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एन. सिंह का क्रांतिकारी फॉर्मूला: आरक्षण केवल सरकारी प्राइमरी स्कूल के बच्चों को ही क्यों मिलना चाहिए?

एन. सिंह · ·6 मिनट

ज़रा अपनी कल्पना में दो बच्चों की सुबह की तस्वीर खींचिए।

पहला बच्चा महानगर के एक अंतरराष्ट्रीय स्कूल में पढ़ता है। घर से स्कूल तक वातानुकूलित बस आती है, क्लासरूम डिजिटल स्मार्ट-बोर्ड और एसी से लैस हैं, सालाना फीस तीन से चार लाख रुपये है, और घर पर अंग्रेजी व गणित पढ़ाने के लिए अलग-अलग महंगे ट्यूटर आते हैं।

अब दूसरे बच्चे को देखिए। वह देहात के किसी सुदूर गाँव के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता है। न पैरों में जूते हैं, न बैठने के लिए डेस्क-बेंच; वह फटे हुए टाट के बोरे पर बैठता है। स्कूल की छत से बरसात में पानी टपकता है, पूरे स्कूल में पांच कक्षाओं को पढ़ाने के लिए केवल एक मास्टर जी हैं जो कभी राशन कार्ड की ड्यूटी में रहते हैं तो कभी चुनाव सर्वे में।

अब सोलह वर्ष बाद जब दोनों बच्चे नीट (NEET), जेईई (JEE) या सिविल सेवा की परीक्षा में बैठते हैं, तो हमारा सिस्टम क्या करता है? हमारा सिस्टम उन दोनों की पृष्ठभूमि, संसाधनों और अवसरों की असमानता को पूरी तरह अनदेखा कर देता है और केवल उनका ‘जाति प्रमाण-पत्र’ देखता है!

यदि उस महंगे एसी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे के पास किसी आरक्षित वर्ग का प्रमाण-पत्र है, तो उसे कम अंकों पर भी दाखिला मिल जाएगा; और यदि उस टाट-पट्टी पर बैठने वाले गरीब किसान के बेटे के पास सामान्य वर्ग का ठप्पा है, तो वह 95% लाकर भी बाहर फेंक दिया जाएगा!

क्या इसे आप किसी भी परिभाषा में ‘सामाजिक न्याय’ कह सकते हैं?


एन. सिंह का क्रांतिकारी फॉर्मूला: स्कूल की चौखट बने आरक्षण का आधार

लेखक एन. सिंह अपनी चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ में इस विसंगति को जड़ से समाप्त करने के लिए एक ऐसा क्रांतिकारी और अचूक फॉर्मूला प्रस्तुत करते हैं, जो भारत की शिक्षा व्यवस्था और आरक्षण प्रणाली दोनों का कायाकल्प कर सकता है।

वे प्रस्ताव रखते हैं:

“आरक्षण का वास्तविक और एकमात्र हकदार वह छात्र होना चाहिए, जिसने अपनी पहली से बारहवीं कक्षा तक की पूरी स्कूली शिक्षा राज्य सरकार के सामान्य सरकारी प्राइमरी और इंटर कॉलेजों में टाट-पट्टी पर बैठकर पूरी की हो!”

इस एक क्रांतिकारी नियम के लागू होते ही समाज में निम्नलिखित तीन युगांतकारी परिवर्तन आएंगे:

  1. अमीर-गरीब की असमानता पर सीधा प्रहार: चाहे वह किसी भी जाति का हो—यदि उसके माता-पिता के पास महंगे निजी स्कूल की फीस भरने की क्षमता थी, तो इसका सीधा अर्थ है कि वह सामाजिक और आर्थिक रूप से सक्षम है। उसे सामान्य मेरिट में मुकाबला करना चाहिए।
  2. असली शोषितों तक सीधा लाभ: गाँव के भूमिहीन, मजदूर, कुम्हार, बुनकर और छोटे किसान के बच्चों को किसी कोचिंग या सिफारिश की जरूरत नहीं पड़ेगी; सरकारी स्कूल में पढ़ने के कारण उन्हें स्वतः ही उच्च शिक्षा और नौकरियों में प्राथमिकता मिलेगी।
  3. सरकारी स्कूलों की रातों-रात कायापलट: जब नेताओं, नौकरशाहों और जजों को यह पता चलेगा कि उनके बच्चों को भी आरक्षण का लाभ तभी मिल सकता है जब वे सरकारी प्राइमरी स्कूल में पढ़ें, तो वे तुरंत अपने बजट से सरकारी स्कूलों को विश्वस्तरीय बनाएंगे!

वर्तमान व्यवस्था बनाम एन. सिंह का स्कूल-आधारित फॉर्मूला

पैमाना वर्तमान जाति-आधारित व्यवस्था एन. सिंह का सरकारी स्कूल फॉर्मूला
पात्रता की कसौटी जन्म प्रमाण-पत्र और माता-पिता की जाति छात्र द्वारा प्राप्त वास्तविक स्कूली शिक्षा का माध्यम
संसाधनों का न्याय संपन्न आरक्षित छात्र गरीब सामान्य व गरीब आरक्षित दोनों की सीट ले जाता है केवल वही छात्र लाभ पाएगा जिसे वास्तव में बुनियादी संसाधनों का अभाव था
सरकारी स्कूलों की स्थिति नेता और अफसर अपने बच्चे निजी में भेजते हैं, सरकारी स्कूल लावारिस हैं सभी रसूखदार लोग सरकारी स्कूलों को सुधारने के लिए बाध्य होंगे
सामाजिक समरसता जातियों के बीच स्थायी नफ़रत, कोर्ट केस और मेरिट की अनदेखी वर्ग-संघर्ष समाप्त, वास्तविक योग्यता और समान अवसर की स्थापना

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का खुला आह्वान

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय ‘शिक्षा और अवसर की समता’ में लिखते हैं:

“जब तक आरक्षण की बुनियाद जन्म के प्रमाण-पत्र के बजाय स्कूल की चौखट पर तय नहीं होगी, तब तक न तो अमीर और गरीब की खाई पटेगी, और न ही सरकारी प्राइमरी स्कूलों की दुर्दशा कभी सुधरेगी। आज का आरक्षण संपन्न दलित और संपन्न पिछड़े को और संपन्न बना रहा है, जबकि गरीब सवर्ण और गरीब दलित दोनों को समान रूप से गर्त में धकेल रहा है। शिक्षा की पहली सीढ़ी पर विषमता का बीज बोकर आप छत पर जाकर समानता की फसल नहीं काट सकते। यदि राज्य वास्तव में ईमानदार है, तो वह एक कानून बनाए कि सरकारी नौकरी में 80% पद केवल उन बच्चों के लिए आरक्षित होंगे जो सरकारी स्कूलों से पढ़कर निकले हैं!”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 112-113)

लेखक आगे शासन की नीति पर प्रहार करते हैं:

“अगर सुप्रीम कोर्ट और सरकारें वास्तव में ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर करना चाहती हैं, तो उन्हें आय के फर्जी प्रमाण पत्रों की जांच करने की जरूरत नहीं है; केवल छात्र की स्कूल टीसी (Transfer Certificate) देख लें! जिस बच्चे ने 5,000 रुपये महीने की फीस वाले स्कूल में बारह साल बिताए हों, वह किसी भी कोण से पिछड़ा नहीं है!”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 116)


इस फॉर्मूले को लागू करने का चार-चरणीय ब्लूप्रिंट

  1. सरकारी स्कूल स्नातक कोटा (Government School Quota): तमिलनाडु सरकार द्वारा सरकारी स्कूल के छात्रों को मेडिकल में दिए गए 7.5% क्षैतिज आरक्षण की तर्ज पर इसे पूरे देश में केंद्रीय विश्वविद्यालयों और नौकरियों में अनिवार्य बनाया जाए।
  2. समान स्कूल प्रणाली (Common School System): कोठारी आयोग (1966) की सिफारिश को लागू करते हुए पड़ोस के स्कूल (Neighbourhood Schools) की अवधारणा को पुनर्जीवित किया जाए जहाँ एक डीएम का बेटा और एक सफाईकर्मी का बेटा एक ही बेंच पर बैठें।
  3. नेताओं और अफसरों के लिए कानूनी अनिवार्यता: जनप्रतिनिधियों और ‘क’ वर्ग के अधिकारियों के लिए अनिवार्य शर्त हो कि उनके बच्चे केवल सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में ही प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करेंगे।
  4. प्राथमिक बजट का तिगुना विस्तार: प्राथमिक शिक्षा पर बजट व्यय जीडीपी का न्यूनतम 4% किया जाए ताकि हर प्राइमरी स्कूल में कंप्यूटर लैब, खेल का मैदान और प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध हों।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या देश का भविष्य केवल जाति के प्रमाण-पत्रों की सौदेबाजी से सुधरेगा, या फिर गाँव की उस अंतिम टाट-पट्टी पर बैठे बच्चे को दुनिया की सबसे बेहतरीन शिक्षा देने से सुधरेगा?

आरक्षण के इस सबसे क्रांतिकारी और न्यायपूर्ण समाधान की विस्तृत रूपरेखा को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का यह अध्याय हर शिक्षक, छात्र और माता-पिता को पढ़ना चाहिए।

जब तक आरक्षण की बुनियाद जन्म के प्रमाण-पत्र के बजाय स्कूल की चौखट पर तय नहीं होगी, तब तक न तो अमीर और गरीब की खाई पटेगी, और न ही सरकारी प्राइमरी स्कूलों की दुर्दशा कभी सुधरेगी।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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