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एक साहसिक विचार: चुनाव लड़ने के लिए सेना में 5 साल की सेवा अनिवार्य क्यों हो?

एन. सिंह · ·6 मिनट

ज़रा भारत के संसद भवन और देश के किसी अग्रिम सैन्य मोर्चे (जैसे सियाचिन ग्लेशियर या लद्दाख की गलवान घाटी) की दो तस्वीरों की एक साथ तुलना कीजिए।

पहली तस्वीर में एक 19-20 साल का जवान है। वह किसी गरीब किसान या मजदूर का बेटा है। माइनस चालीस डिग्री तापमान में, बर्फ की बर्फीली आंधियों के बीच, छाती पर तीस किलो का गोला-बारूद लादे वह देश की सीमा पर खड़ा है। उसके पास न कोई आलीशान बंगला है, न कोई विशेषाधिकार; उसे महीने में मात्र 35 से 40 हजार रुपये मिलते हैं। वह जानता है कि अगले ही पल दुश्मन की कोई स्नाइपर गोली उसकी छाती के पार हो सकती है, लेकिन वह ‘भारत माता की जय’ बोलकर मुस्कुराते हुए डटा रहता है।

अब दूसरी तस्वीर देखिए। संसद और विधानसभाओं के एसी कमरों में बैठे नेताजी हैं। महंगे रेशमी कुर्ते, आगे-पीछे पुलिस की दर्जनों एस्कॉर्ट गाड़ियां, मुफ्त हवाई यात्रा, मुफ्त इलाज, और करोड़ों की संपत्तियां! इनमें से अधिकांश नेताओं ने अपने पूरे जीवन में कभी धूप में एक घंटा काम नहीं किया, कभी अपने हाथ में कोई फावड़ा या राइफल नहीं पकड़ी, और न ही कभी युद्ध के मैदान में गोली चलने की सनसनाहट सुनी है।

लेकिन युद्ध करने, शांति समझौते करने, देश के बजट को बांटने और सैनिकों के जीवन का फैसला करने की पूरी शक्ति इन्हीं नेताओं के हाथों में होती है!

एन. सिंह अपनी विचारोत्तेजक पुस्तक ‘अनोखा भारत’ में एक ऐसा क्रांतिकारी और झकझोर देने वाला विचार प्रस्तुत करते हैं, जो भारतीय राजनीति की पूरी दिशा और दशा बदल सकता है: क्या देश में ऐसा कानून नहीं होना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति को सांसद, विधायक या मंत्री का चुनाव लड़ने की अनुमति तभी मिले, जब उसने देश की सेना, अर्धसैनिक बलों या सीमा सुरक्षा में न्यूनतम 5 वर्ष की कठिन सेवा ईमानदारी से पूरी की हो?


इस क्रांतिकारी शर्त की दार्शनिक और व्यावहारिक आवश्यकता

यह विचार कोई हवाई कल्पना नहीं है; इज़राइल, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और प्राचीन स्पार्टा जैसे देशों में राष्ट्रीय सेवा प्रत्येक नागरिक और नेता के लिए अनिवार्य रही है।

यदि भारत में चुनाव लड़ने के लिए 5 साल की सैन्य सेवा अनिवार्य कर दी जाए, तो राजनीति में निम्नलिखित चमत्कारिक सुधार होंगे:

  1. अपराधियों, माफियाओं और दलालों का पूर्ण सफाया: आज संसद और विधानसभाओं के 40% से अधिक सदस्यों पर हत्या, अपहरण, रंगदारी और घपलों के गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। यदि सेना में 5 साल की कठोर अनुशासनिक ट्रेनिंग अनिवार्य हो जाएगी, तो कोई भी अपराधी और गुंडा राजनीति में कदम रखने की हिम्मत ही नहीं कर पाएगा!
  2. जातिवाद और सांप्रदायिकता का अंत: सेना की किसी रेजिमेंट या बैरक में कोई जाति या धर्म नहीं होता। वहाँ एक ही थाली में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, ब्राह्मण और दलित साथ बैठकर खाना खाते हैं और एक-दूसरे के लिए जान देते हैं। जो युवा 5 साल सेना में रहकर आएगा, वह कभी चुनाव जीतने के लिए जाति या धर्म के नाम पर दंगे नहीं भड़काएगा!
  3. सैनिक और किसान के दर्द की सच्ची अनुभूति: जब नेता खुद बंकरों में रहेगा, सी-राशन खाएगा, और गश्त लगाएगा, तब उसे समझ आएगा कि देश की असली सुरक्षा भाषणबाजी से नहीं, बल्कि त्याग और पसीने से होती है।

वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व बनाम सैन्य-प्रशिक्षित नेतृत्व

कसौटी वर्तमान पारंपरिक नेता सेना में 5 साल सेवा कर चुका नेता
अनुशासन और चरित्र स्वार्थ, दलबदल, अवसरवादिता और अहंकार कठोर अनुशासन, समयबद्धता, ईमानदारी और टीम-भावना
राष्ट्रहित की प्राथमिकता केवल अपनी कुर्सी, पार्टी फंड और अगला चुनाव जीतना “राष्ट्र सर्वोपरि, स्वयं अंतिम” (Nation First, Self Last)
सामाजिक दृष्टिकोण जातियों और धर्मों के बीच नफ़रत फैलाकर वोट बटोरना सर्वधर्म समभाव और अखंड भारतीय बंधुत्व की भावना
संसाधनों की सुरक्षा सरकारी खजाने और जमीनों की बंदरबांट और घूसखोरी देश के एक-एक इंच क्षेत्र और पाई-पाई बजट की रक्षा

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का खुला प्रस्ताव

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय ‘राजनीति में शुचिता और सेना’ में लिखते हैं:

“जब तक देश के नीति-निर्माता सीमा के माइनस चालीस डिग्री तापमान में खड़े होकर एक रात पहरा नहीं देंगे, तब तक उन्हें न तो राष्ट्र की कीमत समझ आएगी और न ही सैनिक और किसान के पसीने का मोल। आज हमारी राजनीति में वे लोग भरे पड़े हैं जो राष्ट्रवाद का सबसे ऊँचा भाषण देते हैं, लेकिन जब देश पर संकट आता है तो अपनी संतानों को लंदन और अमेरिका भगा देते हैं! यदि आप सचमुच इस देश पर शासन करना चाहते हैं, यदि आप भारत के भाग्यविधाता बनना चाहते हैं, तो पहले पाँच साल देश की सरहदों पर बंदूक तानकर खड़े रहिए! यदि आप देश के लिए पाँच साल पसीना नहीं बहा सकते, तो आपको इस देश पर हुकूमत करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 122-123)

लेखक आगे चुनौती देते हैं:

“यह एक शर्त भारत की राजनीति से उन तमाम सफेदपोश लुटेरों, ठेकेदारों और वंशवादी राजकुमारों को बाहर फेंक देगी जो बिना किसी योग्यता के केवल पिता की गद्दी पर बैठकर देश को लूट रहे हैं।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 126)


इस प्रस्ताव का नीतिगत ढांचा (Implementation Framework)

  1. संविधान के अनुच्छेद 84 और 173 में संशोधन: संसद और विधानसभा की सदस्यता के लिए न्यूनतम योग्यताओं में “कम से कम 5 वर्ष की नियमित सैन्य/अर्धसैनिक या सीमांत नागरिक सुरक्षा सेवा” को अनिवार्य अहर्ता के रूप में जोड़ा जाए।
  2. विशेष राष्ट्रीय नेतृत्व कोर (National Leadership Corps): जो युवा राजनीति और सार्वजनिक नीति में आना चाहते हैं, उनके लिए सेना के तहत एक विशेष 5-वर्षीय कोर बनाई जाए जहाँ उन्हें रक्षा, आपदा प्रबंधन, ग्रामीण विकास और सीमांत सुरक्षा का कठोर प्रशिक्षण मिले।
  3. महिलाओं और दिव्यांगों के लिए समान अवसर: जो नागरिक शारीरिक कारणों से अग्रिम मोर्चे पर नहीं जा सकते, उनके लिए साइबर सुरक्षा, सैन्य चिकित्सा, लॉजिस्टिक्स और सीमांत शिक्षा में 5 वर्ष की सेवा का विकल्प हो।
  4. नेताओं के बच्चों के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा: सभी मौजूदा सांसदों, विधायकों और उच्च नौकरशाहों के बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों या राजनीति में आने से पहले यह सेवा पूरी तरह अनिवार्य की जाए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या आप चाहते हैं कि देश की बागडोर उन लोगों के हाथों में रहे जो केवल एसी कमरों में बैठकर राष्ट्रवाद बेचते हैं, या उनके हाथों में जिन्होंने देश की मिट्टी के लिए अपना पसीना और खून बहाया है?

भारतीय लोकतंत्र के इस सबसे साहसिक और क्रांतिकारी विज़न को गहराई से समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह अध्याय हर युवा और देशभक्त को पढ़ना चाहिए।

जब तक देश के नीति-निर्माता सीमा के माइनस चालीस डिग्री तापमान में खड़े होकर एक रात पहरा नहीं देंगे, तब तक उन्हें न तो राष्ट्र की कीमत समझ आएगी और न ही सैनिक और किसान के पसीने का मोल।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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