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किसान कौन? — हल चलाने वाला, बटाईदार या एसी कमरे में बैठा कागज़ी मालिक?

एन. सिंह · ·5 मिनट

मान लीजिए दो व्यक्ति हैं।

पहला व्यक्ति दिल्ली, मुंबई या लखनऊ के किसी पॉश इलाके में एयर-कंडीशंड फ्लैट में रहता है। वह किसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता है या बड़ा कारोबारी है। उसके नाम पर गाँव में 15 बीघे पुश्तैनी ज़मीन दर्ज है, जिस पर उसने पिछले 20 सालों से पैर भी नहीं रखा।

दूसरा व्यक्ति उसी गाँव की मिट्टी में तपता है। सुबह चार बजे उठता है, कड़ाके की ठंड में नंगे पैर खेत की सिंचाई करता है, खाद की बोरी कंधे पर ढोता है, और जब फसल कटती है तो आधे दाने मालिक को देकर आधे में अपने परिवार का पेट पालता है। उसके अपने नाम पर एक धुर ज़मीन का टुकड़ा भी नहीं है।

अब सरकार जब किसान सम्मान निधि, फसल बीमा का मुआवज़ा या बैंक कर्ज़माफी का ऐलान करती है, तो वह पैसा किसे मिलता है?

वह पैसा पहले व्यक्ति के खाते में जाता है, क्योंकि सरकारी खतौनी में नाम उसका दर्ज है! और वह दूसरा व्यक्ति, जिसने अपनी जवानी खेत को सींचने में खपा दी, उसे किसी सरकारी दफ्तर में ‘किसान’ तक नहीं माना जाता।


कागज़ का मालिक बनाम पसीने का किसान

यही वह कड़वा सवाल है जिसे लेखक एन. सिंह (नथुनी सिंह ‘कोदन्ना’) और विमला सिंह अपनी ज़मीनी शोध-कृति ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के पहले ही अध्याय में पूरी बेबाकी से उठाते हैं।

भारत का सबसे बड़ा नीतिगत पाखंड यह है कि आज़ादी के 78 साल बाद भी हमारे पास यह तय करने का ईमानदार पैमाना नहीं है कि ‘किसान कौन है?’

सरकारी तंत्र की नज़र में किसान केवल वह है जिसके पास भू-स्वामित्व (Land Ownership) का कानूनी दस्तावेज़ है। लेकिन हकीकत यह है कि भारत के करोड़ों सीमांत, छोटे और भूमिहीन मजदूर वास्तव में ‘बटाईदारी’ (Sharecropping) या पट्टे पर खेती करते हैं। जब बाढ़ आती है या सूखा पड़ता है, तो मेहनत बटाईदार की डूबती है, लागत बटाईदार की बर्बाद होती है, लेकिन सरकारी मुआवज़े का चेक उस गैर-हाजिर ज़मींदार को मिलता है जो शहर में बैठकर शेयर बाज़ार के भाव देख रहा होता है।

इस दोहरी मार ने गाँव के असली उत्पादक को तोड़कर रख दिया है। बैंक उसे कर्ज़ नहीं देते क्योंकि उसके पास ज़मीन के कागज़ नहीं हैं। वह मजबूर होकर गाँव के सूदखोर साहूकार से 3 से 5 रुपये सैकड़ा (36% से 60% सालाना ब्याज) पर कर्ज़ लेता है। और जब फसल बर्बाद होती है, तो फांसी के फंदे पर वही लटकता है।


किताब से कड़वा सच

लेखकद्वय अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ में इस विसंगति का पर्दाफाश करते हुए लिखते हैं:

“भारत में किसान शब्द को एक भावनात्मक आवरण पहना दिया गया है, लेकिन हकीकत में उसकी कानूनी हैसियत अत्यंत दयनीय है। ‘किसान’ शब्द का प्रयोग उन बड़े भू-स्वामियों, ठेकेदारों और गैर-खेतीहर रईसों के लिए भी होता है जिनकी आमदनी का मुख्य स्रोत उद्योग या नौकरी है, पर वे इनकम टैक्स से बचने के लिए अपनी आय को ‘कृषि आय’ दिखाते हैं। दूसरी ओर, जो दिन-रात हल चलाता है, खुरपी और फावड़ा चलाता है, वह बटाईदार, अधियादार या कृषि मजदूर की श्रेणी में फेंक दिया जाता है। इस तरह सरकारी नीतियों का 80 प्रतिशत लाभ उन तक पहुँचता ही नहीं जो वास्तव में खेती करते हैं।”
— ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ (अध्याय 1)

पुस्तक में आगे स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSSO) के आंकड़े खुद गवाही देते हैं कि भारत के 40% से अधिक खेतीहर परिवारों के पास अपनी पर्याप्त ज़मीन नहीं है। वे दूसरों की ज़मीन पर अपनी जान खपाते हैं, लेकिन संकट के समय नीतिगत सुरक्षा से पूरी तरह वंचित रहते हैं।


असली समाधान क्या है?

यदि देश को सचमुच खाद्यान्न सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बचाना है, तो हमें किसान की परिभाषा को ज़मींदारी के चंगुल से आज़ाद कराना होगा:

  1. जुताई के आधार पर किसान का दर्जा: किसान की पहचान खतौनी के कागज़ से नहीं, बल्कि खेत की वास्तविक जुताई (Actual Cultivator Status) से होनी चाहिए। हर राज्य में बटाईदारों और काश्तकारों का पारदर्शी ग्राम पंचायत स्तर पर पंजीकरण हो।
  2. सीधे काश्तकार को मिले बीमा और सब्सिडी: बीज, खाद की सब्सिडी, फसल बीमा का क्लेम और सरकारी राहत राशि सीधे उस व्यक्ति के बैंक खाते में जाए जो उस मौसम में खेत में फसल उगा रहा था।
  3. संस्थागत साख (Institutional Credit) की गारंटी: भूमिहीन काश्तकारों को कम ब्याज पर फसली ऋण देने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) को भू-स्वामित्व से अलग करके ‘फसल अनुबंध’ (Crop Cultivation Agreement) से जोड़ा जाए।
  4. टैक्स चोरी का जरिया न बने किसानी: गैर-कृषि व्यवसाय से अरबों कमाने वाले कॉर्पोरेट और उद्योगपतियों द्वारा खेती के नाम पर दिखाई जाने वाली कर-मुक्त आय की कड़ी निगरानी हो, ताकि खेती का नाम केवल अमीरों की ढाल न बने।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

जब एक सैनिक सीमा पर लड़ता है, तो सम्मान वर्दी पहनने वाले उस जवान को मिलता है जो गोली खाता है, न कि उस ठेकेदार को जिसने वर्दी बनाई थी। फिर खेत में अन्न उगाने वाले मामले में वह मजदूर बेगाना क्यों रह जाता है जो चिलचिलाती धूप में खून-पसीना एक करता है?

क्या आज़ाद भारत की संसद में कभी ऐसा कानून बनेगा जो हल चलाने वाले को उसका वास्तविक स्वाभिमान और अधिकार दिला सके? इस बुनियादी और बेचैन करने वाले सच को समझने के लिए आपको पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का यह पहला अध्याय अवश्य पढ़ना चाहिए।

भारत में किसान की कोई एक स्पष्ट और न्यायसंगत परिभाषा नहीं है। जिसके पास ज़मीन का कागज़ है वह किसान माना जाता है, भले ही उसने ज़िंदगी में कभी खुरपी न उठाई हो; और जो दिन-रात पसीना बहाकर धरती का सीना चीरता है, वह केवल एक बेज़ुबान मजदूर बनकर रह जाता है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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