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आरक्षण: बीमारी की दवा या वोटों का नशा?

एन. सिंह · ·6 मिनट

कल्पना कीजिए कि किसी व्यक्ति को गंभीर बीमारी हो गई है और उसके पैर में गहरा घाव है। डॉक्टर उसे एक शक्तिशाली एंटीबायोटिक और पेनकिलर दवा देता है। दवा का उद्देश्य क्या है? दवा का एकमात्र उद्देश्य यह होता है कि मरीज का दर्द कम हो, घाव भरे और वह यथाशीघ्र अपने पैरों पर खड़ा होकर दौड़ने लगे।

लेकिन अब सोचिए कि वह मरीज उस दवा का आदी हो जाए और डॉक्टर भी अपनी फीस पक्की करने के लिए मरीज से कहे—“तुम कभी बिस्तर से उठने की कोशिश मत करना, बस यह दवा जिंदगी भर खाते रहो।” क्या वह मरीज कभी स्वस्थ हो पाएगा? बिल्कुल नहीं! वह धीरे-धीरे पूरी तरह पंगु हो जाएगा।

भारतीय समाज में आरक्षण (Affirmative Action) की पूरी अवधारणा ठीक इसी दवा की तरह थी। सदियों से जातिगत उत्पीड़न, अस्पृश्यता और ज्ञान-सम्पत्ति से वंचित रखे गए शोषित वर्गों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए यह एक अनिवार्य और न्यायसंगत सहारा था।

परंतु आज आज़ादी के 78 वर्षों बाद हमें यह अत्यंत असहज और कड़वा सवाल पूछना ही होगा: क्या आरक्षण आज भी सामाजिक न्याय की दवा है, या फिर यह राजनीतिक दलों के लिए सत्ता पाने का स्थायी नशा बन चुका है?


बाबासाहेब का मूल विजन बनाम आज का विकृत यथार्थ

संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक प्रखर अर्थशास्त्री और समाजविज्ञानी थे। वे भली-भांति जानते थे कि केवल आरक्षण किसी भी समाज के सर्वांगीण विकास का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।

  1. राजनीतिक आरक्षण की दस वर्ष की सीमा: संविधान सभा में जब राजनीतिक आरक्षण (अनुच्छेद 334) पर बहस हुई, तो बाबासाहेब ने स्वयं इसे केवल 10 वर्षों के लिए लागू करने की वकालत की थी। उनका स्पष्ट मानना था कि दस वर्षों में समाज इतना परिपक्व और सक्षम हो जाना चाहिए कि किसी को भी बैसाखी की जरूरत न पड़े। परंतु हर दस साल बाद सभी राजनीतिक दल बिना किसी ठोस बहस के संसद में हाथ उठाकर इसे आगे बढ़ाते चले गए, क्योंकि किसी भी दल में वोट-बैंक खोने का साहस नहीं था।
  2. शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर बल: बाबासाहेब का प्रसिद्ध नारा था—‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो!’ उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि ‘केवल आरक्षण की बैसाखी पर निर्भर रहो’। उनका सपना था कि दलित और पिछड़े समाज के बच्चे अपनी बौद्धिक प्रतिभा, उद्यमशीलता और ज्ञान के दम पर पूरे समाज का नेतृत्व करें।
  3. सरकारी नौकरियों की घटती संख्या का सच: आज जब केंद्र और राज्य सरकारों में कुल नौकरियां ही लगातार सिकुड़ रही हैं (देश के कुल कार्यबल का 2% से भी कम हिस्सा संगठित सरकारी क्षेत्र में है), तब आरक्षण के नाम पर 98% युवाओं को एक मृगतृष्णा के पीछे दौड़ाया जा रहा है।

आरक्षण: मिथक बनाम ज़मीनी यथार्थ

प्रचलित राजनीतिक मिथक ज़मीनी कड़वा यथार्थ
“आरक्षण से हर शोषित परिवार की गरीबी दूर हो जाएगी।” आरक्षण का 90% से अधिक लाभ उन परिवारों ने ले लिया जो पहले से मजबूत हो चुके हैं; दूर-दराज के गरीब तक फॉर्म भरने के पैसे भी नहीं हैं।
“आरक्षण का विरोध करने वाले सभी लोग जातिवादी और सामंती हैं।” विरोध अक्सर उस व्यवस्था से है जहाँ मेरिट का अपमान होता है और संपन्न परिवारों के बच्चे गरीब आरक्षित बच्चों का हक मार लेते हैं।
“केवल आरक्षण बढ़ा देने से सामाजिक समानता आ जाएगी।” जब तक प्राथमिक शिक्षा, पोषण और तकनीकी कौशल समान नहीं होगा, तब तक उच्च पदों पर वास्तविक समानता संभव ही नहीं है।
“आरक्षण हमेशा के लिए चलना चाहिए।” दुनिया का कोई भी आत्मसम्मानित समाज सदैव विशेष रियायतों की बैसाखी पर जीकर महाशक्ति नहीं बन सकता।

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का बेबाक विश्लेषण

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय ‘आरक्षण: दवा या नशा’ में अत्यंत तीखे शब्दों में लिखते हैं:

“आरक्षण सामाजिक विषमता की गंभीर बीमारी का इलाज करने वाली दवा थी। लेकिन सियासतदानों ने इस जीवनदायिनी दवा को वोटों की अफीम बना दिया है, ताकि समाज कभी अपने पैरों पर खड़ा न हो सके। यदि आरक्षण सचमुच अपने मूल उद्देश्य में सफल हो रहा होता, तो 78 वर्षों बाद आरक्षित वर्गों की नई पीढ़ी को अधिक स्वावलंबी, अधिक शक्तिशाली और बिना आरक्षण के मुकाबला करने में सक्षम होना चाहिए था। लेकिन आज विडंबना यह है कि जो जातियां कल तक खुद को उच्च और सामंत कहती थीं, वे भी आरक्षण पाने के लिए अपनी ही बसों को आग लगा रही हैं और खुद को पिछड़ा घोषित कराने के लिए सड़कों पर उतर रही हैं! यह विकास की यात्रा है या पीछे लौटने की होड़?”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 82-83)

लेखक आगे शासन की मक्कारी पर चोट करते हैं:

“सरकारें हर साल करोड़ों बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रही हैं क्योंकि वे गुणवत्तापूर्ण स्कूल नहीं बना सकतीं, उद्योग नहीं लगा सकतीं, अस्पताल नहीं चला सकतीं। अपनी इस ऐतिहासिक असफलता को छिपाने के लिए वे समय-समय पर आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने का झुनझुना फेंक देती हैं। जनता आपस में एक-दूसरे का सिर फोड़ती है, और सत्ता के ठेकेदार आराम से सत्ता भोगते हैं।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 86)


बीमारी के वास्तविक इलाज के लिए चार बुनियादी कदम

  1. प्राथमिक स्तर पर समान अवसर की गारंटी: आरक्षण कॉलेज या नौकरी के स्तर पर देने से ज्यादा जरूरी है कि पहली कक्षा से बारहवीं कक्षा तक हर गरीब बच्चे को विश्वस्तरीय शिक्षा मुफ्त मिले। नींव मजबूत होगी तो इमारत अपने दम पर खड़ी होगी।
  2. आरक्षण का एक पीढ़ी तक सीमित होना: जो परिवार आरक्षण के दम पर क्लास-वन अधिकारी, मंत्री या सांसद बन चुका है, उसकी अगली पीढ़ी को सामान्य श्रेणी में मुकाबला करना चाहिए ताकि उस जाति के सबसे निर्धन बच्चे को मौका मिले।
  3. उद्योग और स्वरोजगार का विस्तार: युवाओं को केवल सरकारी क्लर्क बनाने की मानसिकता से बाहर निकालकर उद्यमशीलता, स्टार्टअप और विनिर्माण के क्षेत्र में भारी वित्तीय मदद दी जाए।
  4. समीक्षा और पारदर्शिता: आरक्षण नीतियों का हर पांच वर्ष पर एक स्वतंत्र, निष्पक्ष सामाजिक आयोग द्वारा ऑडिट होना चाहिए कि किन उपजातियों को लाभ मिला और कौन सी जातियां आज भी शून्य पर खड़ी हैं।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या हम एक ऐसा स्वाभिमानी भारत चाहते हैं जहाँ हर युवा अपनी प्रतिभा और पसीने के दम पर सीना तानकर खड़ा हो सके, या एक ऐसा देश जहाँ हर नागरिक किसी न किसी कोटे की कतार में हाथ फैलाकर खड़ा होने को ही अपनी नियति मान ले?

आरक्षण के भावनात्मक नारों से परे इसके संवैधानिक, आर्थिक और सामाजिक सच को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का यह अध्याय हर युवा को पढ़ना चाहिए।

आरक्षण सामाजिक विषमता की गंभीर बीमारी का इलाज करने वाली दवा थी। लेकिन सियासतदानों ने इस जीवनदायिनी दवा को वोटों की अफीम बना दिया है, ताकि समाज कभी अपने पैरों पर खड़ा न हो सके।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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