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महाप्रजापति गौतमी और भिक्षुणी संघ — भारत की पहली नारी मुक्ति क्रांति

एन. सिंह · ·6 मिनट

आज से 2600 वर्ष पूर्व के प्राचीन भारत की सामाजिक स्थिति की कल्पना कीजिए।

उस समय तत्कालीन वैदिक और सामंती समाज में स्त्री की स्थिति अत्यंत दयनीय, पराधीन और दोयम दर्जे की थी। धर्मशास्त्रों का कठोर नियम था—“न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति” (स्त्री कभी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है; बचपन में पिता के अधीन, युवावस्था में पति के अधीन, और वृद्धावस्था में पुत्र के अधीन रहे)। स्त्री को वेद पढ़ने, यज्ञ करने, संन्यास लेने या आध्यात्मिक साधना करने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं था। वह केवल घर की चारदीवारी के भीतर संतान पैदा करने और पुरुषों की सेवा करने की वस्तु मात्र थी।

ऐसे घोर अंधकारमय युग में तथागत बुद्ध ने एक ऐसा युगांतकारी और क्रांतिकारी कदम उठाया, जिसने पूरे जंबूद्वीप की पितृसत्तात्मक व्यवस्था की चूलें हिला दीं!

कपिलवस्तु से वैशाली तक नंगे पैर, सैकड़ों मील की पैदल यात्रा करके जब सिद्धार्थ की मौसी और विमाता महाप्रजापति गौतमी अपने साथ पांच सौ शाक्य कुल की महिलाओं को लेकर वैशाली के महावन में कूटागार शाला पहुँचीं—उनके पैरों में छाले पड़े थे, वस्त्र धूल से सने थे, और आंखों में आंसुओं के साथ आत्म-साधना की अडिग ज्वाला जल रही थी।

उन्होंने तथागत के परम शिष्य आनंद के माध्यम से बुद्ध से प्रार्थना की: “भंते! क्या स्त्रियां भी तथागत के धम्म और विनय में प्रविष्ट होकर संन्यास ले सकती हैं? क्या स्त्रियां अर्हत् पद और निर्वाण प्राप्त करने में सक्षम हैं?”

तथागत बुद्ध ने बिना किसी हिचकिचाहट के उद्घोषणा की: “हाँ आनंद! स्त्रियां भी पुरुषों के समान ही शील, समाधि और प्रज्ञा का साक्षात्कार कर निर्वाण प्राप्त करने में पूरी तरह समर्थ हैं!”

और इसी ऐतिहासिक क्षण में विश्व के इतिहास में पहली बार स्वतंत्र ‘भिक्षुणी संघ’ (Order of Nuns) की स्थापना हुई!

एन. सिंह अपनी कालजयी पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ के भाग-1 और भाग-2 में इस घटना को ‘मानव सभ्यता की पहली वास्तविक नारी मुक्ति क्रांति’ बताते हैं।


भिक्षुणी संघ की स्थापना: क्रांति के चार अभूतपूर्व आयाम

  1. आध्यात्मिक समता की घोषणा: तथागत ने यह स्पष्ट स्थापित कर दिया कि मोक्ष या ज्ञान किसी एक लिंग (Gender) का एकाधिकार नहीं है। आत्मा या परमात्मा जैसी काल्पनिक सत्ता के बिना, चित्त की शुद्धि कोई भी मनुष्य—चाहे वह पुरुष हो या स्त्री—अपने पुरुषार्थ से कर सकता है।
  2. ‘थेरीगाथा’ (Therigatha): विश्व का पहला नारीवादी काव्य-संग्रह:
    • बौद्ध त्रिपिटक के खुद्दक निकाय का ग्रंथ ‘थेरीगाथा’ संसार का सबसे प्राचीन काव्य-संग्रह है जिसकी रचना केवल प्रबुद्ध भिक्षुणियों ने की थी!
    • इसमें मुक्ता, पटाचारा, किसागोतमी, सोमा और आम्रपाली जैसी वीरांगनाओं ने अपने अंतर्मन के आनंद, सांसारिक बंधनों की मुक्ति और निर्वाण के अद्वितीय अनुभव दर्ज किए हैं।
  3. वेश्याओं, दासियों और राजकुमारियों का एक समान दर्जा:
    • भिक्षुणी संघ में कोई जाति या पुराना पेशा नहीं देखा जाता था। नगरवधु आम्रपाली, अपनों की लाशों पर पागल हो चुकी पटाचारा, और राजमहल की महारानी गौतमी—सब एक साथ एक ही चीवर पहनकर, एक ही भिक्षापात्र लेकर बैठती थीं!
  4. घरेलू हिंसा और दासता से मुक्ति का सुरक्षित आश्रम:
    • तत्कालीन समाज में जो महिलाएं पतियों के अत्याचार, सास-ससुर के जुल्म या जबरन विवाह से पीड़ित थीं, भिक्षुणी संघ उनके लिए एक ऐसा स्वाभिमानी और सुरक्षित आश्रय बन गया जहाँ वे सिर उठाकर जी सकती थीं।

तत्कालीन सामंती पितृसत्ता बनाम बुद्ध का नारीवादी दृष्टिकोण

आयाम तत्कालीन ब्राह्मणवादी/सामंती व्यवस्था तथागत बुद्ध का धम्म और विनय
स्त्री की स्वतंत्रता “न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति” — आजीवन पराधीनता की घोषणा पूर्ण स्वतंत्रता; अपने जीवन और साधना का फैसला स्वयं करने का अधिकार
आध्यात्मिक अधिकार वेद पढ़ने, संन्यास लेने और मोक्ष पाने पर पूर्ण प्रतिबंध भिक्षुणी संघ में दीक्षा, प्रव्रज्या और अर्हत् पद की पूर्ण प्राप्ति
कन्या जन्म पर विचार पुत्री का जन्म शोक और चिंता का कारण माना जाता था राजा प्रसेनजित से बुद्ध ने कहा: “पुत्री का जन्म पुत्र से भी अधिक श्रेष्ठ हो सकता है!”
सामाजिक संगठन स्त्री का अपना कोई स्वतंत्र संगठन या सभा नहीं थी पूर्ण स्वायत्त भिक्षुणी संघ, जो अपने नियम और अनुशासन स्वयं चलाता था

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का ऐतिहासिक मूल्यांकन

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ के भाग-1 में लिखते हैं:

“बुद्ध ने केवल पुरुषों को अर्हत् होने का अधिकार नहीं दिया; उन्होंने उद्घोषणा की कि प्रज्ञा, ध्यान और निर्वाण के मार्ग पर स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं हो सकता। महाप्रजापति गौतमी के नेतृत्व में स्थापित भिक्षुणी संघ विश्व इतिहास की पहली संगठित महिला मुक्ति क्रांति थी। आज जब पश्चिमी दुनिया 20वीं सदी के फेमिनिज्म (Feminism) का ढिंढोरा पीटती है, तो वे भूल जाते हैं कि उससे 2500 वर्ष पूर्व भारत की धरती पर तथागत बुद्ध ने महिलाओं को पुरुषों के समान चीवर पहनाकर उन्हें समाज का आध्यात्मिक गुरु और मार्गदर्शक बना दिया था! भिक्षुणी पटाचारा और आम्रपाली ने बड़े-बड़े राजाओं और विद्वानों को धर्म की दीक्षा दी थी। भारत का असली गौरव इस बात में है कि हमने स्त्री को केवल पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि ज्ञान की देवी के रूप में जीवंत देखा था!”
— एन. सिंह (बुद्ध धम्म और भारत, पृष्ठ 28-29)


आज की आधुनिक नारी के लिए भिक्षुणी संघ के चार शाश्वत संदेश

  1. आंतरिक स्वावलंबन और आत्म-दीपो भव: किसी पुरुष, पति या समाज की दया पर निर्भर रहने के बजाय अपनी बुद्धि, शिक्षा और प्रतिभा पर विश्वास करें—“अपना दीपक स्वयं बनो!”
  2. सहानुभूति और भगिनी-भाव (Sisterhood): जाति, धर्म और वर्ग की दीवारें तोड़कर सभी शोषित और पीड़ित महिलाओं का एक-दूसरे के प्रति परस्पर सहयोग और सुरक्षा का भाव।
  3. ‘थेरीगाथा’ के स्वाध्याय का पुनर्जागरण: भारतीय विश्वविद्यालयों और स्कूलों में शेक्सपियर और पश्चिमी नारीवादियों से पहले ‘थेरीगाथा’ की विदुषी भिक्षुणियों का साहित्य पढ़ाया जाए।
  4. धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं में महिलाओं का 50% नेतृत्व: मंदिरों, मठों, ट्रस्टों और सामाजिक संस्थाओं के सर्वोच्च निर्णायक पदों पर महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार मिले।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

जिस देश में 2600 वर्ष पूर्व महाप्रजापति गौतमी और आम्रपाली ने पूरे समाज को ज्ञान का प्रकाश दिखाया था, उसी देश में आज भी बेटियों को कोख में मार देने या दहेज के लिए जला देने की बर्बरता क्या हमारे पूरे समाज के मुंह पर कालिख नहीं है?

तथागत बुद्ध के नारी मुक्ति के इस युगांतकारी इतिहास, भिक्षुणी संघ के गौरव और सच्ची लैंगिक समानता के दर्शन को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का यह अध्याय हर महिला और पुरुष को अनिवार्य रूप से पढ़ना चाहिए।

बुद्ध ने केवल पुरुषों को अर्हत् होने का अधिकार नहीं दिया; उन्होंने उद्घोषणा की कि प्रज्ञा, ध्यान और निर्वाण के मार्ग पर स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं हो सकता। महाप्रजापति गौतमी के नेतृत्व में स्थापित भिक्षुणी संघ विश्व इतिहास की पहली संगठित महिला मुक्ति क्रांति थी।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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