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फाइव स्टार होटलों में रिसॉर्ट पॉलिटिक्स — जनता वोट देती है, नेता बिक जाते हैं

एन. सिंह · ·6 मिनट

भारतीय लोकतंत्र के आम चुनावों का दृश्य देखिए।

मई-जून की चिलचिलाती धूप में 45 डिग्री तापमान है। एक गरीब मजदूर, एक वृद्ध महिला, एक किसान अपनी दिहाड़ी छोड़कर, तीन-तीन घंटे पोलिंग बूथ की लाइन में खड़े होकर अपनी उंगली पर स्याही लगवाते हैं। वे सोचते हैं कि उनका यह बहुमूल्य वोट उनके इलाके में एक अच्छा अस्पताल बनवाएगा, बच्चों के लिए स्कूल खुलवाएगा और क्षेत्र की बदहाली दूर करेगा।

लेकिन अब चुनाव परिणाम आने के ठीक अगले दिन का दृश्य देखिए!

टीवी चैनलों पर लाइव ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही होती है:

  • “विधायकों से भरी लग्जरी वोल्वो बसें कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच सीधे हवाई अड्डे की ओर रवाना!”
  • “अमुक पार्टी के 40 विधायकों को बेंगलुरु, जयपुर या गोवा के सेवन स्टार लग्जरी रिसॉर्ट में कैद किया गया!”
  • “प्रत्येक विधायक की बोली पचास से सौ करोड़ रुपये तक पहुंची!”

स्विमिंग पूल किनारे जूस पीते, फाइव स्टार होटलों के गोल्फ कोर्स में खेलते और आलीशान बुफे का आनंद लेते इन माननीय जनप्रतिनिधियों को देखकर क्या किसी भी सच्चे भारतीय का खून नहीं खौलना चाहिए?

जिस जनता ने अपने खून-पसीने से इन्हें चुना, वे जनता के सेवक बनने के बजाय करोड़ों के भाव में बिकने वाले राजनीतिक बंधक बन चुके हैं! इसे ही कहते हैं भारतीय लोकतंत्र की सबसे घिनौनी बीमारी—‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ (Resort Politics)!


10वीं अनुसूची (दलबदल कानून) का मज़ाक और संवैधानिक पतन

1985 में संविधान में 52वां संशोधन करके ‘दलबदल विरोधी कानून’ (Anti-Defection Law - 10th Schedule) जोड़ा गया था। उद्देश्य यह था कि 1960 और 70 के दशक के ‘आया राम, गया राम’ कल्चर (विधायकों की खुली खरीद-फरोख्त) पर रोक लगाई जा सके।

परंतु आज हमारे चालाक राजनेताओं और कॉरपोरेट दलालों ने उस कानून की भी धज्जियां उड़ा दी हैं:

  1. सामूहिक इस्तीफे का नया फॉर्मूला: अब नेता पार्टी नहीं बदलते; वे सीधे विधानसभा की सदस्यता से ‘इस्तीफा’ दे देते हैं ताकि सदन का बहुमत का आंकड़ा नीचे गिर जाए और विरोधी दल की सरकार गिर जाए! बाद में वही नेता नई पार्टी के टिकट पर उपचुनाव लड़ते हैं और मंत्री पद की शपथ ले लेते हैं।
  2. विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) की पक्षपाती भूमिका: सुप्रीम कोर्ट ने कई बार फटकार लगाई है कि स्पीकर किसी निष्पक्ष जज की तरह काम करने के बजाय अपनी सत्ताधारी पार्टी के एजेंट की तरह दलबदल के मामलों को महीनों और सालों तक लटकाए रखते हैं।
  3. कॉर्पोरेट फंड और काले धन का नंगा नाच: सरकारें गिराने और बनाने के लिए सैकड़ों करोड़ रुपये कहाँ से आते हैं? यह वही कॉर्पोरेट घरानों का काला धन होता है जो सरकार बनने के बाद खदानों, बंदरगाहों और सरकारी ठेकों के जरिए जनता की जेब से सूद समेत वसूला जाता है।

चुनावी लोकतंत्र बनाम रिसॉर्ट लोकतंत्र: एक तुलनात्मक दृष्टि

कसौटी वास्तविक संवैधानिक लोकतंत्र वर्तमान भ्रष्ट रिसॉर्ट पॉलिटिक्स
जनता की भूमिका सत्ता की वास्तविक स्वामी और संप्रभु नियंत्रक केवल पांच साल में एक बार वोट डालकर ठगी जाने वाली प्रजा
जनप्रतिनिधि का धर्म जनहित, संविधान की रक्षा और नैतिक निष्ठा निजी स्वार्थ, करोड़ों का सौदा और लग्जरी होटलों की मौज
सरकार बनाने का आधार जनता का स्पष्ट जनादेश और नीतिगत कार्यक्रम रिसॉर्ट में विधायकों की बाड़ेबंदी और राज्यपालों का पक्षपात
संस्थागत साख संसद और विधानसभाओं की सर्वोच्च लोकतांत्रिक गरिमा जनता की नज़रों में नेताओं का जोकर और बिकाऊ माल बन जाना

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का तीखा चाबुक

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स और बिकाऊ लोकतंत्र’ में लिखते हैं:

“विधायक और सांसद, जो संविधान और विधि का निर्माण करने के लिए चुने जाते हैं, जब वे फाइव स्टार रिसॉर्ट्स में भेड़-बकरियों की तरह बाड़ेबंदी में रखे जाते हैं, तो समझ लीजिए कि उस देश का लोकतंत्र आईसीयू में वेंटिलेटर पर अंतिम सांसें गिन रहा है। जो माननीय अपने खुद के ईमान पर भरोसा नहीं कर सकते, जिन्हें अपनी ही पार्टी के नेताओं से डरकर कमरों में ताला बंद करके रखना पड़ता है, वे जनता के अधिकारों की रक्षा क्या करेंगे? उनका स्वयं का चित्त ही स्थिर नहीं है, तो ऐसे माननीय राष्ट्र के अच्छे भविष्य का चित्र क्या बना पाएंगे? लोकतंत्र आज सेवा नहीं, शेयर बाजार से भी ज्यादा मुनाफा कमाने वाला कॉर्पोरेट निवेश बन चुका है!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 104-105)

लेखक आगे एक अत्यंत मार्मिक सवाल पूछते हैं:

“अगर किसी आम नागरिक को पचास रुपये की घूस लेते पकड़ा जाए, तो उसे तुरंत जेल भेज दिया जाता है और उसकी नौकरी चली जाती है। लेकिन जब एक विधायक खुलेआम पचास करोड़ में अपनी निष्ठा बेचकर सरकार गिरा देता है, तो उसे मंत्री पद का लाल बत्ती का तोहफा दिया जाता है! क्या यह कानून का शासन है या संगठित डाकुओं का गिरोह?”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 108)


लोकतंत्र को नीलामी से बचाने के चार क्रांतिकारी उपाय

  1. इस्तीफा देने पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर पूर्ण रोक: यदि कोई निर्वाचित विधायक या सांसद अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा देता है या दलबदल करता है, तो उसे अगले 6 वर्षों तक कोई भी चुनाव लड़ने या मंत्री पद लेने पर पूर्ण कानूनी प्रतिबंध होना चाहिए।
  2. दलबदल मामलों का फैसला स्वतंत्र ट्रिब्यूनल करे: स्पीकर के बजाय दलबदल के मुकदमों का फैसला 30 दिनों के भीतर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों का एक स्वतंत्र अधिकरण (Independent Tribunal) करे।
  3. ‘राइट टू रिकॉल’ (Right to Recall) का अधिकार: यदि कोई जनप्रतिनिधि जनता के विश्वास के साथ गद्दारी करता है या बिकता है, तो उस क्षेत्र के मतदाताओं को उसे वापस बुलाने का कानूनी अधिकार दिया जाए।
  4. चुनाव में कॉर्पोरेट और काले धन पर नकेल: चुनावी बांड्स और अज्ञात कॉर्पोरेट चंदे को पूरी तरह समाप्त कर राज्य द्वारा चुनाव वित्तपोषण (State Funding) लागू किया जाए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या आप चाहते हैं कि आपके पवित्र वोट का सौदा फाइव स्टार रिसॉर्ट्स के बंद कमरों में शराब और कबाब की मेज़ पर होता रहे, या आप इन बिकाऊ नेताओं को सबक सिखाने के लिए तैयार हैं?

भारतीय लोकतंत्र की इस सबसे बड़ी सड़न, संवैधानिक पेचीदगियों और शुचिता के मार्ग को गहराई से समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह अध्याय हर देशभक्त और स्वाभिमानी नागरिक को पढ़ना चाहिए।

विधायक और सांसद, जो संविधान और विधि का निर्माण करने के लिए चुने जाते हैं, जब वे फाइव स्टार रिसॉर्ट्स में भेड़-बकरियों की तरह बाड़ेबंदी में रखे जाते हैं, तो समझ लीजिए कि उस देश का लोकतंत्र आईसीयू में वेंटिलेटर पर अंतिम सांसें गिन रहा है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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