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चकबंदी का भ्रष्टाचार और दो गज़ मेड़ का खूनी महाभारत

एन. सिंह · ·6 मिनट

यदि आप उत्तर भारत (विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और पंजाब) के किसी भी गाँव की कचहरी या दीवानी अदालत में जाएं, तो आपको एक बहुत ही भयानक और रुला देने वाला दृश्य देखने को मिलेगा।

सफेद दाढ़ी वाले 70-80 साल के बूढ़े किसान, लाठी टेकते हुए, फटे हुए कुर्ते में, अपने हाथ में पीले पड़ चुके नक्शों और कागजों की भारी पोटली दबाए अदालत के बरामदे में तारीख का इंतज़ार कर रहे होते हैं।

जब आप उनसे पूछते हैं—“बाबा, यह मुकदमा कब से चल रहा है?”

तो वह कांपते होंठों से जवाब देते हैं—“बेटा! यह मुकदमा हमारे बाबूजी ने शुरू किया था जब हम दस साल के थे। आज हमारे पोते जवान हो गए, पचास साल बीत गए, घर के सारे जेवर और बैल बिक गए वकीलों की फीस भरते-भरते, लेकिन चकबंदी का फैसला आज तक नहीं हुआ!”

और झगड़ा किस बात का था? झगड़ा किसी करोड़ों की सोने की खदान का नहीं था; झगड़ा था केवल दो फीट ज़मीन की मेड़ (Field Boundary) का! उस दो फीट मेड़ के लिए सगे भाइयों ने एक-दूसरे के सिर पर कुल्हाड़ियां चला दीं, कई पीढ़ियां जेलों में सड़ गईं और गाँव के परिवार हमेशा के लिए तबाह हो गए।

एन. सिंह अपनी चर्चित पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के अध्याय 4 और 8 में पूछते हैं: जिस चकबंदी (Land Consolidation) को आज़ादी के बाद किसानों की भलाई और कृषि सुधार का सबसे बड़ा क्रांतिकारी कदम बताया गया था, वह चकबंदी भारतीय गाँव का सबसे बड़ा खूनी नासूर कैसे बन गई?


चकबंदी का अर्थशास्त्र: रिश्वत, रसूख और गरीब का निर्वासन

चकबंदी का मूल सिद्धांत अत्यंत पवित्र और वैज्ञानिक था: एक किसान का खेत गाँव के पांच अलग-अलग कोनों में बिखरा होता था (एक बीघा पूरब, दो बीघा पश्चिम, आधा बीघा उत्तर), जिससे ट्रैक्टर चलाना, ट्यूबवेल लगाना और फसल की रखवाली करना बहुत मुश्किल होता था। सरकार ने तय किया कि सभी छोटे टुकड़ों को मिलाकर किसान को एक ही जगह बड़ा ‘चक’ (Consolidated Plot) दे दिया जाए।

परंतु राजस्व विभाग के भ्रष्ट तंत्र ने इस पवित्र योजना को सबसे बड़े वसूली रैकेट में बदल दिया:

  1. सड़क और नाली के किनारे का चक रसूखदारों को: जो किसान चकबंदी लेखपाल, कानूनगो और चकबंदी अधिकारी (CO) की जेब गरम करता था, उसका चक मुख्य पक्की सड़क, नहर के किनारे और उपजाऊ ज़मीन पर बना दिया जाता था।
  2. गरीब किसान को नाले और ऊसर में धकेलना: जो गरीब, दलित या कमजोर किसान घूस देने में असमर्थ होता था, उसका पुश्तैनी उपजाऊ खेत छीनकर उसे गाँव के गंदे नाले, तालाब के किनारे, श्मशान के पास या बंजर ऊसर ज़मीन पर फेंक दिया जाता था!
  3. अपील और मुकदमों का अंतहीन दुष्चक्र: चकबंदी में जब गरीब किसान न्याय मांगने चकबंदी अधिकारी (CO), बंदोबस्त अधिकारी (SOC) और उप-संचालक (DDC) के पास जाता है, तो हर स्तर पर फैसले की बोली लगती है। एक ही खेत पर दस-दस बार स्टे ऑर्डर जारी होते हैं और किसान कचहरी की सीढ़ियां घिसते-घिसते कंगाल हो जाता है।

चकबंदी का मूल विजन बनाम ज़मीनी क्रूर यथार्थ

पैमाना कानून का आदर्श विजन (1953 का कानून) ज़मीनी खौफनाक हकीकत
मूल उद्देश्य बिखरी जोतों को इकट्ठा कर खेती की लागत घटाना लेखपालों, वकीलों और बाबुओं के लिए खरबों की घूसखोरी का जरिया
आवंटन का आधार पारदर्शी मूल्यांकन और मिट्टी की उर्वरता का पैमाना जो जितनी मोटी रिश्वत देगा, उसे उतनी ही बेहतरीन ज़मीन मिलेगी
समयसीमा एक गाँव की चकबंदी 2 से 3 वर्षों में पूर्ण होना एक-एक गाँव में 30 से 50 वर्षों तक चकबंदी लटकी रहना
सामाजिक परिणाम किसानों की समृद्धि और आधुनिक वैज्ञानिक खेती पारिवारिक कत्लेआम, अंतहीन रंजिश और किसानों की बर्बादी

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की सीधी चीरफाड़

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के अध्याय ‘भूमि बंदोबस्त और संवेदनहीन शासन’ में लिखते हैं:

“चकबंदी का उद्देश्य था बिखरे हुए खेतों को एक जगह इकट्ठा करना, लेकिन चकबंदी अधिकारियों के भ्रष्टाचार ने गाँव के भाइयों को हमेशा के लिए एक-दूसरे के खून का प्यासा बना दिया। जो घूस देता है, उसका चक सड़क पर आ जाता है; जो गरीब है, उसे दलदल और नाले के किनारे फेंक दिया जाता है। राजस्व अदालतों का यह आलम है कि यदि कोई ईमानदार जज न्याय करना भी चाहे, तो पटवारी की फर्जी रिपोर्ट उसे गुमराह कर देती है। दो गज़ मेड़ के विवाद में भारत के किसानों ने जितना धन और समय कचहरियों में फूंका है, यदि वह पैसा आधुनिक खेती में लगा होता, तो आज भारत का किसान दुनिया का सबसे अमीर किसान होता!”
— एन. सिंह (उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव, पृष्ठ 126-127)

लेखक आगे एक बहुत भयावह सामाजिक सच्चाई दर्ज करते हैं:

“गाँव की चौपालें चकबंदी के दलालों की मंडी बन चुकी हैं। भाई-भाई की हत्या कर रहा है, चाचा भतीजे पर लाठी चला रहा है, और इन लाशों पर मुस्कुराता हुआ लेखपाल अपनी नई कार की किश्त भर रहा है!”
— (उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव, पृष्ठ 130)


चकबंदी को भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने के चार युगांतकारी उपाय

  1. ड्रोन और सैटेलाइट से 3D डिजिटल मैपिंग: पुराने जरीब और फीते के खेल को पूरी तरह बंद कर ‘स्वामित्व योजना’ की तर्ज पर हाई-रिज़ॉल्यूशन ड्रोन और जीपीएस कोऑर्डिनेट्स से खेतों की इंच-इंच सीमाएं डिजिटल सर्वर पर लॉक की जाएं ताकि कोई पटवारी एक इंच भी हेरफेर न कर सके।
  2. पारदर्शी खुली ग्राम सभा में चक आवंटन: किसी भी बंद कमरे में नक्शा न बने; पूरे गाँव के किसानों के सामने प्रोजेक्टर लगाकर सामूहिक सहमति से चकों का निर्धारण हो।
  3. चकबंदी मुकदमों की 6 महीने की सख्त समयसीमा: चकबंदी से जुड़े किसी भी दीवानी विवाद का निपटारा अधिकतम छह महीने के भीतर अनिवार्य हो; लगातार तारीखें देने वाले अफसरों पर दंडात्मक कार्रवाई हो।
  4. मेड़ विवादों के लिए स्थायी जीपीएस पत्थर: खेतों की सीमाओं पर स्थायी कंक्रीट के डिजिटल बारकोड युक्त सीमा-स्तंभ लगाए जाएं ताकि मेड़ काटने का विवाद ही हमेशा के लिए समाप्त हो जाए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या हमारे देश का अन्नदाता अपनी पूरी जिंदगी दो गज़ ज़मीन की मेड़ के लिए कचहरी के चक्कर काटते हुए ही दम तोड़ देगा, या हम उसे इस प्रशासनिक दलदल से मुक्ति दिलाने के लिए आधुनिक तकनीक और न्याय की व्यवस्था करेंगे?

चकबंदी के इस खूनी खेल, राजस्व भ्रष्टाचार के मकड़जाल और ग्रामीण भारत के इस अनकहे दर्द को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का यह अध्याय हर किसान और नीति-निर्माता को पढ़ना चाहिए।

चकबंदी का उद्देश्य था बिखरे हुए खेतों को एक जगह इकट्ठा करना, लेकिन चकबंदी अधिकारियों के भ्रष्टाचार ने गाँव के भाइयों को हमेशा के लिए एक-दूसरे के खून का प्यासा बना दिया। जो घूस देता है, उसका चक सड़क पर आ जाता है; जो गरीब है, उसे दलदल और नाले के किनारे फेंक दिया जाता है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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