अधूरी जातिगत जनगणना: आँकड़ा नहीं, भ्रम
एन. सिंह · ·8 मिनट
मान लीजिए किसी वन विभाग के अधिकारियों को एक विशाल जंगल का स्वास्थ्य और उसकी स्थिति सुधारने का जिम्मा सौंपा जाए।
यदि वे अधिकारी जंगल में जाकर केवल यह गिन लें कि जंगल में कितने शीशम के पेड़ हैं, कितने बबूल हैं, कितने नीम हैं और कितने पीपल—और पेड़ों की केवल संख्या लिखकर एक रंगीन रिपोर्ट सरकार को सौंप दें, तो क्या इससे उस जंगल की प्यास बुझेगी?
वे अधिकारी यह न देखें कि किस पेड़ की जड़ें दीमक चाट रही हैं, किस क्षेत्र में भूमिगत जल सूख चुका है, किस वृक्ष को खाद और धूप की दरकार है, और कौन सा पेड़ फल-फूलकर पूरे जंगल पर छाया हुआ है। यदि केवल पेड़ों की प्रजातियों के सिर गिने जाएं और खाद-पानी का कोई इंतज़ाम न हो, तो वह सर्वे जंगल का उद्धार नहीं कर सकता; वह केवल लकड़हारों को यह बताएगा कि किस प्रजाति की लकड़ी काटकर सबसे ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है!
आज हमारे देश में चल रही ‘जातिगत जनगणना’ (Caste Census) की संपूर्ण बहस ठीक इसी मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है।
मांग की जा रही है कि हर जाति का सिर गिना जाए। लेकिन कोई भी सत्ताधारी या विपक्षी नेता यह नहीं बता रहा है कि क्या यह जनगणना केवल संख्या गिनने तक सीमित रहेगी, या इसमें उस जाति के भीतर के वास्तविक आर्थिक, शैक्षिक और जीवन-स्तर के कड़वे यथार्थ को भी दर्ज किया जाएगा?
अधूरी गिनती: आँकड़ा नहीं, बल्कि सामाजिक भ्रम
यदि किसी जातिगत जनगणना में केवल जातियों के नाम और उनकी जनसंख्या दर्ज की जाए, तो वह समाज को समझने का औज़ार नहीं बनेगी; वह केवल चुनावी दलालों के लिए वोट-बैंक का नया नक्शा बन जाएगी।
एन. सिंह अपनी विचारोत्तेजक पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय ‘अधूरी जातिगत जनगणना: आँकड़ा नहीं, भ्रम’ में लिखते हैं:
“यदि जातिगत जनगणना में केवल यह गिन लिया जाए कि कौन-सी जाति कितनी संख्या में है, तो यह सांख्यिकीय जानकारी तो होगी, पर सामाजिक यथार्थ नहीं। वास्तविक सामाजिक स्थिति जानने के लिए प्रत्येक जाति की औसत आय, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में घर–जमीन–संपत्ति का वितरण, सरकारी और निजी क्षेत्र में नौकरियों में वास्तविक भागीदारी, शिक्षा के स्तर और पेशागत विभाजन एवं पीढ़ीगत सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) को मापना अनिवार्य है। इसके बिना जातिगत जनगणना केवल यह बताएगी कि ‘कौन कितने हैं’, लेकिन यह कभी नहीं बताएगी कि कौन वास्तव में वंचित है, कौन पहले से सशक्त है और कौन केवल पहचान के आधार पर संसाधनों का दावा कर रहा है। ऐसी जनगणना सुधार का औज़ार नहीं, बल्कि संघर्ष का नक्शा बन जाती है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 149-150)
गिनती से आगे: वास्तविक सामाजिक न्याय के पाँच अनिवार्य संकेतक
यदि राज्य सचमुच ईमानदार है और वह जातियों के नाम पर राजनीति करने के बजाय समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुँचना चाहता है, तो उसे केवल जाति का ठप्पा देखने के बजाय निम्नलिखित पाँच बुनियादी संकेतकों (Socio-Economic Indicators) को अनिवार्य रूप से गिनना होगा:
- औसत पारिवारिक आय और कर्ज का बोझ: जाति के भीतर यह देखना होगा कि परिवार की मासिक आय कितनी है, क्या वह गरीबी रेखा के नीचे है, और क्या वह स्थानीय सूदखोरों या माइक्रो-फाइनेंस कंपनियों के कर्ज के जाल में फंसा हुआ है।
- भूमि, आवास और अचल संपत्ति का वितरण: क्या परिवार के पास खेती योग्य ज़मीन है? क्या उसके पास पक्की छत है, या वह आज भी रेलवे लाइन के किनारे या सरकारी बंजर भूमि पर फटी प्लास्टिक के नीचे जीवन गुजार रहा है?
- शिक्षा का वास्तविक स्तर और ड्रॉप-आउट रेट: उस परिवार में कितने बच्चे स्नातक या तकनीकी रूप से प्रशिक्षित हैं? क्या बच्चे पाँचवीं या आठवीं के बाद आर्थिक तंगी के कारण स्कूल छोड़कर बाल-मजदूरी करने पर मजबूर हो जाते हैं?
- सरकारी व निजी असंगठित क्षेत्र में भागीदारी: क्या उस जाति के लोग केवल दिहाड़ी मजदूरी, सफाई कार्य और रिक्शा चलाने जैसे असंगठित व असुरक्षित कामों में लगे हैं, या उनके पास सुरक्षित वेतनभोगी रोज़गार है?
- पीढ़ीगत सामाजिक गतिशीलता (Intergenerational Mobility): क्या दादाजी के समय जो स्थिति थी, पिता और पोते के समय उसमें कोई गुणात्मक सुधार हुआ? या तीन पीढ़ियों के बाद भी परिवार उसी झोपड़ी और अभाव में सांस ले रहा है?
केवल सिर गिनने वाली राजनीति बनाम बहुआयामी सामाजिक न्याय
| पैमाना | केवल संख्या-आधारित गणना (सतही भ्रम) | बहुआयामी सामाजिक-आर्थिक गणना (सच्चा न्याय) |
|---|---|---|
| मूल फोकस | “किस जाति का कितना वोट शेयर और संख्या-बल है?” | “किस परिवार के पास बुनियादी रोटी, कपड़ा, मकान और शिक्षा का अभाव है?” |
| परिणाम | जातियों के बीच वर्चस्व, ईर्ष्या और चुनावी सौदेबाजी | लक्षित जनकल्याण, सीधे बैंक खाते में मदद और वास्तविक सशक्तिकरण |
| क्रीमी लेयर का सच | जाति के रसूखदार और संपन्न लोग ही आरक्षण का सारा लाभ हड़प लेते हैं | संपन्न लोगों की पहचान कर उन्हें बाहर किया जाता है और अंतिम व्यक्ति को प्राथमिकता मिलती है |
| राष्ट्रीय प्रभाव | समाज का 4000 जातियों में स्थायी विखंडन और नफ़रत | आपसी समरसता, नागरिक बंधुत्व और राष्ट्रीय एकता का सुदृढ़ीकरण |
जाति और गरीबी को एक मान लेना: बौद्धिक सरलीकरण
हमारे देश के कई तथाकथित बुद्धिजीवी और नेता यह मान लेते हैं कि ‘निचली जाति’ का मतलब स्वतः ही ‘गरीब’ है, और ‘उच्च जाति’ का मतलब स्वतः ही ‘अमीर’ और ‘शोषक’ है।
एन. सिंह इस बौद्धिक सरलीकरण की धज्जियां उड़ाते हुए लिखते हैं:
“जाति और गरीबी को एक मान लेना भयंकर बौद्धिक दिवालियापन है। आज का भारत 1947 का भारत नहीं है। आज हर जाति में अमीर भी हैं और गरीब भी; हर जाति में सत्ता-संपन्न कुलीन वर्ग भी है और सड़क किनारे भीख मांगता लाचार वर्ग भी है। यदि आय, संपत्ति और शिक्षा की वास्तविक गणना नहीं होगी, तो आरक्षित जातियों के भीतर की संपन्न और दबंग उप-जातियां खुद को ‘वंचित’ दिखाकर सारा बजट हड़प लेंगी; और जो वास्तव में भूखे, भूमिहीन और कमजोर हैं, वे संख्या-बल में कम होने के कारण हमेशा के लिए अदृश्य (Invisible) रह जाएंगे! इससे आरक्षण और कल्याण योजनाएं गरीबी उन्मूलन का साधन न बनकर केवल जातीय सत्ता-संतुलन का क्रूर औजार बन जाएंगी।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 150-151)
सत्ता का असली खेल: डेटा नहीं, सामाजिक नियंत्रण
इतिहास गवाह है कि औपनिवेशिक अंग्रेजों से लेकर आज के सत्ता-लोलुप राजनेताओं तक—सत्ता को सबसे प्रिय आंकड़ा वही होता है जिससे समाज को टुकड़ों में बांटकर उस पर आसानी से राज किया जा सके।
- जब जनता बेरोजगारी, खस्ताहाल अस्पतालों, पेपर लीक और गिरती अर्थव्यवस्था पर सवाल पूछने लगती है, तो सत्ताधारी वर्ग तुरंत ‘जाति गणना’ का पासा फेंक देता है।
- इसके बाद हर जाति के नेता अपनी-अपनी जाति की रैलियां बुलाने लगते हैं, हर कोई खुद को “कम गिना गया” बताकर सड़कों पर चक्का जाम करने लगता है।
- नतीजा यह होता है कि आम नागरिक अपनी रोटी और अपने बच्चों के भविष्य को भूलकर केवल अपनी जाति का सैनिक बन जाता है!
एक समग्र और निष्पक्ष गणना का चार-सूत्रीय रोडमैप
- आर्थिक व संपत्ति डेटा का अनिवार्य एकीकरण: जाति के साथ-साथ परिवार की वार्षिक आय, कृषि भूमि का रकबा, आयकर रिटर्न, और बैंक ऋण का संपूर्ण डेटा डिजिटल रूप से लिंक किया जाए।
- सार्वजनिक ग्राम सभा सत्यापन: ब्लॉक के बंद कमरों में फर्जी आंकड़े भरने के बजाय हर गाँव की खुली चौपाल में संपत्ति और आवास के दावों का सोशल ऑडिट कराया जाए।
- अंतिम पायदान की जातियों के लिए विशेष खिड़की: जो उपजातियां संख्या में बहुत छोटी हैं (जैसे नट, मुसहर, बावरिया, कोरकू, गाड़िया लोहार), उन्हें केवल उनके संख्या-बल के भरोसे न छोड़ा जाए, बल्कि उनकी आर्थिक बदहाली के आधार पर सीधे शत-प्रतिशत सहायता मिले।
- कल्याणकारी योजनाओं का डी-लिंकिंग: मुफ्त राशन, पक्का आवास, और आयुष्मान स्वास्थ्य बीमा जैसी बुनियादी मानवीय सुविधाओं को जाति से पूरी तरह अलग करके शत-प्रतिशत ‘आर्थिक व भौतिक अभाव’ के आधार पर दिया जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का केंद्रीय संदेश)
क्या हम एक ऐसा भारत बनाना चाहते हैं जहाँ किसी इंसान की योग्यता, उसके दर्द और उसकी भूख को केवल उसकी जाति के चश्मे से आंका जाए? या एक ऐसा राष्ट्र जहाँ हर उस नागरिक के आंसू पोंछे जाएं जो वास्तव में लाचार और बेसहारा है?
जातिगत गणना के इस पूरे तिलिस्म, सत्ता के गुप्त षड्यंत्रों और वास्तविक सामाजिक न्याय के मार्ग को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का यह अध्याय हर उस भारतीय को पढ़ना चाहिए जो सत्य से मुंह नहीं मोड़ता।
जातिगत जनगणना केवल यह बताएगी कि "कौन कितने हैं", लेकिन यह नहीं बताएगी कि कौन वास्तव में वंचित है, कौन पहले से सशक्त है और कौन केवल पहचान के आधार पर संसाधनों का दावा कर रहा है। ऐसी जनगणना सुधार का औज़ार नहीं, बल्कि संघर्ष का नक्शा बन जाती है।