जातियाँ कैसे बनीं? — व्यवस्था से व्यवस्था-विरोध तक का असली इतिहास
एन. सिंह · ·6 मिनट
जब भी भारत में जाति (Caste) पर चर्चा होती है, तो रूढ़िवादी लोग अक्सर यह दावा करते हैं कि “जाति तो सनातन काल से ईश्वर द्वारा बनाई गई व्यवस्था है।” दूसरी ओर, कुछ उथले आधुनिक विचारक यह मान लेते हैं कि यह केवल ब्राह्मणों का षड्यंत्र था।
परंतु इतिहास और समाजशास्त्र का कोई भी गंभीर अध्येता जानता है कि ये दोनों ही दावे ऐतिहासिक तथ्यों की कसौटी पर पूरी तरह झूठे और भ्रामक हैं।
सच्चाई यह है कि ‘वर्ण’ (Varna) और ‘जाति’ (Jati) दो बिल्कुल अलग-अलग चीजें हैं।
ऋग्वैदिक काल में केवल चार वर्णों का उल्लेख था, जो गुण और कर्म पर आधारित थे; कोई भी व्यक्ति अपना कर्म बदलकर अपना वर्ण बदल सकता था। विश्वामित्र क्षत्रिय से ब्राह्मण बने, महर्षि वाल्मीकि डाकू से पूज्य ऋषि बने, और वेदव्यास एक मल्लाह की पुत्री के गर्भ से जन्म लेकर वेदों के संकलनकर्ता बने।
तो फिर सवाल यह उठता है कि वे चार खुले वर्ण आगे चलकर चार हजार संकीर्ण, छुआछूत से भरी और आपस में शादी-ब्याह न करने वाली कठोर जातियों और उपजातियों में कैसे बदल गए?
एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय 2 (‘जाति कैसे बनीं?: व्यवस्था से व्यवस्था विरोध तक’) में इस ऐतिहासिक विकासक्रम की वैज्ञानिक और निष्पक्ष चीरफाड़ करते हैं।
जातियों के निर्माण के चार ऐतिहासिक चरण: एन. सिंह का विश्लेषण
- प्रतिलोम विवाह (Pratiloma Marriage) और ‘वर्ण-संकर’ की अवधारणा:
- प्राचीन भारत में जब समाज में जटिलता बढ़ी, तो वर्णों के बीच विवाह होने लगे। उच्च वर्ण के पुरुष और निम्न वर्ण की स्त्री का विवाह ‘अनुलोम’ कहलाता था, जिसे समाज स्वीकार कर लेता था।
- परंतु जब निम्न वर्ण का पुरुष उच्च वर्ण की कन्या से विवाह करता था, तो रूढ़िवादी व्यवस्था उसे ‘प्रतिलोम’ कहकर खारिज कर देती थी। ऐसी संतानों को दोनों वर्णों से बाहर कर दिया जाता था और उन्हें ‘चांडाल’, ‘सूत’ या ‘वैदेहक’ जैसी अलग श्रेणियों में धकेल दिया गया। धीरे-धीरे इन बहिष्कृत समूहों ने अपनी अलग-अलग जातियां बना लीं।
- शिल्प और व्यावसायिक श्रेणियों (Guilds/Shrenis) का जातियों में रूपांतरण:
- मौर्य और गुप्त काल में धातु का काम करने वाले (लोहार), मिट्टी का काम करने वाले (कुम्हार), कपड़ा बुनने वाले (जुलाहे) और लकड़ी तराशने वाले (बढ़ई) अपनी व्यावसायिक श्रेणियों (Guilds) में संगठित हुए। अपने व्यापारिक रहस्यों और हुनर को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने अपनी ही बिरादरी में शादियां करना शुरू कर दिया, जो कालान्तर में जन्मना जातियों में जम गईं।
- जनजातीय तत्वों का समाज में विलय (Tribal Assimilation):
- जंगलों में रहने वाले कबीलों और जनजातियों को जब कृषि समाज में समाहित किया गया, तो उन्हें एक नई जाति का नाम देकर व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर रख दिया गया।
- अंग्रेजों की 1901 की जनगणना (हर्बर्ट रिस्ले का षड्यंत्र):
- 1901 की जनगणना में ब्रिटिश जनगणना आयुक्त हर्बर्ट रिस्ले (Herbert Risley) ने लोगों के नाक और सिर की बनावट नापकर (Anthropometry) जातियों की एक आधिकारिक ऊंच-नीच की कानूनी सीढ़ी बना दी। जो जाति-व्यवस्था पहले लचीली थी, अंग्रेजों के रजिस्टरों ने उसे कानूनी रूप से पत्थर पर खुदी लकीर बना दिया ताकि हिंदू समाज कभी एकजुट न हो सके!
प्राचीन वैदिक वर्ण बनाम आधुनिक जाति-व्यवस्था
| कसौटी | प्राचीन वैदिक वर्ण व्यवस्था | मध्यकालीन व आधुनिक जाति व्यवस्था |
|---|---|---|
| आधार | गुण, स्वभाव, ज्ञान और कर्म (योग्यता) | केवल और केवल माता-पिता का जन्म और कुल |
| परिवर्तनशीलता | पूर्णतः गतिशील; कर्म बदलने पर वर्ण बदल जाता था | पूर्णतः स्थिर और कठोर; जन्म से मृत्यु तक कोई बदलाव असंभव |
| रोटी-बेटी का सम्बंध | समाज में परस्पर भोजन और विवाह के खुले नियम | अपनी जाति से बाहर विवाह करने पर ऑनर किलिंग और बहिष्कार |
| सामाजिक प्रभाव | समाज का स्वाभाविक और सहयोगी कार्य-विभाजन | ऊंच-नीच, छुआछूत, शोषण और राष्ट्रीय दुर्बलता |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का ऐतिहासिक साक्ष्य
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय 2 में लिखते हैं:
“ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में जिन चार वर्णों का सांकेतिक उल्लेख था, वे जन्म से नहीं कर्म से थे। परंतु सदियों के स्वार्थ, प्रतिलोम विवाहों के बहिष्कार और 1901 में अंग्रेजों द्वारा की गई पहली जाति गणना ने भारत के लचीले समाज को चार हजार लोहे के मजबूत जातिगत पिंजरों में कैद कर दिया। जाति कोई दैवीय देन नहीं है; यह सामाजिक अहंकार, आर्थिक स्वार्थ और औपनिवेशिक विभाजनकारी नीतियों का विषैला फल है। जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि जातियां ऐतिहासिक विकृति हैं, तब तक हम इनके उन्मूलन का साहस नहीं जुटा पाएंगे। जो लोग जाति को धर्म का अंग मानते हैं, वे वास्तव में धर्म के सबसे बड़े शत्रु हैं!”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 28-29)
लेखक आगे चेतावनी देते हैं:
“आज के राजनीतिज्ञ अंग्रेजों से भी बड़े अंग्रेज बन चुके हैं। अंग्रेज तो 1931 में चले गए, लेकिन हमारे नेता हर चुनाव में 1901 के हर्बर्ट रिस्ले की तरह जातियों के रजिस्टर खोलकर बैठ जाते हैं ताकि जनता कभी एक नागरिक न बन सके!”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 34)
जाति के विनाश (Annihilation of Caste) के चार सूत्र
- अंतर्जातीय विवाहों को अनिवार्य प्रोत्साहन: बाबासाहेब अम्बेडकर ने ठीक ही कहा था कि जब तक रक्त का संमिश्रण नहीं होगा, तब तक जाति की भावना नहीं मरेगी। अंतर्जातीय विवाह करने वाले जोड़ों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता और आर्थिक अनुदान मिले।
- धार्मिक संस्थानों का लोकतंत्रीकरण: मंदिरों में पुजारी केवल जन्म से नहीं, बल्कि वेद और शास्त्रों के ज्ञान की खुली परीक्षा से हर जाति के व्यक्ति को नियुक्त किया जाए।
- उपनामों (Surnames) की अनिवार्यता की समाप्ति: सभी आधिकारिक फॉर्मों और दस्तावेजों से जाति-सूचक उपनामों की बाध्यता समाप्त की जाए; केवल पिता/माता का नाम और व्यक्तिगत नाम हो।
- जातिगत सम्मेलनों और रैलियों पर पूर्ण कानूनी रोक: किसी भी जाति के नाम पर होने वाले शक्ति-प्रदर्शन, रैलियों और जातिगत संगठनों के सार्वजनिक आयोजनों पर सख्त प्रतिबंध लगे।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
यदि हमारे ऋषि-मुनियों ने कहा था कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ (पूरी वसुधा ही एक परिवार है), तो फिर हमने उस परिवार को चार हज़ार जातियों के टुकड़ों में क्यों काट दिया?
जातियों के इस ऐतिहासिक उद्भव, सामाजिक छल और इससे मुक्ति के मार्ग को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ का यह दूसरा अध्याय हर भारतीय को पढ़ना चाहिए।
ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में जिन चार वर्णों का सांकेतिक उल्लेख था, वे जन्म से नहीं कर्म से थे। परंतु सदियों के स्वार्थ, प्रतिलोम विवाहों के बहिष्कार और 1901 में अंग्रेजों द्वारा की गई पहली जाति गणना ने भारत के लचीले समाज को चार हजार लोहे के मजबूत जातिगत पिंजरों में कैद कर दिया।