मुग़ल, अंग्रेज़ और स्वतंत्र भारत — ज़मीन किसान की थी, लगान और कानूनों का शिकार कैसे बनी?
एन. सिंह · ·4 मिनट
क्या आप जानते हैं कि प्राचीन और मध्यकालीन भारत में ज़मीन की कभी ‘खरीद-बिक्री’ या ‘नीलामी’ नहीं होती थी?
गाँव की ज़मीन पर पूरे गाँव के समाज का सामूहिक अधिकार होता था। जो परिवार जितनी ज़मीन जोतता था, वह उसका उपयोग करता था। राजा केवल फसल का एक निश्चित भाग (छठा या चौथा हिस्सा) कर के रूप में लेता था। यदि अकाल पड़ जाए या सूखा हो, तो राजा कर माफ़ कर देता था। किसी भी किसान को उसकी ज़मीन से बेदखल करने की परंपरा भारतीय इतिहास में नहीं थी।
फिर ऐसा क्या हुआ कि आज तहसील के पटवारी के एक दस्तखत पर किसान की पुश्तैनी ज़मीन छिन जाती है?
इस ऐतिहासिक विनाश की शुरुआत मुग़ल काल के उत्तरार्ध और विशेष रूप से 1793 में ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस के ‘स्थायी बंदोबस्त’ (Permanent Settlement / इस्तमरारी व्यवस्था) से हुई।
अंग्रेज़ों की लगान-मशीन: ज़मींदारी, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी
अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के चौथे अध्याय में लेखक एन. सिंह भारत के भूमि राजस्व इतिहास की परतें खोलते हैं:
- स्थायी बंदोबस्त (बंगाल, बिहार, ओडिशा, पूर्वी उत्तर प्रदेश): अंग्रेज़ों ने स्थानीय टैक्स वसूलने वाले दलालों को रातों-रात ज़मीन का ‘मालिक’ घोषित कर दिया और सदियों से खेती कर रहे किसानों को उनका ‘किरायेदार’ बना दिया! तय लगान न देने पर ज़मीन नीलाम कर दी जाती थी।
- रैयतवाड़ी (मद्रास, बॉम्बे): यहाँ सीधे किसान से भारी लगान वसूला गया, जिससे किसान महाजनों के चंगुल में फंसा।
- महालवाड़ी (पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश): यहाँ पूरे गाँव पर सामूहिक लगान थोपा गया।
इन तीनों व्यवस्थाओं का केवल एक ही मकसद था—ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश ताज के खजाने को सोने-चाँदी से भरना, चाहे भारत के करोड़ों किसान घास की रोटियां खाने पर मजबूर हो जाएं। 1770 का बंगाल का अकाल हो या 1943 का महा-अकाल, लाखों मौतों के पीछे सूखा नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों का यह क्रूर भूमि बंदोबस्त था।
आज़ादी के बाद: क्या ज़मींदारी सचमुच खत्म हुई?
1947 के बाद ‘ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम’ (Zamindari Abolition Act) और ‘भूमि हदबंदी कानून’ (Land Ceiling Act) पास किए गए।
लेकिन हकीकत क्या रही? चालाक बड़े ज़मींदारों ने अपने नौकरों, दूर के रिश्तेदारों, यहाँ तक कि अपने पालतू कुत्तों और घोड़ों के नाम पर ज़मीनें ट्रांसफर करवाकर सीलिंग से बचा लीं! विनोबा भावे का ‘भूदान आंदोलन’ भी केवल बंजर और पथरीली ज़मीनों तक सिमट कर रह गया।
नतीजा यह हुआ कि आज़ादी के बाद भी उपजाऊ ज़मीन का बड़ा हिस्सा कुछ प्रभावशाली परिवारों के हाथ में रहा और वास्तविक हलवाहा आज भी भूमिहीन या नाममात्र का काश्तकार बना रहा।
किताब से कड़वा सच
“भूमि सुधारों का सबसे बड़ा दुखद पहलू यह रहा कि कानून बनाने वाले खुद बड़े भू-स्वामी थे। वे कानून की ऐसी भाषा लिखते थे जिसमें से बचने के सौ रास्ते पहले से खुले होते थे। स्वतंत्र भारत की नौकरशाही ने अंग्रेज़ों के पटवारी, कानूनगो और तहसीलदार वाले उसी दमनकारी तंत्र को जस का तस बनाए रखा, जिसका काम किसान की सेवा करना नहीं, बल्कि उसे मुकदमों और खसरा-खतौनी की भूलभुलैया में उलझाकर रखना है।”
— ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ (अध्याय 4)
असली समाधान क्या है?
- डिजिटल भूमि अभिलेखों की निष्पक्ष जांच: केवल कम्प्यूटरीकरण काफी नहीं है; ज़मीनी स्तर पर भौतिक सत्यापन (Physical Ground Truthing) हो कि असल में उस ज़मीन पर किसका कब्ज़ा और जुताई है।
- भूमिहीन परिवारों को आवासीय व कृषि पट्टा: ग्राम सभा की अनुपयोगी और ग्राम समाज की ज़मीनों को पारदर्शी तरीके से गाँव के सबसे गरीब दलित, पिछड़े और निर्धन सवर्ण भूमिहीनों में बाँटा जाए।
- चकबंदी (Consolidation) में भ्रष्टाचार पर रोक: चकबंदी प्रक्रिया में छोटे किसानों की उपजाऊ ज़मीन काटकर अमीरों को दिए जाने के खेल पर कठोर दंडात्मक रोक लगे।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
धरती किसी की बपौती नहीं, प्रकृति का उपहार है। जब तक ज़मीन का वास्तविक हक हल चलाने वाले को नहीं मिलेगा, तब तक क्या सामाजिक न्याय की कोई भी बात सच हो सकती है?
इतिहास की इस गहरी पड़ताल को समझने के लिए पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का चौथा अध्याय अवश्य पढ़ें।
प्राचीन भारत में ज़मीन राजा की निजी संपत्ति नहीं थी; राजा केवल सुरक्षा के बदले फसल का एक अंश लेता था। अंग्रेज़ों ने ज़मीन पर निजी मिल्कियत और लगान की क्रूर व्यवस्था थोपकर भारतीय गाँव की स्वायत्तता का गला घोंट दिया।