हरित क्रांति से कैंसर ट्रेन तक — अंधाधुंध रासायनिक जहर और सूखता भूजल
एन. सिंह · ·6 मिनट
हर रात ठीक 9 बजकर 25 मिनट पर पंजाब के बठिंडा रेलवे स्टेशन से राजस्थान के बीकानेर के लिए एक ट्रेन रवाना होती है। आधिकारिक रेलवे समय-सारिणी में इस ट्रेन का नंबर 14720 है।
लेकिन पंजाब और हरियाणा के गाँव-गाँव में इस ट्रेन को उसके सरकारी नंबर से कोई नहीं जानता। लोग इसे एक बेहद खौफनाक और रुला देने वाले नाम से पुकारते हैं—‘कैंसर एक्सप्रेस’ (Cancer Express)!
इस ट्रेन की बारह बोगियों में सामान्य मुसाफिर नहीं होते; इसमें 70 से 80 प्रतिशत यात्री कैंसर से जूझ रहे गरीब किसान, उनकी बुजुर्ग माताएं, और छोटे-छोटे बच्चे होते हैं जो बीकानेर के सरकारी कैंसर अस्पताल में कीमोथेरेपी और रेडिएशन कराने के लिए जा रहे होते हैं। ट्रेन के डिब्बों में आंसुओं की सिसकियां, असहनीय दर्द की कराहें, और दवाइयों की दुर्गंध भरी होती है।
अब ज़रा एक पल के लिए पीछे मुड़कर देखिए।
पंजाब और हरियाणा तो वही राज्य हैं जिन्हें 1960 के दशक में ‘हरित क्रांति’ (Green Revolution) का मक्का-मदीना कहा गया था! जिन्होंने पूरे देश का पेट भरने के लिए अपने खेतों में रिकॉर्ड तोड़ गेहूं और धान पैदा किया था।
तो फिर जिस धरती ने पूरे भारत को भुखमरी से बचाया था, उसी धरती के बेटे और बेटियां आज घर-घर में कैंसर से क्यों मर रहे हैं?
एन. सिंह अपनी कालजयी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के अध्याय 7 (‘भारतीय किसान व गाँव : बर्बादी की ओर’) में इस रासायनिक तबाही और आधुनिक अंधाधुंध उपभोक्तावादी खेती का एक निर्मम वैज्ञानिक पोस्टमार्टम प्रस्तुत करते हैं।
हरित क्रांति का अंधकारमय पहलू: तीन जानलेवा संकट
- यूरिया और डीएपी (DAP) का बेतहाशा इस्तेमाल:
- 1960 के दशक में आई अधिक उपज देने वाली संकर किस्मों (HYV Seeds) को रसायनों की भारी भूख थी। सरकारों ने रासायनिक खादों पर भारी सब्सिडी दी।
- परिणाम यह हुआ कि जहाँ कभी प्रति एकड़ 10 किलो खाद पड़ती थी, आज 200 से 300 किलो यूरिया और डीएपी ज़मीन में झोंकी जा रही है। मिट्टी के प्राकृतिक केंचुए और मित्र जीवाणु मर चुके हैं; मिट्टी की जैविक कार्बन (Organic Carbon) क्षमता 1% से गिरकर 0.2% रह गई है—अर्थात् हमारी मिट्टी रासायनिक रूप से ‘मृत’ हो चुकी है!
- कीटनाशकों का कॉकटेल और कैंसर का फैलाव:
- कपास और धान की फसलों पर छिड़के जाने वाले खतरनाक कीटनाशक (जैसे एंडोसल्फान, मैलाथियान, ग्लाइफोसेट) मिट्टी से रिसकर भूजल में मिल चुके हैं। मालवा क्षेत्र के भूजल परीक्षणों में यूरेनियम, लेड, आर्सेनिक और नाइट्रेट्स की मात्रा सुरक्षित सीमा से 50 गुना अधिक पाई गई है। माँ के दूध तक में पेस्टिसाइड्स के अंश मिल रहे हैं!
- पाताल छूता भूजल (Groundwater Depletion):
- पंजाब और हरियाणा जैसे कम वर्षा वाले अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में जब धान (water-guzzling crop) की खेती जबरन थोपी गई, तो किसानों ने धरती का सीना चीरकर लाखों ट्यूबवेल लगा दिए। आज भूजल स्तर 100 फीट से गिरकर 500 से 600 फीट नीचे पाताल में चला गया है। नासा के उपग्रह चित्रों ने चेतावनी दी है कि अगले 15 वर्षों में यह उपजाऊ इलाका रेगिस्तान में बदल सकता है!
पारंपरिक प्राकृतिक खेती बनाम अंधाधुंध रासायनिक खेती
| पैमाना | प्राचीन पारंपरिक व प्राकृतिक खेती | आधुनिक रासायनिक हरित क्रांति मॉडल |
|---|---|---|
| खाद और पोषण | गोबर की खाद, कंपोस्ट, हरी खाद और केंचुए | यूरिया, डीएपी, पोटाश और रासायनिक सिंथेटिक्स |
| कीट नियंत्रण | नीम का काढ़ा, पंचगव्य और जैव-विविधता | जहरीले रसायन, नर्व-एजेंट्स और सिस्टेमिक कीटनाशक |
| पानी की खपत | स्थानीय फसलों के अनुसार न्यूनतम पानी और नमी संरक्षण | लाखों लीटर भूजल का अंधाधुंध दोहन, सबमर्सिबल पंप |
| मानव स्वास्थ्य प्रभाव | पौष्टिक, रोगमुक्त, दीर्घायु और निरोगी जीवन | कैंसर, बांझपन, किडनी फेलियर और थायरॉयड की महामारी |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की मार्मिक चेतावनी
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के अध्याय 7 में लिखते हैं:
“हमने अधिक अन्न उगाने के लालच में अपनी पवित्र धरती माता की नसों में यूरिया और कीटनाशकों का इतना धीमा ज़हर उड़ेल दिया है कि आज हमारी मिट्टी बीमार है, हमारा भूजल जहरीला है और हमारी थाली में परोसा जाने वाला अन्न हमें धीरे-धीरे मौत के मुंह में धकेल रहा है। बठिंडा की ‘कैंसर एक्सप्रेस’ केवल पंजाब की त्रासदी नहीं है; वह आने वाले पूरे भारत का डरावना भविष्य है! बहुराष्ट्रीय बीज और पेस्टिसाइड कंपनियों ने अपने मुनाफे के लिए हमारे किसानों को अपनी ही धरती का हत्यारा बना दिया है। जो अन्नदाता था, वह आज जहरदाता बनने पर विवश कर दिया गया है। यदि हमने तुरंत प्राकृतिक खेती और जल-संरक्षण की ओर वापसी नहीं की, तो हमारी आने वाली पीढ़ियां अनाज के दाने के लिए नहीं, एक घूंट शुद्ध पानी और कैंसर की दवाइयों के लिए भीख मांगेंगी!”
— एन. सिंह (उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव, पृष्ठ 162-163)
तबाही से बचने के चार युगांतकारी समाधान
- शून्य बजट प्राकृतिक खेती (Natural Farming) का राष्ट्रीय मिशन: किसानों को रासायनिक खादों से मुक्त कर देशी गाय के गोबर-गोमूत्र आधारित जीवामृत, घनजीवामृत और आच्छादन (Mulching) पर आधारित प्राकृतिक खेती के लिए प्रति एकड़ ₹10,000 की सीधी प्रोत्साहन सब्सिडी मिले।
- धान-गेहूं के दुष्चक्र से मुक्ति (Crop Diversification): कम पानी वाली पौष्टिक फसलों—जैसे बाजरा, ज्वार, रागी (Millets), दलहन और तिलहन—को धान के बराबर एमएसपी और सुनिश्चित सरकारी खरीद दी जाए ताकि किसान धान का रकबा घटाएं।
- घातक कीटनाशकों पर पूर्ण प्रतिबंध: यूरोप और अमेरिका में प्रतिबंधित 27 से अधिक घातक रासायनिक कीटनाशकों के निर्माण और बिक्री पर भारत में तुरंत पूर्ण प्रतिबंध लगे।
- जल-संरक्षण और सूक्ष्म सिंचाई (Drip/Sprinkler) अनिवार्य हो: नहरी पानी का पुनरुद्धार हो और भूजल निकालने वाले बड़े ट्यूबवेलों पर वाटर-मीटरिंग और ड्रिप इरिगेशन 100% अनिवार्य किया जाए।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या ऐसी ‘हरित क्रांति’ किसी काम की है जो हमारी थाली में अन्न तो भर दे, लेकिन हमारे बच्चों के शरीर में कैंसर और अकाल मृत्यु का जहर घोल दे?
रासायनिक खेती के इस जानलेवा संकट, पर्यावरण के विनाश और प्राकृतिक खेती की ओर लौटने के वैज्ञानिक मार्ग को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का यह सातवां अध्याय हर नागरिक और किसान को पढ़ना चाहिए।
हमने अधिक अन्न उगाने के लालच में अपनी पवित्र धरती माता की नसों में यूरिया और कीटनाशकों का इतना धीमा ज़हर उड़ेल दिया है कि आज हमारी मिट्टी बीमार है, हमारा भूजल जहरीला है और हमारी थाली में परोसा जाने वाला अन्न हमें धीरे-धीरे मौत के मुंह में धकेल रहा है।