अम्बेडकर, भगत सिंह और सावरकर — तीनों के सपनों का भारत क्या था?
एन. सिंह · ·6 मिनट
आज के भारतीय राजनीतिक विमर्श की सबसे दुखद और संकीर्ण तस्वीर यह है कि हमने देश के महान विचारकों और राष्ट्र-नायकों का भी जातिगत और दलीय बँटवारा कर दिया है।
- किसी दलित बस्ती या बहुजन पार्टी के मंच पर केवल बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा दिखाई देगी;
- किसी वामपंथी या छात्र आंदोलन के जुलूस में केवल शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का लाल झंडा लहराएगा;
- और किसी दक्षिणपंथी या हिंदूवादी दल के कार्यालय में केवल स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर का चित्र मिलेगा।
मानो इन तीनों महापुरुषों का आपस में कोई संवाद ही न हो, मानो वे एक-दूसरे के जानी दुश्मन हों! राजनीतिक दल अपनी-अपनी चुनावी सुविधा के अनुसार इन महापुरुषों के चुनिंदा विचारों को काट-छाँटकर अपने वोट-बैंक का पोस्टर बना लेते हैं, और उनके मूल क्रांतिकारी दर्शन को कूड़ेदान में फेंक देते हैं।
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ में इन तीनों महान विचारकों को दलीय चश्मों से मुक्त करके एक ही वैचारिक धरातल पर खड़ा करते हैं और पूछते हैं: इन तीनों नायकों के सपनों का भारत वास्तव में क्या था? क्या हम इन तीनों की महानतम शक्तियों को जोड़कर एक संपूर्ण राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते?
तीन दृष्टिकोण, एक साझा लक्ष्य: भारत की मुक्ति और पुनर्निर्माण
- शहीद भगत सिंह का विज़न (क्रांतिकारी समाजवाद):
- भगत सिंह केवल पिस्तौल चलाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे; वे एक प्रखर मार्क्सवादी और दार्शनिक थे। उनका प्रसिद्ध कथन था—“क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।”
- उनका स्पष्ट मानना था कि केवल अंग्रेजों का चले जाना आज़ादी नहीं है। यदि गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज (देसी पूंजीपति और सामंत) बैठ जाएं और मजदूरों-किसानों का शोषण जारी रहे, तो वह आज़ादी अधूरी है। वे ‘मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का पूर्ण अंत’ चाहते थे।
- बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर का विज़न (संवैधानिक नैतिकता और सामाजिक लोकतंत्र):
- बाबासाहेब ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा के अपने अंतिम भाषण में स्पष्ट चेतावनी दी थी—“हमने 26 जनवरी 1950 को एक विरोधाभास के जीवन में प्रवेश किया है। राजनीति में हमारे पास समानता होगी (एक व्यक्ति, एक वोट), लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में भयानक असमानता होगी। यदि हमने इस असमानता को जल्द से जल्द दूर नहीं किया, तो जो लोग इस विषमता के शिकार हैं, वे इस लोकतांत्रिक इमारत को ध्वस्त कर देंगे।”
- उनका सपना था—स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व (Liberty, Equality, Fraternity) पर आधारित एक जाति-विहीन समाज।
- वीर सावरकर का विज़न (सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सुरक्षा चेतना):
- सावरकर एक प्रखर राष्ट्रवादी, भाषाविद् और यथार्थवादी रणनीतिकार थे। उनका मानना था कि भारत सहस्राब्दियों से आक्रमणों और पराधीनता का शिकार इसलिए हुआ क्योंकि हिंदुओं में एकता का अभाव था, वे जातियों में बंटे थे, और उनमें ‘सैन्य शक्ति’ की भारी कमी थी।
- उनका नारा था—“राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैनिकीकरण!” वे जाति-व्यवस्था और छुआछूत के घोर विरोधी थे (उन्होंने रत्नागिरी में पतित पावन मंदिर बनवाया जहाँ सभी जातियों का प्रवेश था)। वे चाहते थे कि भारत रक्षा के क्षेत्र में इतना शक्तिशाली बने कि कोई विदेशी शक्ति आंख उठाकर न देख सके।
तीनों महापुरुषों के विज़न का तुलनात्मक अध्ययन
| आयाम | शहीद भगत सिंह | बाबासाहेब अम्बेडकर | वीर सावरकर |
|---|---|---|---|
| सर्वोच्च ध्येय | शोषण-मुक्त समाजवादी गणराज्य की स्थापना | सामाजिक लोकतंत्र और जाति-विहीन समतामूलक समाज | शक्तिशाली, अखंड और सुरक्षा-सक्षम सांस्कृतिक राष्ट्र |
| साधन का मार्ग | जनक्रांति, वैचारिक चेतना और साम्राज्यवाद का खात्मा | संवैधानिक साधन, कानून का शासन, शिक्षा और संगठन | राष्ट्रीय एकता, सैन्य आधुनिकीकरण और ऐतिहासिक स्वाभिमान |
| धर्म पर दृष्टिकोण | धर्म को व्यक्तिगत मामला और अक्सर शोषक का औजार माना | हिंदू कुरीतियों को त्यागकर बुद्ध के नैतिक धम्म को अपनाया | हिंदुत्व को धर्म नहीं, बल्कि भू-सांस्कृतिक राष्ट्रीय पहचान माना |
| जाति पर विचार | जाति को वर्ग-संघर्ष और प्रगति की राह में सबसे बड़ी बाधा माना | जाति के पूर्ण उन्मूलन (Annihilation of Caste) के बिना लोकतंत्र अधूरा | जातिगत संकीर्णताओं, रोटी-बेटी के बंधनों का कड़ा विरोध किया |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का युगांतकारी संश्लेषण
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय ‘तीन विज़न, एक राष्ट्र’ में लिखते हैं:
“हमने महापुरुषों को विचारों का प्रकाश-स्तंभ बनाने के बजाय उन्हें जातियों और राजनीतिक पार्टियों के बाड़े में कैद कर दिया है। आज का भारत इन तीनों में से किसी एक को छोड़कर पूरा नहीं हो सकता! यदि हमें भारत की सीमाओं और संप्रभुता की रक्षा करनी है, तो हमें सावरकर की राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि और सैन्य चेतना चाहिए; यदि हमें भारत के 80 करोड़ शोषितों, दलितों और महिलाओं को सामाजिक न्याय और सम्मान देना है, तो हमें अम्बेडकर की संवैधानिक नैतिकता और समता चाहिए; और यदि हमें देश के प्राकृतिक संसाधनों और मजदूरों-किसानों को कॉर्पोरेट लूट से बचाना है, तो हमें भगत सिंह का समाजवाद और त्याग चाहिए! इन तीनों का समन्वय ही ‘अनोखा भारत’ बना सकता है!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 256-257)
लेखक आगे राजनीतिज्ञों को चेतावनी देते हैं:
“जब तक आप भगत सिंह की क्रांति, अम्बेडकर के संविधान और सावरकर के राष्ट्र-प्रेम को एक साथ अपनी छाती से नहीं लगाएंगे, तब तक आप केवल टुकड़ों में बंटे हुए एक कमज़ोर भारत का ही नेतृत्व कर पाएंगे।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 260)
तीनों दृष्टियों से आज के भारत के लिए चार सूत्र
- अम्बेडकर से सीखें: संविधान की सर्वोच्चता, संस्थाओं की निष्पक्षता, और समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की मानवीय गरिमा की रक्षा।
- भगत सिंह से सीखें: अंधविश्वास और रूढ़ियों पर तर्क की चोट, निस्वार्थ देशसेवा, और क्रोनी पूंजीपतियों के खिलाफ आर्थिक समानता का संघर्ष।
- सावरकर से सीखें: राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति कोई समझौता न करना, आधुनिक विज्ञान व हथियारों की आत्मनिर्भरता, और जातियों की दीवारें तोड़कर राष्ट्रीय एकता।
- महापुरुषों की दलीय कैद से मुक्ति: विश्वविद्यालयों और स्कूलों में इन तीनों विचारकों के मूल साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन कराया जाए ताकि युवा पीढ़ी पूर्वाग्रहों से मुक्त हो सके।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या हम महापुरुषों को केवल चुनावी पोस्टरों पर माला पहनाने के लिए इस्तेमाल करते रहेंगे, या उनके जीवन के महानतम आदर्शों को एक साथ मिलाकर एक अखंड और प्रबुद्ध भारत बनाएंगे?
भारत के इन तीन महानतम सपूतों के वास्तविक विचारों और उनके ऐतिहासिक समन्वय को गहराई से समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह अध्याय हर प्रबुद्ध नागरिक को पढ़ना चाहिए।
हमने महापुरुषों को विचारों का प्रकाश-स्तंभ बनाने के बजाय उन्हें जातियों और राजनीतिक पार्टियों के बाड़े में कैद कर दिया है। अम्बेडकर केवल दलितों के नहीं, भगत सिंह केवल वामपंथियों के नहीं, और सावरकर केवल दक्षिणपंथियों के नहीं हैं; वे सब भारत की महान वैचारिक प्रयोगशाला के अनमोल अध्याय हैं।