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मकान और पट्टा किसे मिले? असली भूमिहीन बनाम कागज़ी गरीब

एन. सिंह · ·6 मिनट

यदि आप किसी भी भारतीय गाँव के अंदरूनी रास्तों पर घूमें, तो आपको एक बहुत ही विचित्र और स्तब्ध कर देने वाला विरोधाभास देखने को मिलेगा।

गाँव के मुख्य रास्ते पर एक दो मंजिला पक्का मकान खड़ा होगा जिसके दरवाजे पर ट्रैक्टर खड़ा है, छत पर डिश-एंटीना लगा है, और उस मकान की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होगा—“प्रधानमंत्री आवास योजना / मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत निर्मित लाभार्थी: अमुक व्यक्ति।”

और उसी मकान से मात्र दो सौ मीटर दूर, गाँव के तालाब के किनारे या ऊसर ज़मीन पर, बांस की चार खप्पचों पर फटी हुई काली प्लास्टिक की पन्नी ताने एक परिवार रह रहा होगा। बरसात के दिनों में उस परिवार के बच्चे रात भर भीगते हैं, सर्दियों में ठिठुरते हैं और गर्मियों में लू के थपेड़े सहते हैं। जब आप उस बेसहारा परिवार से पूछते हैं—“क्या आपको सरकार से पक्का मकान या ज़मीन का पट्टा नहीं मिला?”

तो वह बूढ़ी औरत अपनी कांपती आवाज में कहती है—“बाबूजी! हम तो तीन बार ब्लॉक गए थे। पटवारी और सेक्रेटरी कहते हैं कि तुम्हारा नाम सूची में नहीं है। सूची में नाम जुड़वाने के लिए बीस हजार रुपये की रिश्वत मांगते हैं। हमारे पास खाने को आटा नहीं है, हम बीस हजार कहाँ से लाएं?”

यही है हमारे देश के ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) का सबसे नग्न और घिनौना यथार्थ!


पटवारी, प्रधान और दलालों का त्रिकोण: कागज़ पर गरीबी का खेल

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ में ग्रामीण भारत के उस भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र का पर्दाफाश करते हैं जो असली जरूरतमंद को कागजों पर ‘गायब’ कर देता है और रसूखदारों को ‘गरीब’ बना देता है:

  1. बीपीएल (BPL) और आवास सूचियों की नीलामी: ब्लॉक स्तर पर बीडीओ, ग्राम विकास अधिकारी (VDO), लेखपाल/पटवारी और गाँव के दबंग प्रधान का एक अटूट सिंडिकेट काम करता है। आवास की पहली किश्त जारी होते ही 25,000 से 40,000 रुपये का कमीशन पहले ही काट लिया जाता है। जो गरीब रिश्वत देने में असमर्थ होता है, उसे ‘अपात्र’ घोषित कर दिया जाता है।
  2. ज़मीन के पट्टों का फर्जीवाड़ा: ग्राम सभा की बंजर या चारागाह ज़मीन पर जब पट्टे बांटे जाते हैं, तो कायदे से वे गाँव के मुसहर, वाल्मीकि या भूमिहीन मजदूरों को मिलने चाहिए। परंतु अभिलेखों में हेरफेर करके वे पट्टे दबंगों के रिश्तेदारों या उनके फर्जी नौकरों के नाम दर्ज करा दिए जाते हैं।
  3. डिजिटल भारत में भी अंगूठे का शोषण: आज राशन से लेकर आवास तक सब कुछ ‘ऑनलाइन’ और ‘डीबीटी’ (Direct Benefit Transfer) होने का दावा किया जाता है। परंतु वास्तविकता यह है कि बैंक के सीएसपी (Customer Service Point) संचालक और स्थानीय दलाल अशिक्षित गरीबों के अंगूठे लगवाकर उनके खातों से पैसे निकाल लेते हैं और उन्हें केवल कुछ हजार रुपये थमा देते हैं।

कागज़ी गरीब बनाम वास्तविक भूमिहीन: एक तुलना

स्थिति कागज़ी गरीब (दबंग व रसूखदार) वास्तविक भूमिहीन (शोषित सर्वहारा)
आवास की स्थिति पहले से पुश्तैनी पक्का मकान और खेती योग्य भूमि उपलब्ध रेलवे लाइन किनारे, तालाब के बांध पर या खलिहान में कच्ची झोपड़ी
प्रशासनिक पहुंच प्रधान, विधायक और पटवारी के साथ उठना-बैठना और रिश्वत देने की क्षमता ब्लॉक या तहसील के बाबू की डांट सुनकर डर के मारे भाग जाने की लाचारी
कागज़ात की स्थिति राशन कार्ड (BPL/अंत्योदय), आधार, बैंक खाता और आय प्रमाण पत्र तुरंत तैयार कोई वैध कागज़ नहीं; आधार में नाम गलत, बैंक में खाता खुलवाना भी महाभारत
योजनाओं का लाभ आवास, शौचालय, किसान सम्मान निधि और फ्री राशन—सब कुछ प्राप्त केवल भाषणों और चुनावी नारों में ‘गरीब’ के रूप में इस्तेमाल

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का तीखा प्रहार

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय ‘कल्याणकारी लूटतंत्र’ में लिखते हैं:

“कल्याणकारी योजनाओं का सबसे दर्दनाक सच यह है कि जो लाइन में सबसे आगे खड़ा होने की ताकत रखता है, वह गरीब नहीं होता; और जो वास्तव में भूखा और बेघर है, वह तहसील और ब्लॉक की चौखट तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देता है। हमारे देश में गरीबी का निर्धारण इस बात से नहीं होता कि आपके पेट में अन्न है या नहीं, बल्कि इस बात से होता है कि पटवारी के बस्ते में आपके नाम के आगे मुहर लगाने के लिए आपने कितने नोट रखे हैं! यह व्यवस्था गरीबों की मदद करने के लिए नहीं बनाई गई है; यह व्यवस्था गरीबों के नाम पर अरबों का बजट हड़पने वाले दलालों के पोषण के लिए चल रही है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 128-129)

लेखक आगे समाधान की दिशा में चेतावनी देते हैं:

“जब तक आवास और भूमिहीनों के आवंटन का फैसला बंद कमरों में बैठे भ्रष्ट बाबुओं के हाथ से छीनकर खुली ग्राम सभा के सामूहिक सत्यापन को नहीं सौंपा जाएगा, तब तक भारत का कोई भी गरीब पक्की छत के नीचे चैन की नींद नहीं सो सकेगा।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 132)


असली भूमिहीनों को हक दिलाने के चार ठोस उपाय

  1. ड्रोन और सैटेलाइट से भौतिक सत्यापन: केवल कागज़ी हलफनामों पर विश्वास करने के बजाय ड्रोन कैमरों से लाभार्थी के वर्तमान आवास की 360-डिग्री वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य की जाए। जिसके पास पहले से पक्का मकान हो, उस पर धोखाधड़ी का मुकदमा चले।
  2. खुली ग्राम सभा में सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit): आवास और पट्टा पाने वालों की अंतिम सूची गाँव के सार्वजनिक चौराहे और पंचायत भवन पर बड़े अक्षरों में दीवार पर लिखी जाए और खुली चौपाल में पूरे गाँव के सामने एक-एक नाम पढ़कर पुष्टि की जाए।
  3. भ्रष्ट लेखपाल और प्रधान पर सीधी जेल: यदि किसी अपात्र व्यक्ति को आवास या पट्टा दिया गया, तो केवल लाभार्थी से वसूली न हो, बल्कि सत्यापन करने वाले लेखपाल और सचिव की सेवा तुरंत समाप्त कर उन पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई हो।
  4. भूमिहीन परिवारों को आवासीय पट्टे की कानूनी गारंटी: हर भूमिहीन ग्रामीण परिवार को कम से कम 5 डिसमिल ज़मीन का अविभाज्य और गैर-हस्तांतरणीय मालिकाना हक कानूनी अधिकार के रूप में दिया जाए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या आज़ादी के अमृतकाल में भी किसी भारतीय नागरिक का फटी हुई प्लास्टिक की पन्नी के नीचे दम तोड़ देना हमारे पूरे लोकतंत्र और न्यायपालिका के मुंह पर तमाचा नहीं है?

गाँव-देहात की इस रुला देने वाली हकीकत और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मकड़जाल को उजागर करने वाले प्रामाणिक विश्लेषण के लिए एन. सिंह की पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का यह अध्याय हर संवेदनशील नागरिक को पढ़ना चाहिए।

कल्याणकारी योजनाओं का सबसे दर्दनाक सच यह है कि जो लाइन में सबसे आगे खड़ा होने की ताकत रखता है, वह गरीब नहीं होता; और जो वास्तव में भूखा और बेघर है, वह तहसील और ब्लॉक की चौखट तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देता है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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