गाँव की शिक्षा पद्धति — जो डिग्रियां तो देती है, पर किसानी से नफ़रत सिखाती है
एन. सिंह · ·3 मिनट
ज़रा गाँव के किसी प्राथमिक या इंटर कॉलेज की किताबों को खोलकर देखिए।
उसमें पढ़ाया जाता है: “राम एक अच्छा लड़का है, वह पढ़-लिखकर शहर में अफ़सर बन गया। श्याम पढ़ाई नहीं करता था, इसलिए वह गाँव में रहकर किसानी करने लगा!”
बचपन की पहली कक्षा से ही बच्चे के अवचेतन मन में यह ज़हर भर दिया जाता है कि किसानी करना किसी नाकाम, पिछड़े और अनपढ़ आदमी की नियति है! जो पढ़-लिख जाएगा, वह कोट-पैंट पहनकर शहर भागेगा; और जो नाकारा होगा, वही खेत में खुरपी चलाएगा।
नतीजा क्या हुआ?
गाँव का बच्चा बीए, एमए, बीएड या बीटेक की डिग्री ले लेता है। लेकिन उस डिग्री के बाद न तो उसे शहर में कोई ढंग की नौकरी मिलती है, और न ही वह गाँव आकर अपने पिता के साथ हल चलाने लायक बचता है। उसे खेत में जाने में शर्म महसूस होती है।
वह 25 साल की उम्र में एक ऐसा ‘त्रिशंकु’ बन जाता है जो न खेत का रहा, न दफ्तर का!
शिक्षा और श्रम का विभाजन: मैकाले की स्थायी गुलामी
अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के बारहवें और अंतिम अध्याय (उपसंहार) में लेखकद्वय एन. सिंह और विमला सिंह भारतीय शिक्षा पद्धति और कृषि के इस घातक अलगाव पर जोरदार प्रहार करते हैं।
वे याद दिलाते हैं कि लॉर्ड मैकाले ने 1835 में भारत में जो अंग्रेज़ी शिक्षा व्यवस्था लागू की थी, उसका स्पष्ट उद्देश्य ऐसे ‘काले अंग्रेज़’ पैदा करना था जो रंग-रूप में भारतीय हों लेकिन सोच और पसंद में अंग्रेज़ हों। उनका काम केवल फाइलों पर दस्तखत करना और बाबूगिरी करना था।
आज़ादी के 78 साल बाद भी हमने उस शिक्षा नीति की मूल आत्मा को नहीं बदला।
- हमने स्कूली पाठ्यक्रम में कभी यह नहीं सिखाया कि बीज कैसे बोया जाता है, मिट्टी की सेहत कैसे परखी जाती है, या पौधों की कलम कैसे बांधी जाती है।
- हमने बच्चे को शेक्सपियर और न्यूटन तो रटा दिए, लेकिन उसे यह नहीं सिखाया कि जिस गेहूं की रोटी वह खाता है, वह कितने महीनों की धूप और पसीने से पकती है।
किताब से कड़वा सच
“यदि शिक्षा मनुष्य को अपने भोजन के उत्पादन से काट दे, यदि शिक्षा शारीरिक श्रम को हेय और निकृष्ट मानना सिखाए, तो वह समाज बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सकता। आज का पढ़ा-लिखा ग्रामीण युवक डिग्री का बोझ ढो रहा है, लेकिन उसके पास कोई वास्तविक उत्पादक हुनर (Productive Skill) नहीं है। जब तक कृषि विज्ञान, पर्यावरण और ग्राम-शिल्प को कक्षा 1 से लेकर विश्वविद्यालय तक अनिवार्य व्यावहारिक विषय नहीं बनाया जाएगा, तब तक शिक्षा केवल बेरोज़गारों की भीड़ पैदा करती रहेगी।”
— ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ (अध्याय 12 व उपसंहार)
असली समाधान क्या है?
- कृषि और पर्यावरण की अनिवार्य स्कूली शिक्षा: हर ग्रामीण स्कूल के पास आधा एकड़ का प्रायोगिक खेत (School Farm) हो, जहाँ हर छात्र के लिए सप्ताह में कम से कम 4 घंटे मिट्टी का काम और बागवानी करना अनिवार्य हो।
- श्रम की प्रतिष्ठा (Dignity of Labour): समाज में यह चेतना फैलाई जाए कि खेत में पसीना बहाने वाला किसान किसी एयर-कंडीशंड दफ्तर में बैठने वाले मैनेजर से कम सम्मानित नहीं है।
- एग्रो-एंटरप्रेन्योरशिप (Agri-Business) का प्रशिक्षण: ग्रामीण युवाओं को बीए-एमए की बेमतलब डिग्रियों के बजाय आधुनिक पॉलीहाउस फार्मिंग, फूड प्रोसेसिंग, डेयरी टेक्नोलॉजी और डिजिटल मार्केटिंग का व्यावहारिक डिप्लोमा दिया जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
जिस दिन इस देश का युवा गर्व से यह कहने लगेगा कि “हाँ, मैं एक शिक्षित और आधुनिक किसान हूँ!”—क्या उसी दिन भारत की वास्तविक आज़ादी और आत्मनिर्भरता का उदय नहीं होगा?
इस पुस्तक का समापन एक गहरी आशा और राष्ट्रीय आह्वान के साथ होता है। इस पूरे वैचारिक विमर्श को विस्तार से समझने के लिए आपको पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का यह अंतिम अध्याय अवश्य पढ़ना चाहिए।
हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली का एक ही अघोषित लक्ष्य है—गाँव के बच्चे को इस लायक बनाना कि वह गाँव छोड़कर भाग जाए। जो शिक्षा अपने भोजन और मिट्टी से प्रेम करना न सिखाए, वह शिक्षा नहीं बल्कि सांस्कृतिक विनाश का औज़ार है।