1932 का पूना पैक्ट — वो अधूरा सच जिसने भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया
एन. सिंह · ·6 मिनट
२४ सितंबर १९३२—पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल का वह ऐतिहासिक दृश्य भारतीय आधुनिक इतिहास का सबसे नाटकीय और दूरगामी मोड़ था।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने गोलमेज सम्मेलनों के बाद ‘कम्युनल अवार्ड’ (सांप्रदायिक पंचाट) की घोषणा की थी, जिसके तहत भारत के अछूतों (दलितों) को मुसलमानों और सिखों की तरह ‘पृथक निर्वाचन’ (Separate Electorate) का अधिकार दिया गया था। इसका सीधा अर्थ यह था कि दलित बस्तियों में केवल दलित उम्मीदवार खड़ा होगा और उसे केवल दलित मतदाता ही वोट देकर चुनेंगे।
महात्मा गांधी ने इसके खिलाफ यरवदा जेल में ‘आमरण अनशन’ शुरू कर दिया। गांधी जी का तर्क था कि पृथक निर्वाचन से हिंदू समाज हमेशा के लिए टूट जाएगा और अस्पृश्यता की समस्या स्थायी बन जाएगी।
गांधी जी की तबीयत दिन-प्रतिदिन बिगड़ने लगी। पूरे देश में भयानक तनाव फैल गया। यदि गांधी जी को कुछ हो जाता, तो पूरे देश में दलितों के खिलाफ भयानक हिंसा भड़कने का खतरा था।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर पर भारी नैतिक और सामाजिक दबाव था। अंततः भारी मन से, एक गहरे आंतरिक द्वंद्व के साथ बाबासाहेब यरवदा जेल पहुंचे और गांधी जी के सामने ऐतिहासिक ‘पूना पैक्ट’ (Poona Pact) पर हस्ताक्षर किए।
पृथक निर्वाचन वापस ले लिया गया, और उसके बदले दलितों के लिए सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही ‘आरक्षित सीटें’ (Joint Electorate with Reserved Seats) स्वीकार की गईं।
सवाल यह है: 90 साल बाद आज भारतीय राजनीति का जो स्वरूप हमारे सामने है, क्या पूना पैक्ट ने दलित समाज को वास्तविक राजनीतिक मुक्ति दी? या फिर उसने दलित समाज को ऐसे ‘मूक’ और ‘लाचार’ जनप्रतिनिधि दिए जो संसद में बैठकर भी अपने ही समाज के उत्पीड़न पर होंठ सिले रहते हैं?
संयुक्त निर्वाचन की विडंबना: ‘आकाओं’ के गुलाम जनप्रतिनिधि
बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में पूना पैक्ट के परिणामों पर गहरा अफसोस जताया था।
उन्होंने अपनी पुस्तक ‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स’ में खुलकर लिखा कि पूना पैक्ट के जरिए जो आरक्षण मिला, उसने दलितों की वास्तविक आवाज़ का गला घोंट दिया:
- सजातीय वोट बनाम बहुसंख्यक वोट: आरक्षित सीट पर उम्मीदवार तो एससी या एसटी का होता है, परंतु उस सीट पर 75% से 80% मतदाता गैर-दलित होते हैं। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि वही दलित नेता चुनाव जीत सकता है जो बहुसंख्यक उच्च जातियों और अपनी पार्टी के आलाकमान को खुश रखे। यदि कोई दलित नेता अपने समाज के आत्मसम्मान और ज़मीन के अधिकारों की बात करेगा, तो बहुसंख्यक मतदाता उसे कभी वोट नहीं देंगे!
- पार्टी आलाकमान के रबर स्टाम्प: आज लोकसभा में 84 सांसद अनुसूचित जाति और 47 सांसद अनुसूचित जनजाति के हैं। कुल 131 आरक्षित सांसद! परंतु जब हाथरस, उना, या देश के किसी कोने में किसी दलित बेटी पर अत्याचार होता है, या दलितों पर सामंती हमले होते हैं, तो क्या इन 131 सांसदों में से किसी की आवाज़ संसद में गूंजती है? बिल्कुल नहीं! वे अपनी पार्टी की व्हिप (Whip) से बंधे होते हैं और केवल आलाकमान की जय-जयकार करते हैं।
- स्वतंत्र नेतृत्व का विनाश: बाबासाहेब चाहते थे कि दलित समाज अपना नेता खुद चुने, जो किसी पार्टी का मोहताज न हो। पूना पैक्ट ने स्वतंत्र दलित नेतृत्व को कुचलकर उसे राष्ट्रीय पार्टियों की ‘पालतू शाखा’ (Pocket Borough) में बदल दिया।
पृथक निर्वाचन बनाम पूना पैक्ट (संयुक्त निर्वाचन): तुलनात्मक विश्लेषण
| कसौटी | पृथक निर्वाचन (बाबासाहेब का मूल प्रस्ताव) | पूना पैक्ट / संयुक्त निर्वाचन (गांधी जी का मॉडल) |
|---|---|---|
| वोटर कौन? | केवल दलित मतदाता ही दलित उम्मीदवार को चुनते | क्षेत्र के सभी जातियों के मतदाता मिलकर दलित उम्मीदवार को चुनते हैं |
| जवाबदेही | उम्मीदवार केवल अपने शोषित समाज के प्रति पूरी तरह जवाबदेह होता | उम्मीदवार बहुसंख्यक वोटरों और पार्टी आलाकमान के रहमोकरम पर निर्भर |
| नेतृत्व का चरित्र | निर्भीक, स्वाभिमानी, बागी और समझौता न करने वाला नेता | विनम्र, आज्ञाकारी, पार्टी लाइन पर चलने वाला और चुप रहने वाला नेता |
| दीर्घकालिक प्रभाव | राजनीतिक रूप से स्वतंत्र और निर्णायक तीसरी शक्ति | मुख्यधारा की बड़ी पार्टियों का वोट-बैंक और मूक दर्शक |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की ऐतिहासिक चीरफाड़
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय ‘पूना पैक्ट: अधूरा सच’ में लिखते हैं:
“पूना पैक्ट ने दलितों को संसद में सीटें तो दिलवा दीं, लेकिन उनकी वास्तविक राजनीतिक आवाज़ छीन ली। आज आरक्षित सीटों से वही नेता जीतता है जो अपनी पार्टी के आकाओं की जी-हजूरी करे, अपने समाज के हक के लिए बागी बनने वाले को व्यवस्था पहले ही बाहर कर देती है। 131 आरक्षित सांसद संसद में बैठे हैं, फिर भी देश में रोज़ दलितों पर अत्याचार होते हैं, उनकी बस्तियां जलाई जाती हैं, और संसद में सन्नाटा पसरा रहता है। यह चुप्पी साबित करती है कि पूना पैक्ट ने दलितों को आरक्षण नहीं, बल्कि राजनीतिक बंधुआ मजदूरी का पट्टा थमा दिया था। जब तक आरक्षित सीटों पर केवल अपनी पार्टी के आकाओं को खुश करने वाले नेता चुनकर आते रहेंगे, तब तक बाबासाहेब का समतामूलक भारत का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 212-213)
लेखक आगे एक बहुत साहसिक समाधान की ओर इशारा करते हैं:
“यदि हमें पूना पैक्ट की इस ऐतिहासिक विसंगति को सुधारना है, तो हमें आरक्षित सीटों पर मतदान की दोहरी प्रणाली (Dual Voting System) या आनुपातिक प्रतिनिधित्व पर विचार करना होगा, ताकि शोषित समाज अपनी मर्जी का सच्चा प्रतिनिधि चुन सके।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 218)
इस विसंगति को सुधारने के चार व्यावहारिक कदम
- प्राथमिक मतदान प्रणाली (Primary Voting System): आरक्षित सीट पर चुनाव से पहले उस वर्ग के मतदाताओं के बीच एक प्राथमिक मतदान हो, और जो दो उम्मीदवार अपने समाज के सबसे अधिक वोट पाएं, केवल वे ही मुख्य चुनाव में उतरें।
- दलित-आदिवासी सांसदों का स्वतंत्र राष्ट्रीय कॉकस (Independent Caucus): अमेरिकी संसद के ‘ब्लैक कॉकस’ की तर्ज पर भारतीय संसद में सभी 131 एससी/एसटी सांसद दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक स्वतंत्र मोर्चा बनाएं जो शोषितों के मुद्दों पर एकजुट होकर वीटो कर सके।
- पार्टी व्हिप (Whip) से मुक्ति: सामाजिक न्याय, आरक्षण और मानवाधिकारों से जुड़े विधेयकों पर आरक्षित वर्ग के सांसदों को अपनी पार्टी की व्हिप से छूट मिले ताकि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज़ से वोट कर सकें।
- समानुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation): देश में ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ सिस्टम के स्थान पर जर्मनी की तर्ज पर आनुपातिक वोटिंग प्रणाली लाई जाए ताकि छोटे और हाशिए के वर्गों को उनकी वोट संख्या के अनुपात में सीधी सीटें मिलें।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या 131 आरक्षित सांसदों का संसद में गूंगे-बहरे बनकर बैठे रहना बाबासाहेब के त्याग और सपनों के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात नहीं है?
गांधी और अम्बेडकर के उस ऐतिहासिक द्वंद्व, पूना पैक्ट की अदृश्य कड़ियों और आधुनिक भारतीय राजनीति के इस सबसे बड़े अनसुलझे रहस्य को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह अध्याय हर भारतीय को निष्पक्ष दृष्टि से पढ़ना चाहिए।
पूना पैक्ट ने दलितों को संसद में सीटें तो दिलवा दीं, लेकिन उनकी वास्तविक राजनीतिक आवाज़ छीन ली। आज आरक्षित सीटों से वही नेता जीतता है जो अपनी पार्टी के आकाओं की जी-हजूरी करे, अपने समाज के हक के लिए बागी बनने वाले को व्यवस्था पहले ही बाहर कर देती है।