चंपारण से दिल्ली बॉर्डर तक — किसान आंदोलनों का गौरव और सरकारों का छल
एन. सिंह · ·4 मिनट
सन 1917 में बिहार के चंपारण में जब महात्मा गांधी पहुँचे थे, तो ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें ‘शांति भंग करने वाला’ कहकर ज़िला छोड़ने का हुक्म दिया था। गोरे नीलहे साहबों ने किसानों पर ‘तिनकठिया प्रथा’ थोप रखी थी—यानी अपनी सबसे उपजाऊ ज़मीन के 3/20 हिस्से पर नील की खेती करनी ही होगी, चाहे किसान के बच्चे भूखे मर जाएं। गांधी जी ने किसानों को एकजुट किया और भारत में सत्याग्रह का पहला सफल प्रयोग रचा।
इसके बाद 1928 में सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में ‘बारदोली सत्याग्रह’ हुआ, जहाँ अंग्रेज़ों द्वारा बढ़ाए गए 22% लगान के खिलाफ किसानों ने अपनी ज़मीनें ज़ब्त करवा लीं, लेकिन झुके नहीं। इसी आंदोलन ने वल्लभभाई को ‘सरदार’ की पदवी दी।
फिर आज़ाद भारत में 1980 के दशक में चौधरी चरण सिंह और बाबा महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन (BKU) का वह ऐतिहासिक दौर आया, जब लाखों किसान दिल्ली के बोट क्लब पर अपने हुक्के और बैलगाड़ियों के साथ हफ्तों डटे रहे और राजीव गांधी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया।
और अभी हाल ही में, 2020-21 में देश ने दिल्ली की सीमाओं पर 378 दिनों तक चला ऐतिहासिक किसान आंदोलन देखा, जहाँ भीषण सर्दी, चिलचिलाती गर्मी और 700 से अधिक शहादतों के बाद तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा।
सवाल यह है: चाहे गोरी सरकार रही हो या देशी सरकार, किसान को अपनी जायज़ माँगों के लिए भी हमेशा सड़कों पर जान क्यों गंवानी पड़ती है?
सत्ता का दोहरा चरित्र: किसान बनाम कॉरपोरेट
अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के तीसरे अध्याय में लेखक एन. सिंह किसान आंदोलनों के पूरे इतिहास का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करते हैं।
वे बताते हैं कि जब देश के बड़े उद्योगपतियों को कोई समस्या होती है, तो फिक्की (FICCI) और सीआईआई (CII) के बंद कमरों में नीतियां बदल दी जाती हैं। लाखों करोड़ रुपये के कॉरपोरेट लोन एक झटके में बट्टे खाते (Write-off) में डाल दिए जाते हैं।
लेकिन जब खेत में काम करने वाला किसान बिजली के बढ़े बिल, खाद की किल्लत, या लागत मूल्य की गारंटी माँगता है, तो उसे ‘आंदोलनजीवी’, ‘अड़ियल’ या ‘विकास-विरोधी’ कहकर लाठियों और आंसूं गैस के गोलों से नवाज़ा जाता है।
किताब से कड़वा सच
लेखकद्वय ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ में इस कड़वे सच को रेखांकित करते हुए लिखते हैं:
“आज़ादी के बाद जितने भी किसान आंदोलन हुए, उनकी माँगों में एक अद्भुत समानता रही है—वे कभी भी सरकार से कोई खैरात नहीं माँगते। वे केवल अपनी मेहनत का सही मूल्य माँगते हैं। लेकिन सत्ता का दृष्टिकोण हमेशा यह रहा कि औद्योगिक विकास को सस्ता कच्चा माल और शहरी मध्यम वर्ग को सस्ता अनाज मुहैया कराने के लिए किसान को जानबूझकर गरीब रखा जाए। यदि किसान अमीर हो गया और अपनी फसल को अपनी शर्तों पर बेचने लगा, तो शहरों में सस्ती मजदूरी और उद्योगों का भारी मुनाफा कैसे चलेगा? यही कारण है कि हर दौर की सत्ता किसान आंदोलनों को जाति, धर्म या क्षेत्र में बाँटकर खत्म करने की रणनीति अपनाती है।”
— ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ (अध्याय 3)
असली समाधान क्या है?
- आंदोलनों को राजनीतिक हथियार न बनने दें: किसान संगठनों को किसी एक दल का पिछलग्गू बनने के बजाय पूरे देश के किसानों का एक गैर-राजनीतिक, तार्किक और एकजुट दबाव समूह (Lobby) बनना होगा।
- संसद में किसान आयोग की स्वायत्तता: निर्वाचन आयोग या सुप्रीम कोर्ट की तरह एक स्वायत्त ‘राष्ट्रीय किसान आयोग’ बने, जिसकी सिफारिशें मानना सरकार के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी हो।
- शहीद किसानों के परिवारों को संरक्षण: आंदोलनों में प्राण गंवाने वाले किसानों को राष्ट्रीय शहीद का दर्जा और उनके परिवारों को जीवन-यापन की स्थायी गारंटी दी जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
जो किसान पूरे देश की थाली में रोटी परोसता है, अगर उसे अपने हक के लिए संसद से चंद किलोमीटर दूर सड़कों पर कील-कांटे और कंटीले तारों का सामना करना पड़े, तो क्या हम सचमुच एक संप्रभु और संवेदनशील गणराज्य हैं?
इतिहास के इन पन्नों को निष्पक्षता से जानने के लिए पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का यह अध्याय हर जागरूक नागरिक को पढ़ना चाहिए।
किसान जब भी अपनी रोटी और खेत की हिफ़ाज़त के लिए सड़क पर उतरता है, सत्ताधारी वर्ग पहले उसे अनदेखा करता है, फिर बदनाम करता है, और अंत में उसके साथ छल करता है। यह चंपारण 1917 से लेकर आज तक का अपरिवर्तित इतिहास है।