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सिद्धार्थ का महाभिनिष्क्रमण — क्या यह परिवार से पलायन था या मानवता की खोज?

एन. सिंह · ·4 मिनट

कल्पना कीजिए 29 वर्ष के एक ऐसे राजकुमार की जिसके पैरों के नीचे संसार के सारे सुख बिछे थे।

सुंदर महल, ग्रीष्म-वर्षा-शीत के तीन अलग-अलग प्रासाद, नृत्य और संगीत की महफिलें, सुंदर पत्नी यशोधरा और अभी-अभी गोद में आया नवजात शिशु राहुल। पिता शुद्धोदन का पूरा प्रयास था कि इस युवक की आँखें कभी किसी बूढ़े, बीमार या मुरझाए हुए फूल पर भी न पड़ें।

लेकिन एक रात, जब पूरा महल गहरी नींद में सो रहा था, सिद्धार्थ चुपचाप उठते हैं। अपने सारथी छंदक को जगाते हैं, अपने प्रिय घोड़े कंथक पर सवार होते हैं और अनोमा नदी के तट पर पहुँचकर अपने राजसी वस्त्र, मुकुट और आभूषण उतारकर फेंक देते हैं। अपनी तलवार से अपने सुंदर केश काट डालते हैं और एक भिक्षु की तरह जंगल की ओर बढ़ जाते हैं।

सदियों से आलोचक यह सवाल उठाते रहे हैं: “क्या एक युवा पिता का अपनी सोती हुई पत्नी और दुधमुंहे बच्चे को छोड़कर भाग जाना कर्तव्य से पलायन नहीं था?”


पलायन बनाम महा-अभियान

अपनी पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ के पहले भाग में लेखकद्वय नथुनी सिंह ‘कोदन्ना’ और विमला सिंह इस तथाकथित ‘पलायन’ की मूल दार्शनिक तहों को उजागर करते हैं।

वे समझाते हैं कि साधारण मनुष्य जब घर छोड़ता है, तो वह किसी व्यक्तिगत विरक्ति, कलह या निराशा के कारण भागता है। लेकिन सिद्धार्थ किसी निजी दुःख से नहीं भागे थे। उनके पास दुनिया का कोई अभाव नहीं था।

वे इसलिए निकले क्योंकि उन्होंने देखा कि जिस महल को लोग ‘सुरक्षित’ समझते हैं, वह वास्तव में आग की लपटों से घिरा हुआ है!

जरा (बुढ़ापा), व्याधि (बीमारी) और मृत्यु केवल किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं है; यह समस्त मानव जाति का शाश्वत संकट है।

सिद्धार्थ ने खुद से पूछा: “जब यह शरीर एक दिन सड़ेगा, जब ये आंखें एक दिन बुझेंगी, जब यह सुंदर रूप एक दिन हड्डियों का ढेर बनेगा, तो इस क्षणभंगुर तमाशे में खोए रहना क्या बुद्धिमानी है? क्या कोई ऐसा सत्य नहीं है जो जन्म और मरण के इस अंतहीन चक्र से पार ले जा सके?”

यदि वे महल में राजा बनकर बैठे रहते, तो शाक्यों के इतिहास के किसी पन्ने पर शुद्धोदन के बाद उनका नाम भी दर्ज होकर खत्म हो जाता। लेकिन वे इसलिए निकले ताकि पूरी मानवता के लिए ‘अमृत’ की खोज कर सकें।


किताब से कड़वा सच

लेखकद्वय ‘बुद्ध धम्म और भारत’ में इस महाभिनिष्क्रमण का विश्लेषण करते हुए लिखते हैं:

“जब घर में आग लगी हो, तो जो व्यक्ति खिड़की तोड़कर बाहर भागता है, आप उसे भगोड़ा नहीं कहते; आप उसे बुद्धिमान कहते हैं। सारथी छंदक ने सिद्धार्थ को बहुत समझाया कि लौट चलिए, अभी आपकी जवानी है, अभी भोगने की उम्र है। बुद्ध ने जवाब दिया—‘छंदक! आपको महल दिखाई पड़ता है, मुझे चिताएं धू-धू कर जलती दिखाई पड़ती हैं। आपको साम्राज्य दिखता है, मुझे मृत्यु का जबड़ा खुला दिखता है। अब मेरे विश्वास को कोई लौटा नहीं सकता।’ बुद्ध का गृहत्याग परिवार का त्याग नहीं था, बल्कि पूरे विश्व को अपना परिवार बनाने की पहली छलांग थी।”
— ‘बुद्ध धम्म और भारत’ (भाग-१, पृष्ठ 12-14)


असली समाधान क्या है?

  1. अंधे सुख के मोह से मुक्ति: जीवन की नश्वरता को स्वीकार करना ही वास्तविक ज्ञान की शुरुआत है। जब तक हम मृत्यु के सच से आंखें चुराते रहेंगे, तब तक हमारा जीवन केवल एक उथला दिखावा बना रहेगा।
  2. सहानुभूति का विस्तार: अपने संकीर्ण परिवार, जाति और संप्रदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर समस्त जीवधारियों के दुःख को अपना दुःख समझना ही बुद्ध-चेतना का पहला कदम है।
  3. सत्य की खोज में साहस: परंपरा, सत्ता और रूढ़ियों के बने-बनाए ढर्रों को तोड़कर स्वयं अपनी प्रज्ञा (विवेक) से सत्य को खोजने का जोखिम उठाना।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

यदि सिद्धार्थ उस रात महल से बाहर न निकले होते, तो क्या इस संसार को कभी ‘करुणा’, ‘प्रज्ञा’ और ‘अष्टांगिक मार्ग’ का वह आलोक मिल पाता जिसने एशिया के आधे हिस्से को सभ्यता का पाठ पढ़ाया?

बुद्ध के इस महान जीवन-मोड़ को गहराई से समझने के लिए पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का पहला भाग अवश्य पढ़ें।

बुद्ध महलों से इसलिए नहीं भागे कि उन्हें जीवन से डर था; वे इसलिए निकले क्योंकि उन्हें महलों के भीतर जलती हुई मृत्यु और सड़ते हुए जीवन का सच दिख गया था। जिसे दुनिया सुख कहती है, वह केवल आँख मूंदकर मौत के आने का इंतज़ार करना है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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