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जातीय जनगणना इतनी आसान क्यों नहीं? उपजातियां, नए सरनेम और जमीनी पेचीदगियां

एन. सिंह · ·6 मिनट

आजकल टीवी डिबेट्स और राजनीतिक रैलियों में ‘जाति जनगणना’ (Caste Census) की मांग को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है मानो यह केवल एक बटन दबाने या दस दिनों में पूरा हो जाने वाला सीधा-सादा प्रशासनिक काम हो। नेता माइक पर दहाड़ते हैं—“सरकार चाहे तो एक महीने में सबकी जाति गिन सकती है, लेकिन उसकी नीयत में खोट है!”

परंतु जो लोग भारत के समाजशास्त्र, प्रशासनिक जटिलताओं और ज़मीनी हकीकत से तनिक भी वाकिफ हैं, वे जानते हैं कि भारत में जातियों की गिनती करना दुनिया का सबसे पेचीदा, दलदली और विस्फोटक कार्य है।

यह कोई गेहूं की बोरियां या गाड़ियों की संख्या गिनने जैसा नहीं है। जाति कोई पत्थर पर खुदी हुई स्थिर लकीर नहीं है; यह एक ऐसा बहुरूपिया सामाजिक ढांचा है जो हर बीस किलोमीटर पर अपनी भाषा, उपनाम, श्रेणी और सामाजिक दावेदारी बदल लेता है!


ज़मीनी पेचीदगियां: प्रगणक के सामने खड़े पांच यक्ष-प्रश्न

जब एक प्राथमिक शिक्षक या सरकारी कर्मचारी हाथ में रजिस्टर लेकर गाँव के किसी दरवाजे पर खड़ा होता है, तो उसके सामने ऐसी-ऐसी व्यावहारिक समस्याएं आती हैं जिनका उत्तर समाजशास्त्र की किसी पोथी में नहीं मिलता:

  1. उपजातियों और गोत्रों का अंतहीन चक्रव्यूह: भारत में लगभग 4,000 मुख्य जातियां मानी जाती हैं, परंतु उनकी उपजातियों, उप-उपजातियों और गोत्रों की संख्या 25,000 से भी अधिक है। एक ही जाति के लोग अलग-अलग क्षेत्रों में खुद को अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। उदाहरण के लिए, एक कुम्हार खुद को ‘प्रजापति’ लिखाएगा, दूसरा ‘पंडित’, तीसरा ‘वर्मा’ और चौथा ‘कुम्हार’। प्रगणक उसे किस श्रेणी में दर्ज करेगा?
  2. संस्कृतिकरण (Sanskritization) और प्रतिष्ठा का संघर्ष: समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास ने वर्षों पहले बताया था कि निचली जातियां सामाजिक प्रतिष्ठा पाने के लिए उच्च जातियों के रीति-रिवाज, उपनाम और जीवनशैली अपनाती हैं। आज लाखों परिवार ऐसे हैं जो आरक्षण के लिए खुद को पिछड़ा लिखाना चाहते हैं, परंतु समाज में विवाह और रिश्तेदारी के लिए खुद को क्षत्रिय या ब्राह्मण बताते हैं। गणना के समय वे कौन सा सच दर्ज कराएंगे?
  3. अंतर्राज्यीय विसंगतियां (Inter-State Contradictions): एक ही जाति एक राज्य में अनुसूचित जाति (SC) में शामिल है, दूसरे राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में, और तीसरे राज्य में सामान्य (General) श्रेणी में! यदि कोई परिवार बिहार से दिल्ली या महाराष्ट्र आकर बस गया है, तो उसकी गणना किस श्रेणी में होगी?
  4. अवैध घुसपैठ और फर्जी प्रमाण पत्रों का खेल: सीमावर्ती राज्यों (जैसे पश्चिम बंगाल, असम, बिहार) में लाखों संदिग्ध और अवैध नागरिक अपने नाम के आगे स्थानीय भारतीय जातियों के सरनेम लगाकर बैठे हैं। क्या जाति गणना इन अवैध दावों को वैध करने का हथियार नहीं बन जाएगी?
  5. प्रशासनिक कर्मचारियों का जातिगत पूर्वाग्रह: प्रगणक स्वयं किसी न किसी जाति का होता है। बिहार के जाति सर्वे में यह गंभीर आरोप लगे थे कि कई प्रगणकों ने अपनी जाति की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर लिखी और दूसरी जातियों के घरों पर बिना गए ही मनमाने आंकड़े भर दिए।

2011 के सामाजिक-आर्थिक जाति सर्वेक्षण (SECC) की विफलता

बहुत कम लोग इस ऐतिहासिक तथ्य को जानते हैं कि 2011 में केंद्र सरकार ने खरबों रुपये खर्च करके ‘सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना’ (SECC-2011) कराई थी।

परंतु जब उसका डेटा सामने आया, तो नीति आयोग और रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के होश उड़ गए!

  • भारत में जातियों और उपजातियों के कुल 46 लाख से अधिक भिन्न-भिन्न नाम दर्ज हो चुके थे!
  • लोगों ने जातियों के स्थान पर अपने गांवों के नाम, पिता के नाम, उपनाम, गोत्र और यहाँ तक कि अपनी पसंद के फिल्मी सितारों के नाम तक लिखवा दिए थे।
  • उस डेटा को वर्गीकृत करना इतना असंभव हो गया कि सरकार कभी उसकी आधिकारिक जाति-वार रिपोर्ट सार्वजनिक ही नहीं कर सकी।

जाति गणना की चुनौतियाँ: एक दृष्टि में

चुनौती का स्वरूप ज़मीनी यथार्थ प्रशासनिक व राजनीतिक परिणाम
उपनामों की बहुलता एक ही जाति में दर्जनों अलग-अलग सरनेम (वर्मा, सिंह, शर्मा, चौधरी) वर्गीकरण में भयंकर त्रुटियाँ और कानूनी विवाद
दबाव और धौंस बाहुबली जातियों द्वारा प्रगणकों पर संख्या बढ़ाने का दबाव आंकड़ों की विश्वसनीयता शून्य, फर्जी डेटा का निर्माण
जाति प्रमाण पत्र का धंधा जातियों के नए-नए वर्गों में शामिल होने के लिए कोर्ट-कचहरी और आंदोलन हर जाति द्वारा ओबीसी या एसटी का दर्जा पाने की होड़ (जाट, मराठा, पाटीदार)
धार्मिक जटिलता मुस्लिम और ईसाई धर्म अपनाने के बावजूद पसमांदा और दलित पहचान पंथनिरपेक्षता और संविधान के मूल ढांचे पर संकट

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का तीखा विश्लेषण

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय ‘गिनती की भूलभुलैया’ में लिखते हैं:

“भारत में जाति की गिनती कोई सामान्य प्रशासनिक कार्य नहीं है; यह एक सामाजिक ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़े होकर बारूद तौलने जैसा है। हर जाति अपनी संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना चाहती है ताकि वह राजनीति में अपनी सौदेबाजी की ताकत (Bargaining Power) बढ़ा सके। यदि सरकार किसी जाति की संख्या उसकी उम्मीद से कम घोषित कर दे, तो अगले ही दिन सड़कों पर आगजनी, रेल रोको आंदोलन और हिंसा शुरू हो जाएगी। क्या हमारा कमजोर प्रशासनिक ढांचा इस भयानक सामाजिक टकराव को झेलने के लिए तैयार है?”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 64-65)

लेखक आगे एक बहुत मार्मिक सवाल पूछते हैं:

“हम इक्कीसवीं सदी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर और स्पेस मिशन की बात कर रहे हैं, परंतु हमारी राजनीति देश के युवाओं को 1931 के औपनिवेशिक खांचों में धकेलने पर आमादा है। सवाल यह नहीं है कि हम जाति गिन सकते हैं या नहीं; सवाल यह है कि जाति गिनने के बाद जो सामाजिक नफ़रत और विभाजन पैदा होगा, क्या उसे समेटने की ताकत किसी राजनीतिक दल के पास है?”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 68)


आगे का रास्ता: डेटा का उपयोग कैसे हो?

  1. डिजिटल और पारदर्शी सत्यापन: यदि कभी कोई सामाजिक-आर्थिक सर्वे कराया जाए, तो वह हस्तलिखित कागजों पर न होकर पूरी तरह बायोमेट्रिक और आधार-लिंक्ड डिजिटल माध्यम से हो ताकि कोई भी व्यक्ति दोहरा या फर्जी दावा न कर सके।
  2. आर्थिक संकेतकों को प्राथमिकता: जाति के बजाय आय, भूमि, पक्का मकान, शिक्षा का स्तर और घरेलू संपत्तियों को 80% अधिभार (Weightage) दिया जाए।
  3. जातिगत आंदोलनों के दबाव से मुक्ति: किसी भी जाति को विशेष श्रेणी देने का निर्णय सड़कों पर पत्थरबाजी या वोट-बैंक के दबाव से नहीं, बल्कि स्वतंत्र न्यायिक व सांख्यिकीय आयोगों द्वारा होना चाहिए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या जाति की गिनती भारत को सामाजिक न्याय की ओर ले जाएगी, या यह देश को फिर से 1931 के उस दौर में धकेल देगी जहाँ हर नागरिक केवल अपनी जाति का सैनिक बनकर दूसरे नागरिक से लड़ रहा था?

इस जटिल समस्या के तमाम अनसुलझे पहलुओं, आंकड़ों और प्रशासनिक पेचीदगियों को गहराई से समझने के लिए एन. सिंह की पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का यह अध्याय हर नीति-निर्माता और नागरिक को ज़रूर पढ़ना चाहिए।

भारत में जाति कोई स्थिर रेखा नहीं, बल्कि पानी में खिंची वह लकीर है जो हर दस कोस पर अपना नाम, रूप और दावा बदल लेती है। इसे गिनने का प्रशासनिक दावा अपने आप में सबसे बड़ा भ्रम है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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