गांधी का ग्राम स्वराज बनाम आज का कंक्रीट मॉडल — गाँव बचेगा तभी देश बचेगा
एन. सिंह · ·3 मिनट
सन 1946 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने लिखा था:
“भारत अपने कुछ शहरों में नहीं, बल्कि अपने सात लाख गाँवों में बसता है। अगर गाँव नष्ट हो गए, तो भारत नष्ट हो जाएगा। वह फिर भारत नहीं रहेगा। दुनिया में उसका जो अपना मिशन है, वह भी खो जाएगा।”
गांधी जी का सपना क्या था?
वे चाहते थे कि भारत का हर गाँव एक ‘स्वावलंबी गणराज्य’ (Self-reliant Republic) बने। गाँव की अपनी भोजन व्यवस्था हो, अपने कुटीर उद्योग हों, अपनी पंचायत हो, अपनी शिक्षा और अपना न्याय हो। गाँव को अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए शहरों या विदेशी कंपनियों का मुंह न देखना पड़े।
लेकिन आज़ादी के बाद हमने क्या किया?
हमने गांधी के चश्मे और चरखे को तो नोटों और सरकारी पोस्टरों पर छाप दिया, लेकिन उनके विचारों को उठाकर कूड़ेदान में फेंक दिया! हमने मान लिया कि लंदन, न्यूयॉर्क और शंघाई जैसे शीशे और कंक्रीट के विशाल शहर बना लेना ही असली विकास है।
अनियंत्रित शहरीकरण का नरक और उजड़ते गाँव
अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के ग्यारहवें अध्याय में लेखकद्वय एन. सिंह और विमला सिंह गांधीवादी ग्राम दर्शन और आधुनिक विकास मॉडल के इस ऐतिहासिक टकराव की पड़ताल करते हैं।
आज हमारे तथाकथित ‘स्मार्ट शहर’ किस हाल में हैं?
- दिल्ली और मुंबई जैसी राजधानियों में हवा इतनी ज़हरीली है कि सांस लेना सिगरेट पीने जैसा है।
- यमुना और मीठी नदियां गंदे नालों में तब्दील हो चुकी हैं।
- पीने के पानी के लिए भूजल पाताल में चला गया है और चारों तरफ कचरे के विशाल पहाड़ खड़े हैं।
दूसरी तरफ, जिस गाँव में ताज़ी हवा थी, शुद्ध पानी था, हरी-भरी धरती थी, उस गाँव को हमने योजनाओं और बजट से वंचित करके लाचार बना दिया।
गाँव का कच्चा माल कौड़ियों के भाव शहर जाता है, और शहर का बना साबुन, तेल, प्लास्टिक और डिब्बाबंद ज़हर महंगे दामों पर गाँव में बिकता है। इस तरह गाँव की संपत्ति लगातार चूसकर शहरों में जमा की जा रही है।
किताब से कड़वा सच
“गांधी जी मशीन के विरोधी नहीं थे; वे उस व्यवस्था के विरोधी थे जो मशीन को मनुष्य के ऊपर हावी कर देती है और मुट्ठी भर लोगों के मुनाफे के लिए करोड़ों हाथों से काम छीन लेती है। आज जब दुनिया ग्लोबल वॉर्मिंग, जलवायु संकट और मानसिक अवसाद से जूझ रही है, तब फिर से पूरी दुनिया को गांधी के उसी ग्राम स्वराज की याद आ रही है। यदि भारत को सचमुच बचाना है, तो हमें विकास की दिशा को शहरों से वापस गाँव की तरफ मोड़ना होगा।”
— ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ (अध्याय 11)
असली समाधान क्या है?
- लोकल फॉर वोकल का वास्तविक अमल: गाँव में पैदा होने वाली हर चीज़ का प्राथमिक और द्वितीयक प्रसंस्करण (Processing) गाँव में ही हो। तेल पेराई, आटा चक्की, खादी, हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को कर-मुक्त और ब्याज-मुक्त प्रोत्साहन मिले।
- सच्ची पंचायती स्वायत्तता: ग्राम पंचायतों को केवल मनरेगा के मस्टररोल भरने वाली एजेंसी न बनाया जाए; उन्हें अपने जल, जंगल, ज़मीन और स्थानीय बाज़ार पर पूर्ण प्रशासनिक अधिकार दिया जाए।
- पर्यावरण-अनुकूल जैविक कृषि: रासायनिक खादों की अंधाधुंध सब्सिडी को हटाकर देशी गाय आधारित प्राकृतिक खेती और देशी बीजों के संरक्षण को राष्ट्रीय मिशन बनाया जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या ऐसी तरक्की का कोई मोल है जहाँ शहर में रहने वाले को शुद्ध हवा और पानी न मिले, और गाँव में रहने वाले को रोटी और रोज़गार न मिले? गांधी के इस शाश्वत प्रश्न पर विचार करने के लिए पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का ग्यारहवां अध्याय ज़रूर पढ़ें।
गांधी जी का ग्राम स्वराज कोई पिछड़ापन नहीं था; वह पर्यावरण, संतुलन, आत्मनिर्भरता और मानवीय गरिमा का ऐसा दर्शन था जिसकी आज पूरी दुनिया को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।