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नालंदा और विक्रमशिला का अग्निकांड — ज्ञान की हत्या और भारत का अंधकार युग

एन. सिंह · ·5 मिनट

सन् ११९३ का वह काला वर्ष भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का सबसे मनहूस मोड़ था। बिहार के नालंदा में स्थित विश्व का सबसे बड़ा ज्ञान का केंद्र—नालंदा महाविहार—धू-धू कर जल रहा था। उसके नौ मंजिला पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ के तीन विशाल भवनों—‘रत्नसागर’, ‘रत्नोदधि’ और ‘रत्नरंजक’ में रखी गई नब्बे लाख से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियां जल रही थीं।

फारसी इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज अपनी पुस्तक ‘तबाकात-ए-नासिरी’ में गर्व के साथ दर्ज करता है कि नालंदा का पुस्तकालय लगातार छह महीने तक जलता रहा! उस धुएं ने केवल मगध के आसमान को ही काला नहीं किया, बल्कि उसने पूरे भारत के बौद्धिक भविष्य को अंधकार में धकेल दिया।

एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ में इस हृदयविदारक घटना का मार्मिक चित्रण करते हुए लिखते हैं:

‘नालंदा केवल ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं थी; वह प्राचीन भारत का मस्तिष्क था। वहाँ कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस और तुर्की से दस हजार छात्र निःशुल्क ज्ञान प्राप्त करने आते थे। वहाँ आयुर्वेद, खगोलशास्त्र, गणित, तर्कशास्त्र, धातुकर्म और दर्शन का ऐसा समन्वय था जो उस समय की दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता था। ह्वेनसांग और इत्सिंग जैसे चीनी यात्रियों ने लिखा है कि नालंदा के द्वारपाल भी इतने ज्ञानी थे कि जो छात्र द्वारपाल के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाता था, उसे प्रवेश तक नहीं मिलता था!
लेकिन बख्तियार खिलजी की बर्बरता ने उस महान ज्ञान-यज्ञ को राख के ढेर में बदल दिया। निहत्थे बौद्ध भिक्षुओं को जिंदा जला दिया गया या उनकी गर्दनें काट दी गईं। जो थोड़े-बहुत भिक्षु बचे, वे जान बचाकर और कुछ पांडुलिपियां अपनी छाती से चिपकाकर तिब्बत और नेपाल के दुर्गम पहाड़ों में भाग गए। नालंदा के साथ भारत का वैज्ञानिक चिंतन भी भस्म हो गया।’
— ‘बुद्ध धम्म और भारत’


नालंदा और विक्रमशिला: विश्व ज्ञान की राजधानी

नालंदा और विक्रमशिला की महानता को समझने के लिए कुछ ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर करना आवश्यक है:

  1. निःशुल्क और सार्वभौमिक शिक्षा: सम्राटों द्वारा दिए गए दो सौ गांवों के राजस्व से इन विश्वविद्यालयों का खर्च चलता था। किसी भी छात्र से भोजन, आवास या शिक्षा का एक पैसा नहीं लिया जाता था।
  2. अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक संवाद: यह वह स्थान था जहाँ नागार्जुन का शून्यवाद, वसुबंधु और असंग का विज्ञानवाद, और आर्यभट्ट का खगोलशास्त्र विकसित हुआ। यहाँ संकीर्ण सांप्रदायिकता नहीं, बल्कि मुक्त वैचारिक बहस का वातावरण था।
  3. अनुशासन और उच्च नैतिकता: ह्वेनसांग ने दर्ज किया है कि नालंदा के सात सौ वर्षों के इतिहास में कभी किसी छात्र द्वारा अनुशासनहीनता का कोई गंभीर मामला सामने नहीं आया।

ज्ञान के विनाश का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा?

नालंदा, विक्रमशिला, ओदंतपुरी और जगद्दल के विनाश ने भारत को अपूरणीय क्षति पहुंचाई:

  • वैज्ञानिक प्रगति का ठहराव: नालंदा के जलने के बाद भारत में गणित, चिकित्सा और खगोलशास्त्र के मौलिक अनुसंधानों पर पूर्ण विराम लग गया। देश में नई खोजों का स्थान पुरानी पोथियों की रटंत विद्या ने ले लिया।
  • अंधकार युग और अंधविश्वास की वापसी: जब ज्ञान और तर्क के सर्वोच्च केंद्र नष्ट हो गए, तो समाज पूरी तरह से तांत्रिकों, ज्योतिषियों और कर्मकांडी पुरोहितों के रहमोकरम पर आ गया। सती प्रथा, बाल विवाह, छुआछूत और तंत्र-मंत्र जैसी कुरीतियां समाज में प्रचंड रूप से फैल गईं।
  • वैश्विक नेतृत्व का अंत: जिस भारत को ज्ञान के कारण ‘विश्वगुरु’ कहा जाता था, वह नालंदा के जलने के बाद खुद अशिक्षा और अज्ञान के दलदल में धंस गया।

आज हमारे शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति क्या है?

आज नालंदा की राख पर खड़े होकर हमें अपनी वर्तमान शिक्षा प्रणाली का आत्मपरीक्षण करना होगा:

  • डिग्रियों की फैक्ट्रियां: आज हमारे विश्वविद्यालय ज्ञान, नवाचार और अनुसंधान के केंद्र बनने के बजाय केवल बेरोजगारों की फौज तैयार करने वाली फैक्ट्रियां बन गए हैं।
  • शिक्षा का भयावह बाज़ारवाद: जहाँ नालंदा में शिक्षा पूर्णतः निःशुल्क और योग्यता आधारित थी, वहीं आज प्राथमिक स्कूल से लेकर मेडिकल-इंजीनियरिंग कॉलेज तक केवल पैसे ऐंठने की दुकानें बन चुके हैं। गरीब का प्रतिभाशाली बच्चा शिक्षा से वंचित रह जाता है।
  • वैचारिक संकीर्णता और स्वायत्तता पर हमले: आज विश्वविद्यालयों में मुक्त संवाद, प्रश्न पूछने और शोध करने के वातावरण को दबाया जा रहा है और संकीर्ण राजनीतिक एजेंडे थोपे जा रहे हैं।

नालंदा की राख से आज हमें क्या संकल्प लेना चाहिए?

  1. पुस्तकालयों और शोध संस्कृति का पुनरुद्धार: हर गांव, मोहल्ले और कस्बे में आधुनिक सार्वजनिक पुस्तकालय और वाचनालय खोले जाने चाहिए ताकि गरीब से गरीब बच्चे को ज्ञान तक पहुँच मिले।
  2. शिक्षा पर राष्ट्रीय जीडीपी का कम से कम 6% खर्च: सरकारों पर दबाव बनाएं कि वे शिक्षा को कॉर्पोरेट्स के हवाले करने के बजाय सरकारी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विश्वस्तरीय प्रयोगशालाएं और सुविधाएं दें।
  3. वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रश्न पूछने का साहस: बच्चों को आज्ञाकारी भेड़ बनाने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने, तर्क करने और सत्य की खोज करने वाला नालंदा का शिष्य बनाएं।

एक विचारणीय सवाल

जिस देश ने कभी दुनिया भर के छात्रों को ज्ञान का प्रकाश बांटा था, आज उसी देश के लाखों युवा एक अदद चपरासी की नौकरी के लिए लाइनों में क्यों खड़े हैं?

नालंदा के गौरव, उसके विनाश के कारणों और ज्ञान के वास्तविक महत्व को समझने के लिए एन. सिंह की पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का यह अध्याय हर युवा और शिक्षक को पढ़ना चाहिए।

बख्तियार खिलजी ने जब नालंदा के 'रत्नसागर' और 'रत्नोदधि' को आग के हवाले किया, तो उस आग ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को शताब्दियों के लिए अज्ञान के घनघोर अंधकार में धकेल दिया।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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