहाई महिलाएं चुनकर आने लगेंगी।

परंतु जब इस कानून के बारीक अक्षरों (Fine Print) को पढ़ा गया, तो कानून के जानकारों और जागरूक नागरिकों के होश उड़ गए!

इस कानून में धारा 334A जोड़कर दो ऐसी पेचीदा और कठोर शर्तें लगा दी गईं, जिन्होंने इस 33% आरक्षण को अनिश्चितकाल के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया:

  1. पहली शर्त: यह कानून तभी लागू होगा जब कानून बनने के बाद पहली देशव्यापी ‘जनगणना’ (Census) पूरी हो जाएगी और उसके आधिकारिक आंकड़े प्रकाशित हो जाएंगे।
  2. दूसरी शर्त: जनगणना के आंकड़ों के आधार पर जब देश भर के संसदीय क्षेत्रों का नया ‘परिसीमन’ (Delimitation) पूरा हो जाएगा, तभी महिला आरक्षण प्रभावी होगा!

सवाल यह है: 2021 की जो जनगणना आज तक नहीं हो सकी, वह कब होगी? और जिस परिसीमन को लेकर उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच भयानक राजनीतिक विवाद छिड़ा हुआ है, वह कब पूरा होगा? क्या 33% का यह सपना 2029 में पूरा होगा, 2034 में, या फिर 2039 तक लटक जाएगा?


परिसीमन का ज्वालामुखी: उत्तर बनाम दक्षिण का महा-संघर्ष

परिसीमन केवल सीटों की सीमाएं खींचने का तकनीकी काम नहीं है; यह भारतीय संघ के अस्तित्व पर मँडराता सबसे बड़ा संवैधानिक संकट है:

  1. दक्षिण भारत का गंभीर ऐतराज: तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों ने पिछले पचास वर्षों में देश की जनसंख्या नियंत्रण नीतियों को अत्यंत ईमानदारी से लागू किया। उनकी जनसंख्या वृद्धि दर घटी। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जनसंख्या तेजी से बढ़ी।
  2. संसद में सीटों का असंतुलन: यदि आज जनसंख्या के अनुपात में परिसीमन किया गया, तो उत्तर भारत के राज्यों की लोकसभा सीटें भारी संख्या में बढ़ जाएंगी (उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 140 से अधिक हो सकती हैं), जबकि दक्षिणी राज्यों की सीटों का अनुपात घट जाएगा! दक्षिण के राज्यों का साफ कहना है—“क्या जनसंख्या नियंत्रित करने और बेहतर विकास करने का इनाम हमें यह मिलेगा कि संसद में हमारा राजनीतिक महत्व समाप्त कर दिया जाए?”
  3. राजनीतिक गतिरोध: जब तक केंद्र सरकार और दक्षिणी राज्यों के बीच इस बात पर सर्वसम्मति नहीं बन जाती कि सीटों की संख्या कैसे बढ़ाई जाए, तब तक परिसीमन आयोग अपनी अंतिम रिपोर्ट नहीं दे सकता। और जब तक परिसीमन नहीं होगा, तब तक महिला आरक्षण कानून लागू नहीं हो सकता!

33% महिला आरक्षण की समयरेखा: उम्मीद बनाम हकीकत

चरण सरकारी घोषणा और दावा ज़मीनी संवैधानिक हकीकत
कानून पारित होना सितंबर 2023 में संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित केवल सांकेतिक जीत, तत्काल प्रभाव शून्य
जनगणना (Census) जल्द से जल्द पूरा कराने का आश्वासन 2021 से लंबित, अब 2026-27 से पहले आंकड़े आना असंभव
परिसीमन आयोग जनगणना के तुरंत बाद गठित करने की बात उत्तर-दक्षिण विवाद के कारण कम से कम 3 से 5 वर्ष का समय
वास्तविक कार्यान्वयन दावा था कि 2024 या 2029 में लागू होगा यथार्थवादी आकलन के अनुसार 2029 के अंत या 2034 के आम चुनाव में ही संभव

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का निर्मम विश्लेषण

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय ‘परिसीमन का चक्रव्यूह’ में लिखते हैं:

“जब किसी कानून को पास करने का श्रेय आज लेना हो, लेकिन उसे लागू करने की तारीख भविष्य के अनिश्चित गर्भ में छोड़ देनी हो, तो इसे लोकतंत्र में ‘पोस्ट-डेटेड चेक’ कहा जाता है। नारी शक्ति वंदन कानून के साथ यही हुआ है। यदि सरकार की नीयत सचमुच महिलाओं को तुरंत उनका अधिकार देने की थी, तो वह वर्तमान 543 लोकसभा सीटों में से ही 33% सीटें लॉटरी या रोटेशन पद्धति से तुरंत आरक्षित कर सकती थी! लेकिन ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि पुरुषवादी राजनीतिक सत्ता अपनी जीती हुई मौजूदा 543 सीटों में से एक भी सीट किसी महिला को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी! उन्होंने तय किया कि जब नई सीटें बढ़ेंगी, तभी महिलाओं को देंगे। यह त्याग नहीं, बल्कि अपनी जागीर बचाकर बचा-खुचा टुकड़ा दान करने की मानसिकता है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 174-175)

लेखक आगे चेतावनी देते हैं:

“परिसीमन का मुद्दा भारत की एकता के लिए 1947 के विभाजन जितना ही संवेदनशील है। यदि इसे केवल चुनावी बहुमत के अहंकार से थोपा गया, तो देश में एक भयानक क्षेत्रीय अलगाववाद जन्म ले सकता है। और इस पूरे विवाद के बीच बेचारी महिला का आरक्षण बलि का बकरा बन जाएगा।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 178)


समाधान: महिलाओं को तुरंत उनका हक कैसे मिले?

  1. वर्तमान सीटों पर ही तत्काल आरक्षण लागू हो: जनगणना और परिसीमन की अनिश्चित शर्तों को संविधान संशोधन के जरिए तुरंत हटाया जाए और 2029 के आम चुनाव में ही वर्तमान 543 सीटों में से 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएं।
  2. दक्षिण भारत की चिंताओं का स्थायी समाधान: परिसीमन में केवल जनसंख्या को आधार न बनाकर ‘जनसंख्या नियंत्रण में सफलता’ और ‘आर्थिक योगदान’ को 50% भारांक दिया जाए ताकि किसी भी राज्य के साथ अन्याय न हो।
  3. राज्यसभा और विधान परिषदों में भी आरक्षण: नारी शक्ति वंदन अधिनियम में उच्च सदनों (राज्यसभा और विधान परिषदों) में कोई आरक्षण नहीं दिया गया है। इसे तुरंत उच्च सदनों में भी लागू किया जाए।
  4. राजनीतिक दलों पर कानूनी बाध्यता: जब तक परिसीमन का विवाद सुलझे, तब तक चुनाव आयोग जनप्रतिनिधित्व कानून (RPA) में संशोधन करके सभी मान्यता प्राप्त दलों के लिए 33% टिकट महिलाओं को देना अनिवार्य करे।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं का अधिकार केवल चुनावी रैलियों में तालियां बटोरने का एक कानूनी झुनझुना बनकर रह जाएगा, या देश की संसद में आधी आबादी की वास्तविक गूंज कभी सुनाई देगी?

संसद, जनगणना और परिसीमन के इस जटिल त्रिकोण के राजनीतिक रहस्यों को बेबाकी से समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का यह अध्याय हर जागरूक नागरिक को पढ़ना चाहिए।

जब किसी कानून को पास करने का श्रेय आज लेना हो, लेकिन उसे लागू करने की तारीख भविष्य के अनिश्चित गर्भ में छोड़ देनी हो, तो इसे लोकतंत्र में 'पोस्ट-डेटेड चेक' कहा जाता है। नारी शक्ति वंदन कानून के साथ यही हुआ है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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