क्या विकास के नाम पर भारत का किसान बिकाऊ है? एक्सप्रेसवे, एसईज़ेड और छीनी जाती ज़मीनें
एन. सिंह · ·3 मिनट
हाल के वर्षों में आपने देखा होगा कि देश भर में नए-नए एक्सप्रेसवे, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, डिफेंस कॉरिडोर और स्मार्ट सिटीज का जाल बिछाया जा रहा है।
अखबारों में विज्ञापन छपते हैं—“अब दिल्ली से बनारस सिर्फ 8 घंटे में!” या “लखनऊ से गाजीपुर 4 घंटे में!”
इन विज्ञापनों को देखकर शहर का मध्यम वर्ग ताली बजाता है। लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा कि इन एक्सप्रेसवे के नीचे किसकी ज़मीन दफन हुई है?
वे ज़मीनें किसी बंजर रेगिस्तान की नहीं थीं। वे गंगा, यमुना, घाघरा, चंबल और गोमती के दोआब की वह उपजाऊ मिट्टी थी, जहाँ साल में तीन-तीन फसलें लहलहाती थीं—गेहूं, धान, गन्ना, सब्जियां और दालें!
मुआवज़े का मायाजाल और किसान का भ्रम
अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के छठे अध्याय में लेखक एन. सिंह और विमला सिंह ‘भू-अधिग्रहण’ के इस क्रूर खेल की ज़मीनी पड़ताल करते हैं।
जब सरकार ज़मीन का अधिग्रहण करती है, तो किसान को सर्किल रेट से चार गुना या कुछ लाख रुपये प्रति बीघा का मुआवज़ा थमा दिया जाता है। अचानक खाते में 20 या 50 लाख रुपये देखकर किसान का परिवार चौंधिया जाता है।
वे एक नई गाड़ी खरीद लेते हैं, पक्का मकान बना लेते हैं, बेटी की शादी में पानी की तरह पैसा बहा देते हैं।
लेकिन फिर क्या होता है?
पाँच साल बीतते-बीतते बैंक का खाता खाली हो जाता है। गाड़ी पुरानी होकर कबाड़ हो जाती है। घर का खर्च चलाने के लिए कोई नियमित आमदनी नहीं बचती। और सबसे भयानक सच यह होता है कि अब उनके पास वह खेत भी नहीं बचा होता, जिससे हर साल गेहूं की बोरी और दाल घर आती थी!
वही किसान, जो कल तक 10 बीघे का मालिक था, अब उसी एक्सप्रेसवे के किनारे चाय की गुमटी लगाने या टोल प्लाज़ा पर 8000 रुपये महीने की गार्ड की नौकरी करने के लिए हाथ जोड़ने लगता है!
किताब से कड़वा सच
“ज़मीन कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे एक बार बेचकर आप दोबारा बाज़ार से खरीद लें। उपजाऊ कृषि भूमि सीमित है, उसे फैक्ट्रियों में नहीं बनाया जा सकता। जब सरकारें बिल्डरों और कॉरपोरेट घरानों के लिए किसानों से कौड़ियों के भाव ज़मीन छीनती हैं और वही ज़मीन बाद में 100 गुना मुनाफे पर प्लॉटिंग करके बेची जाती है, तो यह विकास नहीं, बल्कि राज्य प्रायोजित डकैती है। किसान बिकाऊ नहीं है, उसे व्यवस्था की नीतियों द्वारा पहले कंगाल बनाया जाता है और फिर उसकी मजबूरी का सौदा किया जाता है।”
— ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ (अध्याय 6)
असली समाधान क्या है?
- बहु-फसली उपजाऊ ज़मीन के अधिग्रहण पर पूर्ण प्रतिबंध: विकास परियोजनाओं के लिए केवल बंजर, अनुपयोगी या कम उपजाऊ ज़मीनों का ही उपयोग हो। अन्न पैदा करने वाली मिट्टी पर कंक्रीट डालना राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के साथ अपराध है।
- ज़मीन अधिग्रहण के बदले स्थायी हिस्सेदारी: यदि किसी परियोजना के लिए ज़मीन लेना अपरिहार्य हो, तो एकमुश्त मुआवज़े के बजाय किसान को उस परियोजना में आजीवन लाभांश (Equity/Royalty Share) मिले।
- भूमिहीन मजदूरों का पुनर्वास: ज़मीन जाने पर केवल ज़मींदार को मुआवज़ा न मिले, बल्कि उस खेत पर निर्भर रहने वाले बटाईदार और खेतिहर मजदूरों के पुनर्वास और रोज़गार की कानूनी गारंटी हो।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
अगर देश की सारी उपजाऊ ज़मीनों पर कंक्रीट के जंगल और हाईवे ही बन जाएंगे, तो 140 करोड़ लोग खाएंगे क्या? क्या डॉलर, सीमेंट और चिप्स खाकर कोई देश ज़िंदा रह सकता है?
इस गंभीर चेतावनी को समझने के लिए पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का छठा अध्याय हर नागरिक को पढ़ना चाहिए।
मुआवज़े के कुछ लाख रुपयों की गड्डी देकर किसान को ज़मीन से बेदखल कर देना विकास नहीं, बल्कि उसकी जड़ों को काटकर उसे सड़क पर फेंकना है। पैसा कुछ सालों में खर्च हो जाता है, लेकिन ज़मीन पीढ़ियों तक रोटी देती है।