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प्रेमचंद के 'होरी' से 'पीपली लाइव' तक — किसान का दर्द 90 साल में बदला क्यों नहीं?

एन. सिंह · ·4 मिनट

सन 1936 में मुंशी प्रेमचंद का कालजयी उपन्यास ‘गोदान’ प्रकाशित हुआ था। उस उपन्यास का नायक ‘होरी’ जीवन भर एक गाय पालने का सपना देखता है, ज़मींदार के लगान और साहूकार के कर्ज़ के चक्रव्यूह में पिसता है, और अंत में सड़क पर मजदूरी करते हुए लू लगने से दम तोड़ देता है। मरते समय उसकी पत्नी धनिया के पास पुरोहित को गोदान देने के लिए बीस आने पैसे भी नहीं होते।

अब 1936 से सीधे 2010 में आइए।

बॉलीवुड की चर्चित फिल्म ‘पीपली लाइव’ आती है। उसमें एक गरीब किसान ‘नत्था’ कर्ज़ में डूबा है और अपनी ज़मीन को बैंक की नीलामी से बचाने के लिए सरकारी योजना के लालच में आत्महत्या करने की सोचने लगता है। पूरा मीडिया, राजनेता और अफ़सरशाही उसके इर्द-गिर्द तमाशा बना देते हैं, लेकिन कोई उसकी ज़मीन बचाने की बात नहीं करता।

1936 से लेकर आज तक लगभग 90 साल बीत गए। अंग्रेज़ चले गए, देश में अपनी सरकारें आ गईं, चौदह आम चुनाव हो गए, चाँद पर रॉकेट पहुँच गए। लेकिन क्या किसान की ज़िंदगी में कुछ बदला?

होरी का ज़माना था तो ज़मींदार और महाजन थे; आज का ज़माना है तो बैंक, रिकवरी एजेंट, बीज कंपनियाँ और दलाल हैं। शोषण का केवल चेहरा बदला है, शोषण का दर्द रत्ती भर नहीं घटा!


साहित्य और सिनेमा में किसान की सिसकी

अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के दूसरे अध्याय में लेखकद्वय एन. सिंह और विमला सिंह हिंदी साहित्य, कविता और भारतीय सिनेमा के उन तमाम दस्तावेज़ों की पड़ताल करते हैं जिन्होंने किसान के दर्द को दर्ज किया।

वे याद दिलाते हैं कि कैसे बिमल रॉय की 1953 की क्लासिक फिल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ में बलराज साहनी (शंभू महतो) अपनी दो बीघा ज़मीन को शहर के मिल मालिक से बचाने के लिए कलकत्ता की सड़कों पर नंगे पैर रिक्शा खींचता है, अपनी छाती का खून थूकता है, लेकिन अंत में उसकी ज़मीन पर कारखाना बन ही जाता है।

केदारनाथ अग्रवाल की कविताएँ हों, नागार्जुन की व्यंग्य-वाणी हो या निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर’—भारतीय साहित्य ने बार-बार चीखकर सत्ता को आगाह किया कि जिस देश की बुनियाद खेत में है, वह देश अगर किसान को रुलाएगा तो उसकी पूरी सभ्यता खोखली हो जाएगी।

लेकिन विडंबना यह है कि राजनीति ने साहित्य के इस दर्द को केवल रैलियों में वोट बटोरने की शायरी बना दिया। जब चुनाव आते हैं तो नेताओं को होरी की याद आती है, और चुनाव खत्म होते ही बजट का 80% हिस्सा कॉरपोरेट कंपनियों की रियायतों में बंट जाता है।


किताब से कड़वा सच

लेखकद्वय इस सांस्कृतिक और आर्थिक अंतर्विरोध पर प्रहार करते हुए लिखते हैं:

“साहित्य और फिल्मों में किसान को या तो एक दयनीय, असहाय लाचार के रूप में चित्रित किया गया, या फिर ‘मेरे देश की धरती सोना उगले’ जैसे झूठे रूमानी गीतों में गाकर यथार्थ से आँखें मूंद ली गईं। सच्चाई यह है कि किसान न तो गीत गाने की हालत में है और न ही वह केवल दया का पात्र बनना चाहता है। किसान स्वाभिमानी श्रमजीवी है। जब उसकी लागत 2000 रुपये प्रति क्विंटल बैठती है और बाज़ार उसे 1500 रुपये में बेचने को मजबूर करता है, तो यह घाटा किसी दैवीय आपदा से नहीं होता; यह सत्ता द्वारा रची गई एक सुनियोजित लूट है।”
— ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ (अध्याय 2)


असली समाधान क्या है?

किसान को साहित्य के पन्नों में आंसू बहाने वाला पात्र बनाए रखने के बजाय उसे आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:

  1. लागत आधारित सुनिश्चित आय: एम.एस. स्वामीनाथन आयोग की ‘C2+50%’ (समग्र लागत का डेढ़ गुना) सिफारिश को कानूनी गारंटी बनाया जाए, ताकि किसान को किसी की दया पर न जीना पड़े।
  2. कर्ज़ मुक्ति बनाम कर्ज़ माफ़ी: कर्ज़ माफ़ी तात्कालिक मरहम है, स्थाई इलाज नहीं। स्थायी इलाज यह है कि खेती को इतना मुनाफे का सौदा बनाया जाए कि किसान को कर्ज़ लेने की ज़रूरत ही न पड़े।
  3. गाँव स्तर पर प्रोसेसिंग यूनिट्स: किसान केवल कच्चा माल न बेचे। गाँव में ही टमाटर से सॉस, आलू से चिप्स और गन्ने से गुड़ बनाने की सहकारी इकाइयां लगाई जाएं, ताकि मूल्य संवर्धन (Value Addition) का लाभ बिचौलियों के बजाय किसान की जेब में जाए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या आज़ाद भारत का समाज कभी किसान को केवल एक ‘मदद मांगने वाले गरीब’ की नज़र से देखना बंद करके उसे देश के वास्तविक ‘धन-निर्माता’ (Wealth Creator) का दर्जा दे पाएगा?

अगर आप यह समझना चाहते हैं कि प्रेमचंद के समय से लेकर आज तक किसान के शोषण का आर्थिक पहिया कैसे घूमता रहा है, तो पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का यह अध्याय आपकी आँखें खोल देगा।

गोदान का होरी, दो बीघा ज़मीन का शंभू और पीपली लाइव का नत्था—ये सिर्फ काल्पनिक पात्र नहीं हैं; ये भारत की उस व्यवस्था का नग्न चेहरा हैं जो अन्नदाता को हमेशा याचक बनाकर रखती है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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