इतिहास में नफ़रत की खेती — औरंगज़ेब, मंदिर और आज के खोखले भाषण
एन. सिंह · ·6 मिनट
कल्पना कीजिए कि आप एक आधुनिक हाईवे पर अपनी कार से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से जा रहे हैं।
यदि कार का ड्राइवर सामने की विशाल सड़क पर देखने के बजाय अपनी आंखें लगातार कार के छोटे से ‘रियर-व्यू मिरर’ (पीछे देखने वाले शीशे) पर ही गड़ाए रखे, तो क्या होगा? कुछ ही सेकंडों में कार किसी डिवाइडर या पेड़ से टकराकर चकनाचूर हो जाएगी!
रियर-व्यू मिरर का काम केवल इतना होता है कि आप मुड़ते समय पीछे की स्थिति की एक झलक देख लें; आप पीछे देखते हुए आगे की यात्रा कभी नहीं कर सकते।
आज हमारे प्यारे देश भारत की राजनीति के साथ ठीक यही जानलेवा खेल खेला जा रहा है!
21वीं सदी में जब दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर चिप्स, कैंसर के इलाज और अंतरिक्ष में बस्तियां बसाने की होड़ में लगी है—तब हमारे देश के टीवी चैनलों, संसद और चुनावी रैलियों में रोज़ सुबह से शाम तक किस विषय पर भाषण दिए जा रहे हैं?
- “चार सौ साल पहले औरंगज़ेब ने क्या किया था?”
- “पाँच सौ साल पहले बाबर ने कौन सी इमारत तोड़ी थी?”
- “सात सौ साल पहले अलाउद्दीन खिलजी ने क्या खाया था और क्या पहना था?”
जिस देश में 45% युवा बेरोज़गार घूम रहे हों, जहाँ परीक्षा के हर पेपर लीक हो जाते हों, जहाँ सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन न मिलने से बच्चे मर जाते हों—वहाँ की राजनीति जनता को 400 साल पुरानी कब्रें खोदने में क्यों व्यस्त रखना चाहती है?
इतिहास का हथियारकरण: विफलताएं छिपाने का अचूक फॉर्मूला
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ में इतिहास के इस राजनीतिक दुरुपयोग का मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय विश्लेषण करते हैं:
- वर्तमान की जवाबदेही से भागना: किसी भी निकम्मी और भ्रष्ट सरकार के लिए आज के युवाओं को नौकरी देना, किसानों की फसल का दाम देना, और महंगाई पर काबू पाना बहुत कठिन काम है। इसके लिए कड़े फैसले लेने पड़ते हैं, नीतियां बनानी पड़ती हैं। परंतु औरंगज़ेब और बाबर के नाम पर भड़काऊ भाषण देना बिल्कुल मुफ्त है! इसमें कोई बजट खर्च नहीं होता, और जनता नफ़रत के उन्माद में अपनी खाली जेब और बेरोजगारी को भूल जाती है।
- इतिहास की चुनिंदा व्याख्या (Selective History): इतिहास कभी काला और सफेद नहीं होता; वह धूसर (Grey) होता है। मध्यकाल में राजाओं के बीच होने वाले युद्ध धार्मिक नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से ‘साम्राज्य विस्तार और सत्ता’ के युद्ध थे। मुगलों की सेना में मानसिंह, मिर्ज़ा राजा जयसिंह और जसवंत सिंह जैसे बड़े हिंदू सेनापति थे; और महाराणा प्रताप की सेना का तोपची हकीम खां सूर था! छत्रपति शिवाजी महाराज की नौसेना का प्रमुख दरिया सारंग एक मुस्लिम था। परंतु आज के अवसरवादी नेता इन तथ्यों को छुपाकर पूरे इतिहास को केवल ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ का दंगा बनाकर पेश करते हैं।
- मनोवैज्ञानिक हीनभावना का व्यापार: जनता के मन में यह डर बैठाया जाता है कि तुम खतरे में हो, तुम्हारा धर्म खतरे में है। डरा हुआ इंसान कभी अपने अधिकारों, शिक्षा और रोजगार के बारे में नहीं सोचता; वह केवल एक ‘रक्षक’ की तलाश करता है, और नेताजी खुद को वही मसीहा बनाकर पेश कर देते हैं।
इतिहास के पीछे भागने वाला समाज बनाम भविष्य बनाने वाला समाज
| कसौटी | अतीत की नफ़रत में उलझा समाज | भविष्य की ओर देखने वाला प्रगतिशील समाज |
|---|---|---|
| सार्वजनिक चर्चा का केंद्र | चार सौ साल पुराने मंदिर, मस्जिद, कब्रें और नाम बदलना | नए विश्वविद्यालय, आधुनिक अस्पताल, रिसर्च लैब और एआई हब |
| राजनीति का मुख्य मुद्दा | कौन सा शासक क्रूर था और किसने किसको लूटा था | हमारे बच्चों के लिए आज कितने नए रोजगार और उद्योग बने |
| नागरिकों की मानसिकता | ऐतिहासिक बदला लेने की भावना, प्रतिशोध और उन्माद | वैज्ञानिक सोच, तर्कशीलता, नवाचार और विश्व बंधुत्व |
| वैश्विक स्थिति | साम्प्रदायिक दंगों और तनाव से ग्रस्त तीसरी दुनिया का देश | आर्थिक और तकनीकी मोर्चे पर दुनिया का नेतृत्व करने वाली महाशक्ति |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की सीधी चेतावनी
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय ‘इतिहास का भूत और वर्तमान की बर्बादी’ में लिखते हैं:
“मुर्दों की कब्रें खोदकर वर्तमान की समस्याओं से नहीं निपटा जा सकता। जो राजनीति आज के नौजवानों को रोजगार नहीं दे सकती, वही राजनीति उन्हें चार सौ साल पुराने इतिहास की नफ़रत का नशा बेचती है। औरंगज़ेब अपने कर्मों की सजा पा चुका है और मिट्टी में मिल चुका है; बाबर का साम्राज्य समाप्त हो चुका है। आज की तारीख में भारत का असली दुश्मन कोई मध्यकालीन सुल्तान नहीं है; आज भारत का असली दुश्मन है—कुपोषण, अशिक्षा, बेरोजगारी, बीमार अस्पताल और वह भ्रष्ट व्यवस्था जो हर नौजवान के सपनों की हत्या कर रही है! यदि हम आज भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियां हमारे इतिहास को नहीं, बल्कि हमारे इस पागलपन को धिक्कारेंगी कि जब देश को वैज्ञानिकों की जरूरत थी, तब हम खंडहरों में मंदिर और मस्जिद नाप रहे थे!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 234-235)
लेखक आगे एक बहुत मार्मिक प्रश्न पूछते हैं:
“क्या किसी अस्पताल के आईसीयू में वेंटिलेटर पर तड़पते मरीज को यह पूछकर बचाया जा सकता है कि चार सौ साल पहले किस राजा ने क्या तोड़ा था? दवाई वर्तमान से आएगी, इतिहास की नफ़रत से नहीं!”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 238)
इस उन्माद से बाहर निकलने के चार राष्ट्रीय कदम
- प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट (1991) का कठोर पालन: 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्थिति में था, उसे उसी स्थिति में बनाए रखने वाले कानून का अक्षरशः पालन हो ताकि रोज़-रोज़ नए विवाद खड़े न किए जा सकें।
- इतिहास के वैज्ञानिक अध्ययन पर बल: इतिहास को केवल राजाओं और युद्धों की गाथा न बनाकर सामाजिक-आर्थिक विकास, कला, साहित्य और आम जनता के जीवन के परिप्रेक्ष्य में निष्पक्ष रूप से पढ़ाया जाए।
- नेताओं से वर्तमान के रिपोर्ट कार्ड पर सवाल: जब भी कोई नेता इतिहास का नाम लेकर वोट मांगे, तो जनता उससे हाथ जोड़कर पूछे—“नेताजी, पहले यह बताइए कि पिछले पांच साल में हमारे जिले में कितने सरकारी अस्पताल और कॉलेज बने?”
- सांप्रदायिक नफ़रत फैलाने वाले मीडिया पर कड़ा दंड: टीआरपी के लिए हिंदू-मुस्लिम डिबेट्स कराने वाले और समाज में जहर घोलने वाले टीवी चैनलों के प्रसारण पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या हम अपने बच्चों को एक ऐसा भारत देना चाहते हैं जहाँ वे इतिहास के मलबे में नफ़रत की तलवारें चमकाते रहें, या एक ऐसा भारत जहाँ वे विज्ञान और ज्ञान के दम पर दुनिया का नेतृत्व करें?
इतिहास के राजनीतिक हथकंडों से सावधान होने और भारत के स्वर्णिम भविष्य की रूपरेखा को समझने के लिए एन. सिंह की कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह अध्याय हर युवा और छात्र को अनिवार्य रूप से पढ़ना चाहिए।
मुर्दों की कब्रें खोदकर वर्तमान की समस्याओं से नहीं निपटा जा सकता। जो राजनीति आज के नौजवानों को रोजगार नहीं दे सकती, वही राजनीति उन्हें चार सौ साल पुराने इतिहास की नफ़रत का नशा बेचती है।