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क्या भारत वास्तव में गणतंत्र है या केवल बहुमत का 'भीड़तंत्र'?

एन. सिंह · ·6 मिनट

हम सब हर साल 26 जनवरी को ‘गणतंत्र दिवस’ (Republic Day) मनाते हैं और 15 अगस्त को ‘स्वतंत्रता दिवस’। हम गर्व से कहते हैं कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र (Democracy) भी है और एक महान गणतंत्र (Republic) भी।

परंतु क्या हमने कभी एक शांत पल में यह सोचा है कि ‘लोकतंत्र’ (Democracy) और ‘गणतंत्र’ (Republic) में क्या अंतर है?

प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटो और अरस्तू से लेकर अमेरिका के संविधान निर्माताओं (थॉमस जेफरसन, जेम्स मैडिसन) और भारत के बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर तक—सभी विचारकों ने एक भयानक खतरे की चेतावनी दी थी: यदि लोकतंत्र को संवैधानिक नियमों और संस्थागत अंकुशों से न बांधा जाए, तो वह बहुत तेजी से ‘भीड़तंत्र’ (Mobocracy) या बहुसंख्यक तानाशाही (Tyranny of the Majority) में बदल जाता है!

एन. सिंह अपनी कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय 25 (‘भारत में लोकतंत्र है या गणतंत्र?’) में पूछते हैं: 21वीं सदी के भारत में आज क्या हावी है—संविधान का पवित्र कानून (Republic) या सड़कों, सोशल मीडिया और टीवी स्टूडियो की अनियंत्रित और हिंसक भीड़ (Mobocracy)?


लोकतंत्र बनाम गणतंत्र: एक मौलिक दार्शनिक अंतर

  1. शुद्ध लोकतंत्र (Pure Democracy) का खतरा:
    • शुद्ध लोकतंत्र का सीधा नियम है—‘बहुमत का शासन’ (Majoritarian Rule)। यदि किसी समाज में 51 प्रतिशत लोग यह तय कर लें कि बाकी के 49 प्रतिशत लोगों को बोलने की आज़ादी नहीं होगी, उनकी संपत्तियां छीन ली जाएंगी, या उनके पूजा-स्थलों को तोड़ दिया जाएगा—तो संख्या के हिसाब से वह ‘लोकतांत्रिक’ फैसला होगा, लेकिन नैतिकता और न्याय के हिसाब से वह घोर बर्बरता होगी!
  2. गणतंत्र (Constitutional Republic) की शक्ति:
    • गणतंत्र वह व्यवस्था है जहाँ सर्वोच्च शक्ति किसी राजा, किसी नेता या किसी भीड़ के हाथ में नहीं होती; सर्वोच्च शक्ति ‘संविधान और कानून के शासन’ (Rule of Law) के हाथ में होती है।
    • गणतंत्र में एक अकेले, सबसे कमजोर और शोषित व्यक्ति को भी वे अविभाज्य मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) प्राप्त होते हैं, जिन्हें 99% की आक्रामक भीड़ या 543 सांसदों का पूर्ण बहुमत भी उससे नहीं छीन सकता!

भीड़तंत्र (Mobocracy) के लक्षण: भारत आज कहाँ खड़ा है?

एन. सिंह रेखांकित करते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय व्यवस्था में गणतंत्र के मूल्य कमजोर हुए हैं और भीड़तंत्र के खतरनाक लक्षण उभरे हैं:

  1. सड़क का न्याय और मॉब लिंचिंग (Street Justice): जब किसी अपराध के संदेह में भीड़ खुद अदालत बनकर किसी इंसान को पीट-पीटकर मार डालती है, और समाज के कुछ लोग उसका तालियां बजाकर समर्थन करते हैं, तो समझ लीजिए कि गणतंत्र मर चुका है।
  2. बुलडोजर न्याय (Bulldozer Culture): जब बिना किसी न्यायिक जांच, बिना साक्ष्य और बिना कोर्ट के आदेश के किसी आरोपी के घर पर बुलडोजर चला दिया जाता है और जनता तालियां बजाती है, तो वह कानून का शासन नहीं, बल्कि प्रशासनिक भीड़तंत्र है।
  3. मीडिया और सोशल मीडिया ट्रायल: कोर्ट में फैसला होने से पहले ही टीवी चैनलों के स्टूडियो और व्हाट्सएप-ट्विटर की ट्रोल आर्मी तय कर देती है कि कौन देशद्रोही है और किसे जेल भेजा जाना चाहिए।

लोकतंत्र, गणतंत्र और भीड़तंत्र: एक तुलनात्मक तालिका

कसौटी शुद्ध लोकतंत्र (Democracy) संवैधानिक गणतंत्र (Republic) विकृत भीड़तंत्र (Mobocracy)
सर्वोच्च सत्ता 51% बहुमत की इच्छा संविधान, प्राकृतिक न्याय और कानून सड़कों, सोशल मीडिया व टीवी की उन्मादी भीड़
व्यक्ति के अधिकार बहुमत की दया पर निर्भर संविधान द्वारा संरक्षित अविभाज्य अधिकार भीड़ की भावना को ठेस पहुँचते ही अधिकार समाप्त
न्यायपालिका की भूमिका संसद और बहुमत के आगे लाचार स्वतंत्र, निष्पक्ष और संविधान की सजग प्रहरी जनभावना और राजनीतिक दबाव के आगे नतमस्तक
शासन का चरित्र संख्या-बल का प्रदर्शन विवेक, संयम, संस्थागत संतुलन और मर्यादा प्रतिशोध, बुलडोजर, ट्रोलिंग और बाहुबल

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का निर्मम दर्शन

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय 25 में लिखते हैं:

“लोकतंत्र यदि अनियंत्रित हो जाए, तो वह 51 भेड़ों और 49 भेड़ियों के उस मतदान जैसा बन जाता है जहाँ इस बात पर फैसला होता है कि रात के खाने में किसे खाया जाए! गणतंत्र वह संविधान है जो उन 49 अल्पसंख्यकों को भेड़ियों के पंजों से बचाता है। भारत ने 26 जनवरी 1950 को खुद को ‘गणतंत्र’ घोषित किया था, ताकि यहाँ किसी एक धर्म, एक जाति या एक बाहुबली दल का तांडव न चल सके। परंतु आज हमारे देश में न्याय अदालतों से निकलकर सड़कों के उन्माद और टीवी एंकरों के चीखने-चिल्लाने पर आ गया है। जब पुलिस और प्रशासन कानून देखने के बजाय यह देखने लगें कि किस भीड़ की आवाज़ सबसे ऊँची है, तो वह देश गणतंत्र नहीं रहता; वह आदिम कबायली समाज बन जाता है जहाँ जिसकी लाठी, उसकी भैंस का नियम चलता है!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 272-273)

लेखक आगे न्यायपालिका को चेताते हैं:

“यदि देश की सर्वोच्च अदालतें भी बहुसंख्यक भीड़ के दबाव में आकर संविधान के बुनियादी सिद्धांतों से समझौता करने लगेंगी, तो भारत का यह विशाल गणतांत्रिक महल ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 276)


सच्चे गणतंत्र की पुनर्स्थापना के चार अनिवार्य कदम

  1. कानून के शासन की पूर्ण बहाली: किसी भी आरोपी या नागरिक के साथ केवल स्थापित आपराधिक कानून (CrPC/IPC) और अदालती प्रक्रिया से ही व्यवहार हो; किसी भी प्रकार के गैर-कानूनी विध्वंस या सड़क-न्याय पर अधिकारियों को सीधी जेल हो।
  2. न्यायपालिका की निर्भीक स्वायत्तता: जजों की नियुक्तियों और उनके फैसलों को राजनीतिक हस्तक्षेप और मीडिया के दबाव से पूर्णतः मुक्त रखा जाए; रिटायरमेंट के तुरंत बाद सरकारी पदों पर रोक लगे।
  3. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा: असहमति और शांतिपूर्ण विरोध को देशद्रोह मानने की प्रवृत्ति पर कड़ा कानूनी अंकुश लगे; संविधान के अनुच्छेद 19 की आत्मा को जीवित रखा जाए।
  4. संवैधानिक साक्षरता अभियान: देश के हर नागरिक, छात्र और पुलिसकर्मी को यह सिखाया जाए कि संविधान किसी किताब का नाम नहीं, बल्कि हर नागरिक की रक्षा का अभेद्य कवच है।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या आप एक ऐसा देश चाहते हैं जहाँ फैसला आपकी योग्यता और कानून की कसौटी पर हो, या एक ऐसा देश जहाँ किसी दिन उन्मादी भीड़ आपके दरवाजे पर आकर आपके जीने का हक छीन ले?

लोकतंत्र और गणतंत्र के इस नाजुक संतुलन और भीड़तंत्र के आसन्न खतरे को गहराई से समझने के लिए एन. सिंह की कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह पच्चीसवां अध्याय हर प्रबुद्ध नागरिक को पढ़ना चाहिए।

लोकतंत्र यदि अनियंत्रित हो जाए, तो वह 51 भेड़ों और 49 भेड़ियों के उस मतदान जैसा बन जाता है जहाँ इस बात पर फैसला होता है कि रात के खाने में किसे खाया जाए! गणतंत्र वह संविधान है जो उन 49 अल्पसंख्यकों को भेड़ियों के पंजों से बचाता है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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