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क्या हम समाज को समझने के लिए गिन रहे हैं या बाँटने के लिए?

एन. सिंह · ·7 मिनट

मान लीजिए आपके स्कूल की आठवीं कक्षा में पचास बच्चे पढ़ते हैं। एक दिन नए मास्टर जी क्लास में आते हैं और सभी बच्चों की एक विस्तृत सूची बनाते हैं। वे देखते हैं कि किन बच्चों के पास कॉपी-किताबें नहीं हैं, किनके पास जूते-मोज़े नहीं हैं, और कौन से बच्चे दोपहर का खाना घर से नहीं ला पाते। इसके बाद मास्टर जी उन अभावग्रस्त बच्चों के लिए पुस्तकालय से किताबों और मिड-डे मील में अतिरिक्त पोषण का इंतज़ाम करते हैं। ऐसी गिनती को हर कोई सराहेगा, क्योंकि इसका एकमात्र ध्येय सहायता करना, समानता लाना और सबको साथ लेकर आगे बढ़ना है।

लेकिन अब ज़रा सिक्के का दूसरा पहलू देखिए।

मान लीजिए क्लास का कोई शातिर छात्र यह देखने के लिए गिनती शुरू करे कि कौन सा बच्चा किस मोहल्ले का है, कौन किस जाति या धर्म का है, और फिर वह एक मोहल्ले के बच्चों के मन में दूसरे मोहल्ले के बच्चों के प्रति जहर घोल दे ताकि अगली बार वही क्लास का मॉनिटर बन जाए और क्लास फंड पर उसका कब्ज़ा हो जाए। क्या आप ऐसी गिनती को सही कहेंगे?

आज इक्कीसवीं सदी के भारत में ठीक यही यक्ष-प्रश्न सबसे बड़ा बन चुका है: क्या जातियों की गिनती समाज के अंतिम व्यक्ति को समझने और उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए हो रही है, या फिर यह केवल चुनाव जीतने, कुर्सी हथियाने और समाज को स्थायी खानों में बाँटने का नया राजनीतिक हथियार है?


गिनती का गणित और सियासत की नीयत: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

हमारे देश को स्वतंत्र हुए सात दशक से अधिक का समय बीत चुका है। जब देश आज़ाद हुआ था, तो संविधान सभा में बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल और पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे दूरदर्शी नेताओं ने यह स्वप्न देखा था कि औपनिवेशिक अंग्रेजों द्वारा थोपी गई ‘फूट डालो और राज करो’ की व्यवस्था समाप्त होगी। 1931 में अंग्रेजों ने आखिरी बार व्यापक जाति जनगणना कराई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत के समाज में आंतरिक विभाजन की दरारों को नापना था ताकि स्वाधीनता आंदोलन को कमज़ोर किया जा सके।

स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल ने 1951 की पहली जनगणना में जाति के कॉलम को हटा दिया था ताकि एक समरस, आधुनिक और जाति-विहीन भारतीय समाज की नींव रखी जा सके।

परंतु आज हकीकत क्या है? आज जब भी कोई चुनाव आता है—चाहे वह पंचायत का हो, विधानसभा का हो या लोकसभा का—तो नीति, विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा की बहसें पृष्ठभूमि में चली जाती हैं। मुख्य पटल पर केवल एक ही गणित बैठता है:

  • किस विधानसभा में किस जाति का कितना वोट शेयर है?
  • किस उपजाति को किसके विरुद्ध खड़ा करके समीकरण साधा जाए?
  • क्या उम्मीदवार की योग्यता उसके चरित्र और जनसेवा से तय होगी या उसकी जाति के थोक वोट बैंक से?

डेटा (आंकड़े) अपने आप में निष्पक्ष और पवित्र होते हैं। विज्ञान हो, आधुनिक अर्थशास्त्र हो या जन-कल्याणकारी योजनाएं—बिना सटीक आंकड़ों के कोई भी नीति सफल नहीं हो सकती। लेकिन सवाल आंकड़ों का नहीं, आंकड़ों के पीछे छिपी ‘राजनीतिक नीयत’ का है।


सामाजिक न्याय बनाम चुनावी अंकगणित: एक तुलनात्मक अध्ययन

आयाम वास्तविक सामाजिक न्याय केवल चुनावी जाति गणना
प्राथमिक उद्देश्य पंक्ति के अंतिम व्यक्ति (गरीब, भूमिहीन, कुपोषित) का उत्थान जातियों के थोक वोट बैंक को संगठित कर सत्ता हथियाना
नीतिगत केंद्र प्राथमिक शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण अस्पताल और रोजगार के अवसर केवल सरकारी नौकरियों में कोटा और सांकेतिक पद
सामाजिक प्रभाव आपसी बंधुत्व, सहयोग और नागरिक समरसता का विकास जातियों के बीच स्थायी वैमनस्य, अविश्वास और कटुता
लाभार्थी की पहचान आर्थिक रूप से कमजोर और वास्तव में साधनहीन परिवार जाति के भीतर पहले से संपन्न ‘क्रीमी लेयर’ और रसूखदार वर्ग

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की सीधी चेतावनी

लेखक एन. सिंह अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ में इस दोमुंहेपन पर सीधा प्रहार करते हुए लिखते हैं:

“यहीं से इस पुस्तक का मूल प्रश्न जन्म लेता है— क्या हम समाज को समझने के लिए गिनती कर रहे हैं या समाज को बाँटने के लिए? यह प्रश्न असुविधाजनक है, परन्तु आवश्यक है। क्योंकि यदि मनुष्य के भीतर स्वार्थ और असुरक्षा का तत्व अभी भी प्रबल है, तो कोई भी व्यवस्था—चाहे वह कितनी ही निष्पक्ष क्यों न प्रतीत हो— उसके माध्यम से विभाजन का साधन बन सकती है।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 13)

लेखक आगे भारतीय लोकतंत्र के नैतिक पतन की गंभीर चेतावनी देते हैं:

“1989 के बाद भारत की अवसरवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता का उद्देश्य सेवा नहीं, बल्कि शोषण और सत्ता-सुरक्षा बन गया है। अब चालाक सत्ता हर स्वार्थी को देशभक्त और हर विवेकशील आलोचक को संदिग्ध बना रही है… सत्ता प्राप्त करने के लिए जातीय जनगणना को कुछ वर्षों तक अंतिम औजार के रूप में प्रयोग करने का प्रयास सत्ताभोगियों का नया हथियार प्रतीत हो रहा है। वे जानते हैं कि जब जनता रोटी, स्कूल और अस्पताल मांगने लगेगी, तो उनके पास देने के लिए कुछ नहीं होगा; इसलिए जनता को जातियों के पुराने खांचों में उलझा दो।”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 14)


असली समाधान क्या है? एक व्यवहारिक नीतिगत रोडमैप

यदि हमें सचमुच भारत को एक सशक्त, समृद्ध और अखंड राष्ट्र बनाना है, तो गिनती के इस पाखंडी खेल से बाहर निकलकर निम्नलिखित बुनियादी सुधार करने होंगे:

  1. आंकड़े कल्याण के लिए हों, नफ़रत के लिए नहीं: किसी भी सामाजिक-आर्थिक सर्वे का प्राथमिक लक्ष्य यह होना चाहिए कि उसके आधार पर नीतियां सबसे गरीब बस्तियों तक शुद्ध पेयजल, पक्के आवास, आधुनिक स्कूल और अस्पताल पहुंचाने के लिए बनें, न कि चुनावी रैलियों में जातियों को लड़ाने के लिए।
  2. थोक जाति समूह नहीं, ‘परिवार’ इकाई बने: कल्याणकारी योजनाओं का आधार थोक जाति समूह न होकर व्यक्तिगत परिवार की आर्थिक स्थिति होनी चाहिए। जो परिवार तीन पीढ़ियों से सरकारी लाभ लेकर करोड़पति बन चुका है, उसे सूची से बाहर किया जाए और जो झोपड़ी में जी रहा है, उसे पहली प्राथमिकता मिले।
  3. सार्वजनिक प्राथमिक शिक्षा में भारी निवेश: जब तक सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता निजी कॉन्वेंट स्कूलों जैसी नहीं होगी, तब तक जाति की गिनती केवल झूठा दिलासा बनकर रह जाएगी। शिक्षा ही वह एकमात्र औजार है जो जन्म के बंधनों को तोड़कर वास्तविक समानता ला सकता है।
  4. नागरिक चेतना और मतदाता का आत्मसम्मान: जब तक मतदाता वोट देते समय जाति का चश्मा नहीं उतारेगा, तब तक राजनीतिक दल उसे केवल एक ‘वोट-मशीन’ समझेंगे। नागरिक को दल से पूछना होगा—“मेरी जाति का गुणगान छोड़िए, यह बताइए कि पिछले पांच वर्षों में हमारे बच्चों के लिए कितने रोजगार बने?”

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का केंद्रीय संदेश)

गिनती से क्या सचमुच सामाजिक न्याय मिल सकता है? या फिर यह सिर्फ सत्ता के उन पुराने खिलाड़ियों की नई चाल है जो हर चुनाव में जनता को नए नाम से बाँटकर अपनी मलाई सुरक्षित कर लेते हैं?

भारतीय राजनीति के इस अनकहे सच को बिना किसी लाग-लपेट के समझने और आज़ादी के बाद के सत्ता-संघर्ष के वास्तविक चरित्र को जानने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का पहला अध्याय हर जागरूक नागरिक को पढ़ना चाहिए।

यहीं से इस पुस्तक का मूल प्रश्न जन्म लेता है— क्या हम समाज को समझने के लिए गिनती कर रहे हैं या समाज को बाँटने के लिए? यह प्रश्न असुविधाजनक है, परन्तु आवश्यक है।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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