'आधे सच' का समाज — हम जाति मानते भी हैं और बात करने से डरते भी हैं
एन. सिंह · ·7 मिनट
आप जब भी अपने मित्रों, सहकर्मियों या रिश्तेदारों के बीच बैठते होंगे, तो अक्सर यह बात सुनने को मिलती है—“अरे भाई! अब तो 21वीं सदी आ गई है। अब कौन जाति-पाति मानता है? सब पढ़े-लिखे हैं, सब आधुनिक हैं, सब बराबर हैं।”
सुनने में यह बात कानों को बहुत सुकून देती है। ऐसा लगता है मानो सदियों पुराना अभिशाप रातों-रात हवा में गायब हो गया हो। लेकिन क्या यह पूरा सच है?
ज़रा एक पल के लिए अपनी आंखें बंद करके अपने अंतर्मन से पूछिए:
- अगर घर में किसी बेटे या बेटी की शादी तय होनी हो, तो सबसे पहली और अनिवार्य शर्त क्या होती है? अपनी ही जाति और गोत्र!
- अगर गाँव, मोहल्ले या नगर निगम का चुनाव हो, तो लोग दबे मुँह सबसे पहले क्या पूछते हैं? “अपने समाज का उम्मीदवार कौन खड़ा हुआ है?”
- अगर किसी सरकारी दफ्तर, विश्वविद्यालय या कॉर्पोरेट संस्थान में किसी नए अधिकारी की नियुक्ति हो, तो सहकर्मी चाय की चुस्कियों के बीच उसके उपनाम (Surname) से उसकी जाति टटोलने की कोशिश क्यों करते हैं?
- सोशल मीडिया के फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर अपनी-अपनी जातियों के नाम से पेज बनाकर ‘शान’, ‘रौब’ और ‘दबंगई’ के भौंडे गाने और रील कौन लोग बना रहे हैं?
यही है हमारे समाज का ‘आधा सच’। हमारे समाज की सबसे घातक और संक्रामक बीमारी यह है कि जिस जाति को हम सुबह उठने से लेकर रात सोने तक अपनी रग-रग में जीते हैं, सार्वजनिक मंचों पर सभ्य और सेक्युलर दिखने के लिए उसे स्वीकार करने से साफ मुकर जाते हैं!
आधुनिकता का नया मुखौटा और बौद्धिक पाखंड
हम अक्सर यह मुगालता पाल लेते हैं कि हाथ में महँगा आईफोन आ जाने से, अंग्रेजी की चार पंक्तियाँ बोल लेने से या वातानुकूलित मॉल और पब में घूम लेने से समाज आधुनिक हो गया है।
लेखक एन. सिंह हमें एक अत्यंत कड़वी और निर्मम सच्चाई से रूबरू कराते हैं: जाति खत्म नहीं हुई है, बल्कि उसने अपने बदसूरत चेहरे पर आधुनिकता और उच्च शिक्षा का एक परिष्कृत मुखौटा पहन लिया है।
- औपचारिक कानून बनाम अनौपचारिक व्यवहार: कानूनन संविधान का अनुच्छेद 15 और 16 जन्म, जाति और लिंग के आधार पर किसी भी भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। परंतु यथार्थ में अनौपचारिक सिफारिशों, निजी सम्पर्कों और भाई-भतीजावाद में जाति ही सबसे मजबूत अदृश्य तार की तरह काम करती है।
- बच्चों के कोमल मन में विष-वमन: हम बच्चों को स्कूल की प्रार्थना सभा में ‘हम सब भारतवासी भाई-बहन हैं’ की शपथ दिलवाते हैं, परंतु वही बच्चा जब घर की चौखट लांघता है, तो अपने माता-पिता और बुजुर्गों को जातिसूचक गालियाँ और पूर्वाग्रह व्यक्त करते देखता है। यह दोहरा चरित्र नई पीढ़ी के भीतर एक भयानक मानसिक पाखंड (Cognitive Dissonance) पैदा करता है।
- वर्चस्व की नई शब्दावली: पहले जो भेदभाव ‘छुआछूत’ के रूप में दिखाई देता था, आज वही भेदभाव ‘मेरिट’, ‘कल्चरल फिट’ या ‘बैकग्राउंड’ के परिष्कृत शब्दों की आड़ में नए सिरे से पुनरुत्पादित हो रहा है।
‘आधा सच’ बनाम ‘पूरा सच’: समाज का दोहरा चरित्र
| स्थिति | सार्वजनिक आधा सच (दिखावा) | निजी पूरा सच (हकीकत) |
|---|---|---|
| विवाह सम्बंध | “हम तो केवल लड़का-लड़की की योग्यता और समझदारी देखते हैं।” | अखबार के वैवाहिक विज्ञापन और रिश्तेदार केवल अपनी ही जाति में सम्बंध तलाशते हैं। |
| राजनीतिक चर्चा | “हम तो राष्ट्रहित, विकास और ईमानदार नेता को वोट देंगे।” | पोलिंग बूथ पर जाते ही उंगली अपनी ही जाति के उम्मीदवार के चुनाव चिन्ह पर दबती है। |
| सामाजिक मंच | “जाति-पाति तो पुरानी बातें हैं, आज का युवा इन सबसे ऊपर उठ चुका है।” | हॉस्टलों, दफ्तरों और गांवों में दोस्तों के गुट जातिगत समीकरणों के आधार पर बनते हैं। |
| सांस्कृतिक चेतना | “हम सब एक ही ईश्वर की संतान हैं और सनातन/भारतीय संस्कृति एक है।” | मंदिरों, धार्मिक आयोजनों और पुजारियों के चयन में जातिगत एकाधिकार आज भी बरकरार है। |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की दार्शनिक चीरफाड़
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ की प्रस्तावना में ही इस सामाजिक पाखंड की धज्जियां उड़ाते हुए लिखते हैं:
“समाज वही छिपाता है, जो उसे सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहाँ सच को पूरा बोलना सबसे बड़ा अपराध है। यहाँ आधा सच सुरक्षित है, पूरा सच खतरनाक। भारत के प्रसंग में हम कहते हैं कि देश बदल रहा है, लेकिन क्या समाज बदल रहा है ? हम कहते हैं कि भारत में जाति खत्म हो रही है, लेकिन क्या सच में खत्म हो रही है ? अगर जाति खत्म हो गई होती, तो नौकरी में उसका जिक्र क्यों होता ? संविधान में अनुच्छेद 15 और 16 की जरूरत क्यों पड़ती ? अगर जाति खत्म हो गई होती, तो चुनाव में उसका गणित क्यों बैठाया जाता ? अगर जाति खत्म हो गई होती तो, शादी में उसका नाम क्यों पूछा जाता ? सच यह है कि ‘जाति’ आज भी जिंदा है- बस उसने अपने चेहरे पर आधुनिकता का मुखौटा पहन लिया है। यह किताब उसी मुखौटे को हटाने की कोशिश है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 11)
लेखक आगे मानवीय स्वभाव की सीमाओं को उजागर करते हैं:
“मनुष्य में अच्छाई को पहचानने की क्षमता है, परन्तु उसे अपनाने का साहस सीमित है। यही सीमित साहस और अधूरा नैतिक विकास, समाज को बार-बार विभाजन की ओर ले जाता है… यदि हम यह स्वीकार कर सकें कि समस्या केवल ‘दूसरों’ में नहीं, बल्कि हम सभी के भीतर है, तो शायद हम एक अधिक ईमानदार संवाद की शुरुआत कर सकें। क्योंकि परिवर्तन का पहला कदम दूसरों पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि निर्मम आत्मस्वीकृति होता है।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 12-13)
इस पाखंड से मुक्ति का मार्ग: तीन क्रांतिकारी कदम
- ईमानदार आत्मस्वीकृति (Radical Self-Honesty): किसी भी बीमारी के इलाज की पहली शर्त यह है कि मरीज स्वीकार करे कि वह बीमार है। हमें अपने ड्राइंग रूमों में यह स्वीकार करने का साहस जुटाना होगा कि जातिवाद हमारे अवचेतन में गहरे पैठा हुआ है।
- जाति-निरपेक्ष विवाहों को सामाजिक प्रोत्साहन: जब तक रोटी और बेटी के संबंध जाति की चहारदीवारी के भीतर कैद रहेंगे, तब तक जाति कभी समाप्त नहीं हो सकती। अंतर्जातीय और अंतरधार्मिक विवाह करने वाले युवाओं को परिवारों और समाज द्वारा सुरक्षा व सम्मान मिलना चाहिए।
- जाति आधारित गौरव (Caste Pride) का बौद्धिक बहिष्कार: किसी कुल-विशेष में जन्म लेना किसी की निजी उपलब्धि नहीं हो सकता। अपनी गाड़ियों पर, कपड़ों पर या सोशल मीडिया पर जाति का झंडा लहराने को ‘महानता’ नहीं, बल्कि ‘मानसिक पिछड़ापन’ समझा जाना चाहिए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या हम अपनी आने वाली संतानों के लिए एक ऐसा भारत छोड़कर जा पाएंगे जहाँ किसी युवा को अपना आत्मसम्मान और पहचान पाने के लिए किसी जातिगत खूंटे से न बंधना पड़े?
हमारे समाज के इस असहज, बेचैन करने वाले और नग्न यथार्थ का प्रामाणिक दस्तावेज़ पढ़ने के लिए एन. सिंह की पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का अध्ययन हर उस विवेकशील व्यक्ति के लिए अनिवार्य है जो सच से आँखें चुराने का आदी नहीं है।
समाज वही छिपाता है, जो उसे सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहाँ सच को पूरा बोलना सबसे बड़ा अपराध है। यहाँ आधा सच सुरक्षित है, पूरा सच खतरनाक।