घटता जोत का रकबा — जब एक बीघे में बँट गया परिवार, तो चूल्हा कैसे जले?
एन. सिंह · ·3 मिनट
आज़ादी के समय भारत में प्रति व्यक्ति कृषि भूमि का औसत रकबा लगभग 2.23 हेक्टेयर था।
आज 2026 में यह घटकर मात्र 1.08 हेक्टेयर से भी कम रह गया है!
कृषि जनगणना के अनुसार, भारत के कुल किसानों में से 86 प्रतिशत से अधिक किसान अब ‘सीमांत एवं लघु किसान’ (Small and Marginal Farmers) की श्रेणी में आ चुके हैं। यानी उनके पास 1 से 2 एकड़ या उससे भी कम ज़मीन है।
गाँव में जाकर देखिए। एक खेत के बीच से चार मेड़ें निकल आई हैं। भाई-भाई में एक बित्ता ज़मीन के लिए लाठियां चल रही हैं, कचहरियों में मुकदमे चल रहे हैं।
सवाल यह है: जब ज़मीन का टुकड़ा इतना छोटा हो जाए कि उसमें आधुनिक कंबाइन हार्वेस्टर या ट्रैक्टर भी ठीक से न घूम सके, तो वह खेती किसी परिवार का साल भर का खर्चा कैसे उठा सकती है?
खंडित खेती और लागत का विस्फोट
अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के नौवें अध्याय में लेखक एन. सिंह इस ‘भूमि विखंडन’ (Fragmentation of Land Holdings) का वैज्ञानिक और आर्थिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।
वे समझाते हैं कि छोटी जोत का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि किसान ‘पैमाने की अर्थव्यवस्था’ (Economies of Scale) का लाभ नहीं ले पाता।
- अगर 20 बीघे का एक चक हो, तो एक ट्यूबवेल, एक सोलर पंप और एक ट्रैक्टर से पूरे खेत की सिंचाई और जुताई हो सकती है।
- लेकिन जब वही ज़मीन 20 टुकड़ों में बँट जाती है और अलग-अलग दिशाओं में बिखर जाती है, तो हर किसान को अलग से पानी का किराया, अलग से जुताई का भाड़ा और अलग से मज़दूरी देनी पड़ती है।
नतीजा यह होता है कि फसल की कुल कीमत से अधिक उसकी लागत बैठ जाती है! किसान रात-दिन खटता है, लेकिन साल के अंत में हिसाब लगाने पर पता चलता है कि वह पहले से ज़्यादा कर्ज़दार हो चुका है।
किताब से कड़वा सच
“भूमि के इस अंतहीन विखंडन ने किसान की सौदेबाजी की ताकत (Bargaining Power) को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। छोटा किसान न तो थोक भाव में सस्ता खाद-बीज खरीद सकता है और न ही अपनी थोड़ी सी उपज को बड़े शहर की मंडी में ले जाने का भाड़ा उठा सकता है। वह स्थानीय छोटे दलाल को औने-पौने दाम पर बेचने को विवश होता है। जब तक हम चकबंदी को एक ईमानदार राष्ट्रीय अभियान नहीं बनाएंगे और सहकारी/सामूहिक खेती की ओर नहीं बढ़ेंगे, तब तक छोटी जोत किसान की कब्रगाह साबित होती रहेगी।”
— ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ (अध्याय 9)
असली समाधान क्या है?
- ईमानदार और पारदर्शी चकबंदी (Land Consolidation): हर 10 साल में निष्पक्ष डिजिटल चकबंदी हो, जिसमें किसान के बिखरे हुए खेतों को एक जगह इकट्ठा किया जाए, ताकि मेड़ों में बर्बाद होने वाली 5-10% ज़मीन बच सके।
- सहकारी व समूह खेती (Cooperative Farming): छोटे किसान अपनी मिल्कियत को छोड़े बिना मिलकर साझा जुताई, साझा सिंचाई और साझा मार्केटिंग करें।
- उच्च-मूल्य फसलों (High-Value Crops) की ओर रुझान: छोटे खेतों में केवल गेहूं-धान उगाने के बजाय पॉलीहाउस, बागवानी, मशरूम, औषधीय पौधे और डेयरी का समन्वित मॉडल (Integrated Farming System) अपनाया जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या सिर्फ ज़मीन का कागज़ी टुकड़ा थामे रहना ही स्वाभिमान है, चाहे पेट भूखा रहे? या फिर नई सोच और सहकारिता के साथ अपनी ताकत को जोड़कर खेती को मुनाफेदार बनाना असली बुद्धिमत्ता है? इस गंभीर यथार्थ को समझने के लिए पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का नवां अध्याय अवश्य पढ़ें।
एक समय था जब गाँव में 50 बीघे की एक साझा खेती होती थी। आज चार पीढ़ियों के बंटवारे के बाद हर भाई के हिस्से में आधा-आधा बीघा आया है। उस आधे बीघे में मेड़ बांधने में ही ज़मीन खत्म हो जाती है; उसमें ट्रैक्टर कैसे चले और परिवार कैसे पले?