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आज़ाद कलम
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अन्नदाता से दिहाड़ी मज़दूर बनने का अभिशाप — अपनी ही ज़मीन पर बेगाना होता किसान

एन. सिंह · ·3 मिनट

गाँव के किसी बड़े निर्माण स्थल या ईंट-भट्ठे पर जाइए।

वहाँ सिर पर 12 ईंटें लादकर भट्ठे की आग में झोंकने वाला मजदूर कौन है?

वह कोई पेशेवर मजदूर नहीं है। अगर आप उससे पूछेंगे तो वह बताएगा कि दस साल पहले तक उसके पास भी 4 बीघे ज़मीन थी, दो जोड़ी बैल थे, और वह अपने परिवार के साथ गर्व से खेती करता था।

लेकिन फिर क्या हुआ? पिता की बीमारी के इलाज में दो बीघे ज़मीन साहूकार के पास गिरवी रखी गई और कभी वापस नहीं आई। बेटी की शादी के लिए बैंक से कर्ज़ लिया, फसल दो साल लगातार ओलों से बर्बाद हो गई, बैंक ने रिकवरी का वारंट निकाल दिया और बाकी बची ज़मीन भी औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ी।

आज वह ‘अन्नदाता’ नहीं है। आज वह 300 रुपये रोज़ की दिहाड़ी पर ठेकेदार की गालियां सुनने वाला एक लाचार बंधुआ मजदूर है।

इस प्रक्रिया को समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में ‘प्रोलिटेरियनाइजेशन’ (Proletarianization) यानी किसान का मज़दूरीकरण कहा जाता है।


खेत से भट्ठे तक: सामाजिक पतन की दास्तान

अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के दसवें अध्याय में लेखक एन. सिंह इस सामाजिक त्रासदी की चीरफाड़ करते हैं।

भारत में किसान केवल एक आर्थिक इकाई नहीं है। भारत के गाँव में ज़मीन किसान का ‘स्वाभिमान’ और उसकी ‘नागरिक पहचान’ होती है। जिसके पास खेत है, वह किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता। वह समाज में सीना तानकर बैठता है।

लेकिन जब गलत नीतियों, अनियंत्रित महंगाई और बेमौसम आपदाओं के कारण किसान की ज़मीन छिन जाती है, तो उसका न केवल आर्थिक पतन होता है, बल्कि उसका पूरा सामाजिक सम्मान ध्वस्त हो जाता है।

वह मनरेगा (MGNREGA) के गड्ढे खोदने के लिए लाइन में खड़ा होता है, जहाँ रोज़गार सेवक और सेक्रेटरी के आगे 200 रुपये की हाजिरी के लिए गिड़गिड़ाना पड़ता है।


किताब से कड़वा सच

“यह कोई आकस्मिक घटना नहीं है कि किसान मजदूर बन रहा है। यह एक सोची-समझी बाज़ारवादी नीति का परिणाम है। बड़े कॉरपोरेट्स को अपने कारखानों, रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन साइटों के लिए करोड़ों सस्ते, असंगठित मजदूरों की फौज चाहिए। यदि किसान अपने गाँव में आत्मनिर्भर और खुशहाल रहेगा, तो वह 12 घंटे पसीना बहाने शहरों में क्यों जाएगा? इसलिए खेती को जानबूझकर घाटे का सौदा बनाया जा रहा है ताकि ग्रामीण आबादी अपनी ज़मीनें छोड़कर पूंजीपतियों के आगे मज़दूरी करने पर विवश हो जाए।”
— ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ (अध्याय 10)


असली समाधान क्या है?

  1. कर्ज़ के कारण ज़मीन की नीलामी पर पूर्ण प्रतिबंध: किसी भी किसान की आजीविका की एकमात्र कृषि भूमि को कर्ज़ वसूली के नाम पर नीलाम करने पर कानूनी रोक लगे।
  2. ग्रामीण संकट राहत कोष (Crisis Relief Fund): सूखा, बाढ़ या फसल बर्बादी की स्थिति में बैंक रिकवरी को स्वतः 3 साल के लिए फ्रीज़ किया जाए और सरकार द्वारा ब्याज का वहन हो।
  3. भूमि बहाली कानून (Land Restoration Act): अवैध रूप से गिरवी रखी गई या साहूकारों द्वारा हड़पी गई सीमांत किसानों की ज़मीनों को मुक्त कराने के लिए फास्ट-ट्रैक राजस्व अदालतें बनें।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

जो हाथ पूरे देश की भूख मिटाने के लिए अन्न उगाते थे, अगर वे हाथ अपनी ही रोटी के लिए दूसरों के आगे फैलने लगें, तो क्या किसी देश को ‘विश्वगुरु’ या ‘महाशक्ति’ कहलाने का नैतिक अधिकार है? इस मर्मभेदी सच को समझने के लिए पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का दसवां अध्याय अवश्य पढ़ें।

किसान से उसकी ज़मीन छीन लेना केवल एक संपत्ति छीनना नहीं है; यह उससे उसकी आज़ादी, उसका आत्मसम्मान और उसकी सामाजिक पहचान छीनकर उसे पूंजी की भट्टी में झोंक देना है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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