अपनी ही जन्मभूमि में क्यों लुप्त हुआ बुद्ध धम्म? इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी का विश्लेषण
एन. सिंह · ·5 मिनट
इतिहास का यह सबसे बड़ा और पीड़ादायक प्रश्न है: जिस भारत भूमि पर तथागत बुद्ध का जन्म हुआ, जहाँ उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया, जहाँ सम्राट अशोक और कनिष्क जैसे चक्रवर्ती सम्राटों ने धम्म की पताका पूरे एशिया में फहराई—वही बुद्ध धम्म अपनी ही जन्मभूमि भारत से लगभग लुप्त कैसे हो गया? चीन, जापान, म्यांमार, थाईलैंड, श्रीलंका और तिब्बत में जो धम्म आज भी जन-जीवन की धड़कन बना हुआ है, वह भारत में केवल खंडहरों, मूर्तियों और पुरातात्विक संग्रहालयों की वस्तु बनकर क्यों रह गया?
एन. सिंह अपनी गहन शोधपरक पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ में इस ऐतिहासिक त्रासदी की निष्पक्ष चीरफाड़ करते हैं। वे लिखते हैं:
‘अक्सर यह सरलीकृत धारणा बना ली जाती है कि बख्तियार खिलजी जैसे मध्यकालीन मुस्लिम आक्रांताओं ने बौद्ध विहारों को जला दिया और भिक्षुओं की हत्या कर दी, इसलिए धम्म नष्ट हो गया। यह केवल आधा सच है। कोई भी विचार या धर्म केवल बाहरी तलवारों के बल पर तब तक नष्ट नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसकी जड़ें भीतर से खोखली न हो चुकी हों!
बुद्ध का धम्म भारत में इसलिए परास्त हुआ क्योंकि बौद्ध संघ ने धीरे-धीरे आम जनता से अपना जीवंत संपर्क खो दिया था। जिस पालि भाषा में बुद्ध ने गांव-गांव जाकर उपदेश दिए थे, भिक्षुओं ने उस लोक-भाषा को त्याग दिया और राजदरबारों की क्लिष्ट संस्कृत में शास्त्रार्थ करने लगे। मठों के पास अकूत संपत्ति, स्वर्ण और जागीरें आ गईं, जिससे साधना का स्थान विलासिता और तंत्र-मंत्र ने ले लिया। जब आंतरिक प्राण सूख चुके हों, तो बाहरी आंधी किसी भी विशाल वृक्ष को गिरा देती है।’
— ‘बुद्ध धम्म और भारत’
पतन के प्रमुख आंतरिक कारण: संघ की दुर्बलताएं
- लोक-भाषा पालि का परित्याग: बुद्ध ने स्पष्ट आदेश दिया था—“सकाय निरुत्तिया बुद्धवचनं परियापुणितुं” अर्थात् अपने-अपने जनपद की आम बोलचाल की भाषा में बुद्ध-वचन सीखे जाएं। परंतु कालान्तर में महायान और वज्रयान के काल में भिक्षु संस्कृतनिष्ठ दार्शनिक बहसों में उलझ गए, जिससे आम जनता उनसे कट गई।
- मठों का अत्यधिक ऐश्वर्य और भ्रष्टाचार: सम्राटों और धनी व्यापारियों के भारी दानों ने बौद्ध विहारों को अकूत धन-संपत्ति के केंद्र बना दिया। जहां त्याग, अपरिग्रह और ध्यान होना चाहिए था, वहां संपत्ति प्रबंधन और विलासिता आ गई।
- वज्रयान और तांत्रिक विकृतियां: आठवीं-नौवीं सदी तक आते-आते बौद्ध धर्म में तंत्र-मंत्र, गूढ़ साधनाएं और मद्य-मैथुन से जुड़ी विकृतियां प्रविष्ट हो गईं। जिस अंधविश्वास और पाखंड के विरुद्ध बुद्ध ने आजीवन संघर्ष किया था, वही पाखंड पिछले दरवाजे से बौद्ध धर्म का चोगा पहनकर अंदर आ गया।
पतन के प्रमुख बाह्य कारण: प्रतिक्रियावादी प्रहार
- ब्राह्मणवादी पुनरुत्थान और राजनीतिक दमन: मौर्य वंश के अंतिम बौद्ध सम्राट बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की। शुंग और उसके बाद के शासकों ने बौद्धों पर भारी अत्याचार किए। दिव्यावदान जैसे ऐतिहासिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि भिक्षुओं के सिर काटने पर पुरस्कार घोषित किए गए थे।
- अवतारवाद द्वारा आत्मसातीकरण: जब हिंसा और दमन से भी बुद्ध का प्रभाव पूरी तरह समाप्त न हो सका, तो एक अत्यंत चतुर रणनीतिक चाल चली गई—बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार घोषित कर दिया गया। उन्हें मंदिर में बैठा दिया गया, परंतु उनके समतावादी, जाति-विरोधी और विवेकशील विचारों को पूरी तरह दबा दिया गया।
- विदेशी आक्रमणों का अंतिम आघात: बारहवीं सदी के अंत में बख्तियार खिलजी ने नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे महान बौद्ध विश्वविद्यालयों को जलाकर राख कर दिया और हजारों निहत्थे भिक्षुओं का कत्लेआम किया। चूंकि बौद्ध धर्म पूरी तरह विहारों और संगठित भिक्षु-वर्ग पर निर्भर था (और हिंदू धर्म की तरह घर-घर में पुरोहित व्यवस्था नहीं थी), भिक्षुओं के मारे जाने या तिब्बत पलायन कर जाने के बाद आम जनता को धम्म सिखाने वाला कोई न बचा।
इस त्रासदी से आधुनिक समाज को क्या सबक सीखना चाहिए?
- जनता से कटना किसी भी आंदोलन की मौत है: कोई भी प्रगतिशील विचार या सामाजिक क्रांति तब तक जीवित नहीं रह सकती, जब तक वह आम आदमी की भाषा और उसकी रोज़मर्रा की रोटी-रोजी की समस्याओं से जुड़ी न हो।
- विचारधारा का विलासिता में रूपांतरण घातक है: जब कोई क्रांतिकारी आंदोलन संस्थागत होकर एसी कमरों, विदेशी फंडों और भारी संपत्ति में उलझ जाता है, तो उसका पतन निश्चित हो जाता है।
- अंधविश्वास का पुनरागमन: यदि आप विवेक और वैज्ञानिक सोच को लगातार खाद-पानी नहीं देंगे, तो पुरानी रूढ़ियां और अंधविश्वास किसी न किसी नए रूप में वापस आकर आपकी क्रांति को लील जाएंगे।
आज बुद्ध धम्म का पुनरुद्धार कैसे हो?
- धम्म को कर्मकांड से मुक्त रखना: बुद्ध की केवल प्रतिमाएं बनाकर उन पर अगरबत्ती सुलगाने से धम्म वापस नहीं आएगा; तथागत के अष्टांगिक मार्ग और शील को अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में उतारना होगा।
- वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण का प्रसार: बुद्ध के ‘एहिपस्सिको’ (आओ और स्वयं देखो/परखो) के सिद्धांत को शिक्षण संस्थानों और युवा पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बनाना।
- सामाजिक समरसता और बंधुत्व: जाति, भाषा और संप्रदाय के आधार पर हो रही नफ़रत के विरुद्ध ‘मैत्री’ और ‘करुणा’ को राष्ट्रीय आंदोलन बनाना।
एक विचारणीय सवाल
यदि हम आज भी वही गलतियां दोहराते रहे—आडंबर, अंधविश्वास और जनता से अलगाव—तो क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक विवेकशील समाज छोड़ पाएंगे?
भारत के इतिहास की इस सबसे बड़ी भूल और बौद्ध धम्म के उत्थान-पतन के वास्तविक कारणों को जानने के लिए एन. सिंह की पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का यह अध्याय अनिवार्य रूप से पढ़ा जाना चाहिए।
बुद्ध का धम्म केवल किसी विदेशी आक्रमणकारी की तलवार से नहीं मिटा; वह तब मिटना शुरू हुआ जब बौद्ध संघ लोक-भाषा पालि को छोड़कर राजदरबारों की भाषा और विलासिता के मठों में कैद हो गया।