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संस्थागत क्षरण — जब लोकतंत्र के पहरेदार ही सत्ता के बंधक बन जाएं

एन. सिंह · ·6 मिनट

कल्पना कीजिए कि क्रिकेट के मैदान पर एक बहुत बड़ा मैच चल रहा है।

मैच शुरू होने से पहले ही दोनों टीमों को पता चल जाए कि जो अंपायर मैदान में खड़ा है, वह अंपायरिंग की निष्पक्ष टोपी उतार चुका है और उसने चुपके से सत्ताधारी टीम की जर्सी पहन रखी है! वह विरोधी टीम के हर अच्छे शॉट पर आउट दे देता है, और अपनी चहेती टीम की हर नो-बॉल को नजरअंदाज कर देता है।

क्या ऐसे मैच को कोई भी खेल प्रेमी ‘ईमानदार मुकाबला’ कहेगा? क्या उस मैच की ट्रॉफी की कोई नैतिक वैधता बचेगी?

आज हमारे देश के लोकतांत्रिक तंत्र के साथ ठीक यही भयानक त्रासदी घट रही है!

किसी भी आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र में चार प्रमुख स्तंभ होते हैं जो सरकार की निरंकुशता पर पहरा देते हैं:

  1. चुनाव आयोग (Election Commission): निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने के लिए।
  2. जांच एजेंसियां (CBI, ED, IT): भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों पर बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई के लिए।
  3. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) व सतर्कता आयोग (CVC): सरकारी खजाने के एक-एक रुपये का हिसाब रखने के लिए।
  4. उच्चतम व उच्च न्यायालय (Judiciary): संविधान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए।

एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय 14 (‘अधूरा लोकतंत्र : भारत में संस्थागत कमजोरी और सामाजिक संक्रमण’) में यह स्तब्ध कर देने वाला प्रश्न उठाते हैं: जब ये चारों पहरेदार निष्पक्ष अंपायर बनने के बजाय सत्ताधारी दल के राजनीतिक हथियार बन जाएं, तो क्या भारत का लोकतंत्र केवल एक खोखला ढोंग बनकर नहीं रह जाता?


संस्थागत क्षरण (Institutional Decay) के चार विकराल रूप

  1. जांच एजेंसियों का चयनात्मक उपयोग (Weaponization of Agencies):
    • आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस वर्षों में ईडी और सीबीआई द्वारा दर्ज किए गए 95% से अधिक राजनीतिक मामले केवल विपक्षी दलों के नेताओं पर हुए हैं!
    • और सबसे बड़ा चमत्कार यह होता है कि जैसे ही कोई भ्रष्ट नेता विपक्षी दल छोड़कर सत्ताधारी दल में शामिल हो जाता है, उसके खिलाफ चल रहे सारे मुकदमे रातों-रात बंद हो जाते हैं या ठंडे बस्ते में चले जाते हैं! इसे जनता की भाषा में ‘वॉशिंग मशीन पॉलिटिक्स’ कहा जाता है।
  2. चुनाव आयोग की गिरती साख:
    • मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को कानून बनाकर बाहर कर देना और केवल कैबिनेट मंत्रियों के बहुमत से चुनाव आयुक्त चुनना संस्थागत स्वायत्तता की हत्या है।
    • सत्ताधारी नेताओं के भड़काऊ भाषणों पर आंखें मूंद लेना और विपक्ष पर तुरंत नोटिस जारी करना चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
  3. सीएजी (CAG) की खामोशी:
    • 2014 से पहले सीएजी की 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला आवंटन रिपोर्टों ने देश की सरकारें बदल दी थीं। आज सीएजी की रिपोर्टें संसद में महीनों तक पेश नहीं की जातीं या उन पर कोई बहस ही नहीं होती।
  4. रिटायरमेंट के बाद सरकारी मलाई का लालच:
    • जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस या चुनाव आयुक्त को यह उम्मीद होती है कि रिटायर होने के अगले ही महीने उन्हें राज्यसभा की सीट या राज्यपाल का पद मिल जाएगा, तो क्या वे सरकार के खिलाफ कोई कड़ा फैसला देने की हिम्मत जुटा पाएंगे?

स्वतंत्र संस्थाएं बनाम पालतू संस्थाएं: एक तुलना

संस्था का अंग संवैधानिक आदर्श (स्वायत्त पहरेदार) वर्तमान क्षरण (राजनीतिक हथियार)
चुनाव आयोग टी. एन. शेषन जैसा निर्भीक नेतृत्व जो मंत्रियों की गाड़ियां जब्त कर लेता था सरकार के इशारे पर चुनाव की तारीखें और आचार संहिता तय करने वाला मूक दर्शक
सीबीआई और ईडी देश के हर भ्रष्टाचारी पर बिना किसी राजनीतिक रंग के निष्पक्ष कानूनी प्रहार विपक्ष के नेताओं को तोड़ने और सरकारें गिराने वाली विशेष टास्क फोर्स
न्यायपालिका सरकार के गैर-संवैधानिक कानूनों को तुरंत खारिज करने वाली ढाल संवेदनशील संवैधानिक मुकदमों (इलेक्टोरल बॉन्ड, अनुच्छेद 370) को सालों तक लटकाना
अधिकारियों की निष्ठा देश के संविधान और कानून के प्रति अटूट वफादारी केवल उस दल के प्रति वफादारी जो उनकी अगली मलाईदार पोस्टिंग तय करेगा

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की सीधी चेतावनी

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय 14 में लिखते हैं:

“लोकतंत्र केवल वोट डालने की मशीन का नाम नहीं है; लोकतंत्र उन स्वतंत्र संस्थाओं की रीढ़ पर खड़ा होता है जो सत्ता के अहंकार पर अंकुश लगाती हैं। जब संस्थाएं निष्पक्ष अंपायर बनने के बजाय सत्ताधारी टीम की जर्सी पहनकर खेलने लगें, तो मैच का परिणाम पहले से ही तय हो जाता है। टी.एन. शेषन ने साबित किया था कि अगर चुनाव आयुक्त की रीढ़ की हड्डी सीधी हो, तो बड़े से बड़ा बाहुबली भी कांपने लगता है। लेकिन आज हमारी संस्थाओं के मुखिया सत्ता के आगे घुटने टेक चुके हैं। यह पतन केवल किसी एक पार्टी का नहीं है; यह भारतीय गणराज्य की उस आत्मा का पतन है जिसे हमारे पुरखों ने अपने बलिदान से सींचा था!”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 140-141)

लेखक आगे समाधान की राह दिखाते हैं:

“जब तक संस्थाओं के प्रमुखों की नियुक्ति में विपक्ष, मुख्य न्यायाधीश और नागरिक समाज की वीटो पावर नहीं होगी, तब तक ये संस्थाएं केवल सत्ता के पिंजरे में बंद तोता बनी रहेंगी।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 146)


संस्थागत शुचिता की बहाली के चार कानूनी उपाय

  1. सच्चा त्रि-पक्षीय चयन पैनल: चुनाव आयोग, सीबीआई, सीवीसी और ईडी निदेशकों की नियुक्ति केवल उस पैनल से हो जिसमें प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) तीनों की सर्वसम्मति अनिवार्य हो।
  2. कूलिंग-ऑफ पीरियड (Cooling-off Period) की कानूनी बाध्यता: सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों, चुनाव आयुक्तों और रक्षा प्रमुखों के लिए रिटायरमेंट के कम से कम 3 वर्षों तक किसी भी सरकारी पद, आयोग या राजनीतिक टिकट लेने पर पूर्ण प्रतिबंध हो।
  3. एजेंसियों की स्वतंत्रता का कानून: सीबीआई और ईडी को यूके और अमेरिका की तर्ज पर पूरी तरह संसद के प्रति जवाबदेह स्वतंत्र वैधानिक निकाय बनाया जाए, गृह मंत्रालय का गुलाम नहीं।
  4. पक्षपाती अधिकारियों पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई: यदि कोर्ट में यह साबित हो जाए कि किसी अधिकारी ने दुर्भावना से झूठा केस दर्ज किया था, तो उस अधिकारी की नौकरी तुरंत समाप्त हो और उसे जेल भेजा जाए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

यदि देश में कानून का फैसला इस बात से होने लगे कि आरोपी किस पार्टी का झंडा उठाए हुए है, तो क्या इस देश में कोई भी आम नागरिक कभी सुरक्षित रह पाएगा?

भारतीय लोकतंत्र के इस सबसे गहरे संस्थागत संकट, संवैधानिक पहरेदारों की लाचारी और व्यवस्था सुधार के मार्ग को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ का यह चौदहवां अध्याय हर नागरिक और प्रतियोगी छात्र को पढ़ना चाहिए।

लोकतंत्र केवल वोट डालने की मशीन का नाम नहीं है; लोकतंत्र उन स्वतंत्र संस्थाओं की रीढ़ पर खड़ा होता है जो सत्ता के अहंकार पर अंकुश लगाती हैं। जब संस्थाएं निष्पक्ष अंपायर बनने के बजाय सत्ताधारी टीम की जर्सी पहनकर खेलने लगें, तो मैच का परिणाम पहले से ही तय हो जाता है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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