'किचन पॉलिटिक्स' बनाम असली बराबरी — घर के फैसले और संसद की कुर्सी
एन. सिंह · ·6 मिनट
आजकल सोशल मीडिया, ट्विटर और आधुनिक शहरी पॉडकास्टों में नारीवाद और महिला समानता पर बड़ी तीखी और आकर्षक बहसें चलती हैं।
अक्सर चर्चा का केंद्र यह होता है कि “सुबह की चाय पति क्यों नहीं बनाता? रात के जूठे बर्तन केवल पत्नी ही क्यों धोए? रविवार को झाड़ू-पोंछा लगाने की ज़िम्मेदारी किसकी है?” इन बहसों को बड़ा आधुनिक, प्रगतिशील और क्रांतिकारी मानकर लाखों लाइक्स और शेयर्स दिए जाते हैं।
निसंदेह, घर के घरेलू श्रम में पुरुषों की भागीदारी होनी चाहिए और काम का कोई लिंग नहीं होता।
परंतु लेखक एन. सिंह हमें इस सतही ‘किचन पॉलिटिक्स’ से बाहर निकलकर एक अत्यंत गहरे, असहज और बुनियादी प्रश्न के रूबरू खड़ा करते हैं: क्या चार बर्तन धो लेने या चाय बना देने से समाज में स्त्री को पुरुषों के बराबर अधिकार मिल जाता है? या फिर इस तरह की प्रतीकात्मक और उथली बहसों में उलझाकर स्त्री के वास्तविक अधिकारों—जैसे संपत्ति में मालिकाना हक, परिवार और समाज के बड़े नीतिगत फैसलों में वीटो पावर, और आर्थिक स्वतंत्रता—को पीछे धकेला जा रहा है?
घरेलू श्रम का अदृश्य योगदान बनाम संपत्ति का शून्य अधिकार
भारत के आर्थिक सर्वेक्षण और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय महिलाएं प्रतिदिन औसतन 5 से 7 घंटे ऐसा अवैतनिक घरेलू श्रम (Unpaid Care Work) करती हैं, जिसका देश की जीडीपी में कोई हिसाब नहीं रखा जाता। यदि इस श्रम का मौद्रिक मूल्यांकन किया जाए, तो यह खरबों डॉलर का बैठेगा।
लेकिन इसके बदले में स्त्री को क्या मिलता है?
- संपत्ति में शून्य हिस्सेदारी: हिंदू उत्तराधिकार कानून में 2005 में संशोधन करके बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबर का हकदार बना दिया गया। लेकिन आज भी 90% से अधिक बहनें अपने भाइयों के नाम ज़मीन और मकान चुपचाप लिख देती हैं ताकि उनका ‘मायका’ न छूटे! ज़मीन और पूंजी का 95% मालिकाना हक आज भी पुरुषों के ही हाथों में केंद्रित है।
- वित्तीय स्वतंत्रता का अभाव: जो महिलाएं नौकरी करती हैं और महीने में लाखों रुपये कमाती हैं, उनके एटीएम कार्ड और निवेश के फैसले भी अक्सर उनके पति, ससुर या पिता ही लेते हैं। स्त्री केवल एक कमाने वाली मशीन बनी रहती है, निर्णय लेने वाली स्वायत्त आत्मा नहीं।
- संसद बनाम रसोई का दोहरा चरित्र: एक महिला संसद में जाकर देश के बजट पर भाषण दे सकती है, परंतु शाम को जब वह घर लौटती है, तो परिवार का मुखिया पुरुष ही तय करता है कि पैसा कहाँ खर्च होगा और बच्चे किस स्कूल में पढ़ेंगे!
सतही ‘किचन पॉलिटिक्स’ बनाम वास्तविक बुनियादी बराबरी
| आयाम | सतही सोशल मीडिया विमर्श (दिखावा) | वास्तविक संरचनात्मक बराबरी (मूल अधिकार) |
|---|---|---|
| बहस का दायरा | चाय कौन बनाएगा, बर्तन कौन साफ करेगा, कपड़े कौन धोएगा | ज़मीन, मकान, बैंक खातों और कंपनियों के बोर्ड में 50% मालिकाना हक |
| फैसलों का अधिकार | केवल यह तय करना कि आज शाम खाने में क्या सब्जी पकेगी | परिवार के निवेश, ज़मीन की खरीद-फरोख्त और बच्चों के भविष्य के बड़े फैसले |
| आर्थिक सुरक्षा | पति द्वारा दिए जाने वाले जेब-खर्च (Pocket Money) पर निर्भरता | स्त्री के अपने नाम पर स्वतंत्र संपत्ति और वित्तीय निवेश पोर्टफोलियो |
| सामाजिक प्रतिष्ठा | ‘त्याग की देवी’ और ‘ममता की मूरत’ कहकर शोषण को महिमामंडित करना | एक स्वतंत्र, स्वाभिमानी और गलत बात पर विद्रोह करने वाली इंसान के रूप में सम्मान |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की दार्शनिक दृष्टि
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अंतिम अध्याय ‘समानता का असली मर्म’ में लिखते हैं:
“जब तक किसी समाज में स्त्री को अपनी संपत्ति का मालिक बनने, अपनी पसंद से जीने और परिवार के वित्तीय फैसलों में बराबरी का हक नहीं मिलता, तब तक संसद की कुर्सी पर बैठना भी केवल एक सतही दिखावा बना रहेगा। हमने स्त्री को ‘देवी’ बनाकर मंदिर के चबूतरे पर बैठा दिया, ताकि उसे एक सामान्य हाड़-मांस के इंसान का हक न देना पड़े! देवी की पूजा आसान है, क्योंकि देवी ज़मीन में हिस्सा नहीं मांगती; देवी दहेज की हिंसा पर मुकदमा नहीं करती; और देवी पुरुष के अन्यायों के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद नहीं करती। हमें देवी नहीं चाहिए, हमें बराबर का नागरिक चाहिए!”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 188-189)
लेखक आगे एक बहुत मार्मिक सवाल पूछते हैं:
“अगर किसी महिला के नाम पर एक इंच ज़मीन नहीं है, यदि उसके पास अपना कोई बैंक बैलेंस नहीं है, तो वह संसद में कानून पास करके भी अपने ही घर में पराधीन रहेगी। असली बराबरी तब आएगी जब गाँव की खतौनी में हर खेत के आगे जितना नाम पुरुष का हो, उतना ही नाम उसकी पत्नी और बेटी का दर्ज हो!”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 192)
वास्तविक बराबरी के लिए चार युगांतकारी कदम
- पैतृक संपत्ति का अनिवार्य और स्वतः पंजीकरण: बेटियों के नाम पैतृक संपत्ति का पंजीकरण अनिवार्य किया जाए और ‘हक-त्याग’ (Relinquishment Deed) के नाम पर दबाव डालकर कराए जाने वाले समझौतों पर सख्त कानूनी रोक लगे।
- घरेलू श्रम का आर्थिक मूल्यांकन व संयुक्त खाते: शादी के बाद पति की हर आय और संपत्ति में पत्नी का 50% कानूनी हिस्सा स्वतः दर्ज हो। हर सरकारी व निजी संपत्ति केवल संयुक्त नाम (Joint Ownership) से ही खरीदी जा सके।
- निर्णय लेने की स्वतंत्रता का सम्मान: विवाह, करियर, मातृत्व और जीवनशैली के चुनाव में स्त्री की स्वायत्तता का पूर्ण सम्मान किया जाए; ‘परिवार की इज्जत’ का बोझ अकेले औरत के सिर पर लादने की सामंती मानसिकता का अंत हो।
- समान काम के लिए समान वेतन (Equal Pay for Equal Work): असंगठित क्षेत्र, कृषि और निर्माण कार्यों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 30% से 40% कम मजदूरी दी जाती है। इस अपराध पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या हम अपनी बेटियों को केवल किसी दूसरे घर की ‘गृहलक्ष्मी’ बनने का प्रशिक्षण देते रहेंगे, या उन्हें इस देश और समाज का भाग्य अपने हाथों से लिखने वाली स्वतंत्र आत्मा बनाएंगे?
स्त्री और पुरुष की सच्ची बराबरी, भारतीय परिवार के आंतरिक ढाँचे और सामाजिक न्याय के गहरे दर्शन को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का यह समापन अध्याय हर पुरुष और स्त्री को एक साथ बैठकर पढ़ना चाहिए।
जब तक किसी समाज में स्त्री को अपनी संपत्ति का मालिक बनने, अपनी पसंद से जीने और परिवार के वित्तीय फैसलों में बराबरी का हक नहीं मिलता, तब तक संसद की कुर्सी पर बैठना भी केवल एक सतही दिखावा बना रहेगा।