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न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं — नफ़रत से कभी नफ़रत नहीं मिटती

एन. सिंह · ·3 मिनट

आज अपने मोबाइल की स्क्रीन खोलिए।

फेसबुक, ट्विटर (X), व्हाट्सएप और टीवी न्यूज़ चैनलों पर आपको क्या दिखाई देता है?

चारों तरफ ज़हर उगलते भाषण, एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़, जातियों के नाम पर गालियां, धर्मों के नाम पर नफ़रत और ‘ईंट का जवाब पत्थर से देने’ की हिंसक ललकार!

यदि किसी ने एक कटु शब्द कहा, तो दूसरा उससे दस गुना गंदा शब्द कहने को अपनी ‘मर्दानगी’ समझता है।

लेकिन इस अंधी नफ़रत का अंत कहाँ है?

महात्मा गांधी ने ठीक ही कहा था: “आंख के बदले आंख का सिद्धांत पूरी दुनिया को अंधा बना देगा!”

2500 वर्ष पूर्व जब भारत में विभिन्न कबीलों, राज्यों और दार्शनिक संप्रदायों के बीच ऐसी ही भीषण कटुता फैली थी, तब तथागत बुद्ध ने मानव इतिहास का सबसे महान नैतिक सूत्र उद्घोषित किया था।


सनातन धर्म का वास्तविक अर्थ

धम्मपद की पाँचवीं गाथा में बुद्ध कहते हैं:

न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनंतनो॥ (गाथा-५)

अर्थात्: इस संसार में वैर (दुश्मनी/नफ़रत) से वैर कभी शांत नहीं होता। वैर केवल ‘अवेर’ (प्रेम, मैत्री और करुणा) से ही शांत होता है। यही शाश्वत सनातन धर्म है!

बुद्ध ने यहाँ ‘सनातन धर्म’ शब्द का प्रयोग किया है।

आज सनातन के नाम पर लोग तलवारें लहराने और दूसरों को मिटाने की बातें करते हैं। लेकिन बुद्ध ने सनातन किसे कहा?

सनातन वह नहीं है जो किसी विशेष जाति या ग्रंथ की बपौती हो; सनातन प्रकृति का वह शाश्वत नियम है जो कभी नहीं बदलता।

जैसे आग में पेट्रोल डालने से आग कभी बुझती नहीं, बल्कि और भड़कती है; आग केवल शीतल जल से ही बुझाई जा सकती है। ठीक उसी तरह किसी के क्रोध का उत्तर क्रोध से देकर आप कभी विजयी नहीं हो सकते; आप केवल दोनों के विनाश का मार्ग प्रशस्त करते हैं।


किताब से कड़वा सच

अपनी पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ में लेखक नथुनी सिंह ‘कोदन्ना’ इस सनातन सूत्र की व्याख्या करते हुए लिखते हैं:

“कमजोर व्यक्ति कभी क्षमा नहीं कर सकता; क्षमा केवल शक्तिशाली की पहचान है। जब कोई आपके ऊपर कीचड़ फेंके, तो आप भी कीचड़ उठाकर उस पर फेंकेंगे तो आपका हाथ भी गंदा होगा और कीचड़ बढ़ेगा ही। तथागत ने सिखाया कि जो गाली देता है, यदि आप उसकी गाली स्वीकार ही न करें, तो वह गाली उसी के पास वापस लौट जाती है जैसे किसी का लौटाया हुआ उपहार! आज के नफ़रती दौर में जब राजनीति लोगों को लड़ाकर अपनी रोटियां सेंक रही है, बुद्ध का यह सूत्र ही भारत की अखंडता और सामाजिक सद्भाव को बचा सकता है।”
— ‘बुद्ध धम्म और भारत’ (भाग-२, गाथा-५ विवेचन)


असली समाधान क्या है?

  1. सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया का संयम: नफ़रती पोस्टों, ट्रोलिंग और भड़काऊ भाषणों पर तुरंत आक्रोशित होने के बजाय उन्हें अनदेखा करें और सत्य व सौहार्द की सामग्री साझा करें।
  2. सहानुभूतिपूर्ण श्रवण (Empathetic Listening): जब कोई आपसे असहमत हो या कटुता दिखाए, तो पहले यह समझने की कोशिश करें कि उसके इस आक्रोश के पीछे कौन सा डर या पीड़ा छिपी है।
  3. मैत्री भावना (Metta Meditation): प्रतिदिन कुछ क्षण आंखें बंद करके अपने मित्रों के साथ-साथ अपने विरोधियों और आलोचकों के प्रति भी यह मंगलकामना करें—“सबका भला हो, सब निरोगी हों, किसी के मन में वैर न रहे।”

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

यदि हम नफ़रत का जवाब नफ़रत से और गाली का जवाब गाली से ही देते रहेंगे, तो हममें और उस नफ़रती उन्मादी में क्या अंतर रह जाएगा?

तथागत के इस अमर सनातन सूत्र को अपने जीवन और समाज में उतारने के लिए पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का यह अंश हर विवेकशील मनुष्य को पढ़ना चाहिए।

न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं। अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनंतनो॥ इस संसार में वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; निर्वैर (मैत्री और प्रेम) से ही वैर शांत होता है—यही सनातन (शाश्वत) धर्म है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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