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कर्मकांड, पशुबलि और पुरोहितवाद पर बुद्ध का तीखा प्रहार — जब धर्म दिखावा बन जाए

एन. सिंह · ·5 मिनट

हमारे समाज में सदियों से यह अंधविश्वास गहराई से जमा हुआ है कि यज्ञ कुंडों में मनचाहे टन घी और अन्न झोंकने से, और बेजुबान पशुओं की गर्दन पर छुरी चलाकर देवताओं को लहू चढ़ाने से मोक्ष या स्वर्ग मिल जाता है। तथागत बुद्ध ने ईसा पूर्व छठी शताब्दी में जब वैदिक कर्मकांड के इस विकराल आडंबर को देखा, तो उन्होंने अत्यंत निर्भीकता और स्पष्टता के साथ इस झूठे प्रदर्शन को धिक्कारा।

एन. सिंह अपनी विचारोत्तेजक पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ में धम्मपद की गाथा-१०६ के मार्मिक विश्लेषण में लिखते हैं:

‘जो महीने-महीने सौ वर्ष तक हजारों रुपयों से यज्ञ करे और यदि परिशुद्ध मन वाले पुरुष को मुहूर्तभर भी पूज ले, तो सौ वर्ष के हवन से वह मुहूर्तभर की पूजा श्रेष्ठ है।’
बुद्ध, यज्ञ की सम्यक दिशा की तरफ इशारा कर रहे हैं। हिन्दू समाज में यज्ञ सदियों से प्रचलित रहा है। अग्नि जलाओ, आहुतियां डालो, घी जलाओ, अन्न फेंको; न जाने कितने तरह के यज्ञ प्रचलित हैं और पहले से ही रहे हैं। हिंसक यज्ञ भी प्रचलित रहे हैं—नरमेध यज्ञ, गोमेध यज्ञ, अश्वमेध यज्ञ; भयंकर हिंसा! बुद्ध कहते हैं: अग्नि में आहुति डालने से क्या होगा? अग्नि तो प्रकृति का एक जड़ तत्व है। भीतर के विकारों—लोभ, क्रोध और वासना की आहुति दो, तभी जीवन में ज्योति जलेगी।
— ‘बुद्ध धम्म और भारत’


बाह्य आडंबर बनाम आंतरिक रूपांतरण

बुद्ध के युग में पुरोहित वर्ग ने धर्म को अत्यंत जटिल कर्मकांडों में उलझा दिया था। आम जनता को यह भय दिखाया जाता था कि यदि अमुक यज्ञ न कराया गया, तो देवता कुपित हो जाएंगे, वर्षा नहीं होगी, वंश नहीं चलेगा या नरक भोगना पड़ेगा। गरीब से गरीब गृहस्थ भी अपने कर्ज़ लेकर पुरोहितों को दक्षिणा देने और पशुओं की बलि देने पर विवश था।

तथागत ने इस धार्मिक शोषण के मूल तंत्र पर प्रहार करते हुए तीन बुनियादी सत्य स्थापित किए:

  1. अहिंसा परमो धम्म: जिस जीवन को हम बना नहीं सकते, उसे छीनने का अधिकार हमें किसने दिया? अपनी किसी तुच्छ कामना की पूर्ति के लिए किसी मूक बकरे, घोड़े या गाय को बलि-वेदी पर चढ़ाना धर्म नहीं, बल्कि जघन्य अपराध है।
  2. संसाधनों की बर्बादी: उस देश में जहाँ करोड़ों लोग भूख और कुपोषण से बेहाल हों, वहाँ टन-मन घी, दूध और खाद्यान्न को आग में भस्म कर देना घोर सामाजिक संवेदनहीनता है।
  3. मन की शुद्धि ही वास्तविक यज्ञ है: अग्नि में तिल और जौ डालने से मन के काम, क्रोध, मद और मत्सर भस्म नहीं होते। वास्तविक यज्ञ है—अपने भीतर के अहं और दुर्गुणों का संन्यास लेना।

आधुनिक युग में धार्मिक बाज़ारवाद का विस्तार

आज इक्कीसवीं सदी में भले ही खुलेआम नरमेध या अश्वमेध यज्ञ न होते हों, परंतु कर्मकांडों और अंधविश्वासों का स्वरूप और भी अधिक व्यावसायिक हो गया है:

  • करोड़ों रुपयों के महायज्ञ और अनुष्ठान: बड़े-बड़े शहरों में भव्य पंडालों में अरबों रुपये खर्च करके धार्मिक आयोजन होते हैं, जबकि उसी पंडाल की दीवार के बाहर फुटपाथ पर भूखे बच्चे भीख मांग रहे होते हैं।
  • अंधविश्वास का नया कॉर्पोरेट अवतार: आज टीवी चैनलों और यूट्यूब पर अंगूठियां, ताबीज, कालसर्प दोष निवारण और वास्तु-शांति के नाम पर जनता की भय-जनित मानसिकता को भुनाया जा रहा है।
  • भय का व्यापार: पुरोहितवाद आज भी मनुष्य को उसके पापों का प्रायश्चित बाहरी मंत्रोच्चार और दान-दक्षिणा से कराने का झांसा देता है, जबकि बुद्ध का स्पष्ट नियम था: किए गए कर्म का फल भुगतना ही पड़ेगा, कोई भी बाहरी शक्ति कर्म-विपाक से मुक्ति नहीं दिला सकती।

तथागत का मार्ग: सम्यक जीवन ही सच्ची पूजा

धम्मपद में भगवान बुद्ध बार-बार कहते हैं कि पूजा केवल उसी की सार्थक है जो चित्त को निर्मल, शीलवान और करुणामयी बना सके:

  • गाथा-१०७ का संदेश: यदि कोई वन में सौ वर्ष तक अग्नि की उपासना करे, और कोई आत्मसंयमी पुरुष का क्षण भर भी आदर करे, तो उस सौ वर्ष की अग्नि-पूजा से यह क्षण भर का आदर अनंत गुना श्रेष्ठ है।
  • नैतिकता ही पूजा है: यदि आपका आचरण शुद्ध नहीं है, यदि आप पड़ोसियों से घृणा करते हैं, यदि आप व्यापार में मिलावट और बेईमानी करते हैं, तो चौबीसों घंटे किए जाने वाले भजन-कीर्तन और यज्ञ व्यर्थ का पाखंड मात्र हैं।

हमें आज क्या कदम उठाने चाहिए?

  1. धार्मिक आयोजनों के बजट को जनकल्याण में लगाना: यदि किसी मंदिर, गुरुद्वारे या संस्था द्वारा धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन हो, तो उसका 80% बजट निर्धन बच्चों की शिक्षा, अस्पताल, अनाथालयों और पौधारोपण में लगाया जाना चाहिए।
  2. पशुबलि और अंधविश्वास का पूर्ण बहिष्कार: किसी भी मंदिर या मेले में धर्म के नाम पर पशुबलि का कड़ा विरोध करें और कानून का सहारा लेकर ऐसी बर्बर प्रथाओं को बंद कराएं।
  3. वैज्ञानिक चेतना और तर्कशील दृष्टिकोण: किसी भी धार्मिक क्रिया को करने से पहले पूछें—“क्या इससे किसी का भला हो रहा है? क्या यह प्रकृति के नियमों के अनुकूल है? क्या इससे मेरे चित्त के विकार दूर हो रहे हैं?”

एक विचारणीय सवाल

हवन कुंड में घी जलाकर और पुरोहितों को जेब भरकर क्या कभी कोई पापी निष्पाप हो सका है? यदि नदी में डुबकी लगाने से मोक्ष मिल सकता, तो सबसे पहले मोक्ष मछलियों और मेंढकों को मिलता!

धर्म के नाम पर चल रहे इस बाज़ार और अंधविश्वास से मुक्त होकर विशुद्ध आचरण का मार्ग अपनाने के लिए पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का यह अध्याय आपकी आंखें खोल देगा।

जो महीने-महीने सौ वर्ष तक हजारों रुपयों से यज्ञ करे और यदि परिशुद्ध मन वाले पुरुष को मुहूर्तभर भी पूज ले, तो सौ वर्ष के हवन से वह मुहूर्तभर की पूजा श्रेष्ठ है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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