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'क्रीमी लेयर' और ड्रैगन के दांत — जब अपनों का हक अपने ही छीन लें

एन. सिंह · ·6 मिनट

गाँव-देहात में एक बहुत पुरानी और व्यावहारिक कहावत है: जब दूध को कड़ाही में रखकर मंदी आंच पर पकाया जाता है, तो सारा गाढ़ा मक्खन और मलाई ऊपर की सतह पर तैरने लगती है। यदि घर की कोई एक चालाक बिल्ली आकर सारी मलाई चट कर जाए, तो नीचे केवल पतला मट्ठा रह जाता है जो किसी का पेट नहीं भर सकता।

भारतीय समाज में आरक्षण की व्यवस्था के साथ पिछले पचास वर्षों में ठीक यही खेल हुआ है।

न्यायपालिका और समाजशास्त्र की भाषा में इसे ‘क्रीमी लेयर’ (Creamy Layer) अर्थात् मलाईदार परत कहा जाता है। 1992 में सर्वोच्च न्यायालय की ऐतिहासिक नौ जजों की संविधान पीठ ने ‘इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ’ मामले में अत्यंत स्पष्ट शब्दों में यह निर्देश दिया था कि आरक्षण का लाभ केवल सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को मिलना चाहिए। जो लोग संपन्न, उच्च पदस्थ और साधन-सम्पन्न हो चुके हैं, उन्हें इस मलाई से बाहर निकाला जाना चाहिए ताकि वास्तविक जरूरतमंद तक लाभ पहुँच सके।

परंतु आज हमारे देश की कड़वी ज़मीनी सच्चाई क्या है? आज आरक्षित वर्गों के भीतर का ही एक शक्तिशाली, संपन्न और कुलीन वर्ग (Elite Class) अपने ही गरीब भाइयों के हक पर ड्रैगन की तरह कुंडली मारकर बैठ गया है!


ड्रैगन के दांत: कैसे अपनों ने ही अपनों को लूटा?

यूनानी पौराणिक कथाओं में ‘ड्रैगन के दांत’ (Dragon’s Teeth) का एक रूपक आता है—जब उन दांतों को ज़मीन में बोया जाता है, तो ज़मीन से हथियारबंद योद्धा निकलकर आपस में ही खूनी संघर्ष करने लगते हैं।

आज आरक्षण की राजनीति ने भारतीय समाज में ठीक यही स्थिति पैदा कर दी है:

  1. तीन पीढ़ियों का विशेषाधिकार: एक परिवार जिसके दादाजी ने आरक्षण के बल पर सरकारी नौकरी पाई, पिताजी आईएएस या आईपीएस बन गए, आलीशान बंगलों में रहे, बच्चों ने लाखों की फीस वाले इंटरनेशनल स्कूलों में पढ़ाई की—वही बच्चे आज भी आरक्षण का प्रमाण-पत्र लगाकर एम्स और आईआईटी में उस गरीब ग्रामीण बच्चे की सीट छीन लेते हैं जिसके पिता आज भी सिर पर मैला ढोने या खेत में मजदूरी करने पर मजबूर हैं!
  2. राजनीतिक दोगलापन: जब भी क्रीमी लेयर की सीमा को वैज्ञानिक बनाने या इसे अनुसूचित जातियों/जनजातियों (SC/ST) में भी लागू करने की बात आती है (जैसा कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने 2024 में कहा), तो सबसे पहले विरोध कौन करता है? संसद में बैठे आरक्षित वर्गों के करोड़पति सांसद और आइएएस-आईपीएस लॉबी! वे गरीब दलितों और आदिवासियों को ढाल बनाकर आगे कर देते हैं ताकि उनकी अपनी संतानों का विशेषाधिकार सुरक्षित रहे।
  3. गाँव के अंतिम व्यक्ति तक शून्य लाभ: राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के आंकड़े गवाही देते हैं कि आरक्षित श्रेणी के कुल पदों का 70 से 80 प्रतिशत लाभ केवल कुछ गिनी-चुनी प्रभुत्वशाली उपजातियों और शहरी संपन्न परिवारों तक सीमित होकर रह गया है। सुदूर जंगलों में रहने वाले वनवासी और देहात के भूमिहीन मजदूर के बच्चे के पास न तो कोचिंग की फीस है, न ही अंग्रेजी का ज्ञान; वह पहली ही दौड़ में बाहर हो जाता है।

संपन्न आरक्षित बनाम विपन्न आरक्षित: एक भयावह खाई

तुलनात्मक बिंदु क्रीमी लेयर (संपन्न अभिजात्य वर्ग) नॉन-क्रीमी लेयर (वास्तविक शोषित वर्ग)
पारिवारिक पृष्ठभूमि माता-पिता क्लास-वन अधिकारी, डॉक्टर, नेता या बड़े कारोबारी माता-पिता भूमिहीन खेतिहर मजदूर, दिहाड़ी कामगार या रिक्शा चालक
स्कूली शिक्षा महानगरों के महंगे एसी कॉन्वेंट स्कूल, डिजिटल टैबलेट, विदेशी ट्यूटर गाँव का जर्जर प्राथमिक विद्यालय, जहाँ अक्सर शिक्षक अनुपस्थित रहते हैं
प्रतियोगी तैयारी कोटा, दिल्ली या बेंगलुरु के 3-4 लाख रुपये सालाना वाले कोचिंग संस्थान खुद खेतों में काम करके पुरानी फटी किताबें पढ़ने की मजबूरी
आरक्षण का वास्तविक उपयोग उच्च पदों, विदेशों में फेलोशिप और प्रमोशन में एकाधिकार प्रमाण पत्र बनवाने के लिए तहसील के दलालों को घूस देने की बेबसी

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का निर्मम विश्लेषण

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय ‘क्रीमी लेयर और ड्रैगन के दांत’ में लिखते हैं:

“आरक्षण का सबसे क्रूर और अनकहा सच यह है कि शोषितों के नाम पर मिली मलाई को शोषितों के ही कुलीन वर्ग ने हड़प लिया है। गाँव का गरीब मजदूर आज भी वहीं है, और उसके नाम पर उसके सजातीय बाबू के बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं। यह सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के नाम पर अपने ही भाइयों के साथ किया गया विश्वासघात है। जब तक आरक्षण की व्यवस्था में से इस मलाईदार परत को काटकर अलग नहीं किया जाएगा, तब तक पंक्ति के अंतिम व्यक्ति का उत्थान केवल कागजों और भाषणों की शोभा बना रहेगा।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 94-95)

लेखक आगे एक बहुत मार्मिक और चुभता हुआ प्रश्न उठाते हैं:

“अगर एक सामान्य वर्ग का गरीब बच्चा आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई नहीं कर पाता, तो उसे देखकर हर किसी को दुख होता है। लेकिन क्या किसी को उस आरक्षित वर्ग के गरीब बच्चे का दर्द दिखाई देता है जिसकी सीट उसी की जाति के किसी करोड़पति अफसर के बेटे ने छीन ली? शोषितों का सबसे बड़ा शोषक जब उनका अपना ही सगा बन जाए, तो फिर न्याय की गुहार किससे लगाई जाए?”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 98)


क्रीमी लेयर के न्यायसंगत नियमन हेतु चार उपाय

  1. ‘एक परिवार, एक पीढ़ी’ का कठोर नियम: यदि किसी परिवार में माता-पिता में से किसी एक ने भी क्लास-1 या क्लास-2 सरकारी नौकरी का लाभ ले लिया है, तो उनकी संतानों को स्वतः ही आरक्षण के दायरे से बाहर कर सामान्य श्रेणी में गिना जाना चाहिए।
  2. एससी और एसटी में भी क्रीमी लेयर का तार्किक क्रियान्वयन: सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों के अनुसार, अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के भीतर भी जो परिवार उच्च आर्थिक स्तर पर पहुंच चुके हैं, उन्हें बाहर कर अति-वंचित मुसहर, वाल्मीकि और कोरकू जैसी जातियों को प्राथमिक आरक्षण दिया जाए।
  3. आय प्रमाण पत्र की डिजिटल निगरानी: आज 8 लाख रुपये की क्रीमी लेयर सीमा का खुला दुरुपयोग होता है। करोड़पति व्यापारी भी अपनी आय 2 लाख दिखाकर फर्जी प्रमाण-पत्र बनवा लेते हैं। इसे आयकर रिटर्न (ITR) और जीएसटी से सीधे लिंक किया जाए।
  4. अंतिम पायदान के बच्चों के लिए विशेष कोचिंग व छात्रवृत्ति: जो धन क्रीमी लेयर के संपन्न बच्चों को सब्सिडी देने में खर्च होता है, उस पूरे बजट को केवल ग्रामीण भूमिहीन परिवारों के मेधावी बच्चों के लिए आवासीय विद्यालयों और मुफ्त कोचिंग में लगाया जाए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या सामाजिक न्याय का अर्थ यह है कि एक ही जाति के कुछ सौ परिवार पीढ़ियों तक मलाई खाते रहें और उसी जाति के लाखों गरीब परिवार केवल उनके पोस्टर चिपकाने के काम आएं?

आरक्षण के भीतर छिपे इस अंतर्कलह और ऐतिहासिक सच्चाई को बेबाकी से समझने के लिए एन. सिंह की पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का यह अध्याय हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो वास्तविक समानता का पक्षधर है।

आरक्षण का सबसे क्रूर और अनकहा सच यह है कि शोषितों के नाम पर मिली मलाई को शोषितों के ही कुलीन वर्ग ने हड़प लिया है। गाँव का गरीब मजदूर आज भी वहीं है, और उसके नाम पर उसके सजातीय बाबू के बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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