पंचवर्षीय योजनाओं का भ्रम — फैक्ट्रियों को अरबों की छूट, खेतों को सिर्फ वादे
एन. सिंह · ·3 मिनट
जब 1951 में स्वतंत्र भारत की पहली पंचवर्षीय योजना बनी थी, तो उसमें कृषि और सिंचाई को प्राथमिकता दी गई थी। भाखड़ा नांगल जैसे बांध बने।
लेकिन 1956 में जब दूसरी पंचवर्षीय योजना (महालानोबिस मॉडल) आई, तो पूरी नीति 180 डिग्री घूम गई। प्राथमिकता बन गई—भारी उद्योग (Heavy Industries), स्टील प्लांट, और बड़े शहर।
तर्क यह दिया गया कि जब देश में उद्योग लगेंगे, तो खेती पर निर्भर अतिरिक्त आबादी अपने आप फैक्ट्रियों में काम पा लेगी और देश अमीर बन जाएगा। इस सिद्धांत को अर्थशास्त्र में ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ (Trickle-down Theory) कहा जाता था।
लेकिन सात दशक बाद आज हकीकत क्या है?
उद्योगों ने पर्याप्त नौकरियां कभी पैदा नहीं कीं। ऑटोमेशन और मशीनों ने इंसानी हाथों को बाहर कर दिया। आज भी भारत की लगभग 45% से 50% आबादी अपनी आजीविका के लिए उसी खेती पर निर्भर है, लेकिन देश की कुल जीडीपी में कृषि का हिस्सा घटकर मात्र 15-16% रह गया है!
यानी देश की आधी आबादी को राष्ट्रीय आय का मात्र छठा हिस्सा मिलता है। क्या यह घोर नीतिगत अन्याय नहीं है?
बजट का खेल: कॉरपोरेट बनाम किसान
अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के पाँचवें अध्याय में लेखक एन. सिंह भारत की सभी पंचवर्षीय योजनाओं और वार्षिक बजटों का लेखा-जोखा सामने रखते हैं:
- जब कोई उद्योगपति कारखाना लगाता है, तो उसे टैक्स हॉलिडे, मुफ्त ज़मीन, सस्ती बिजली और अरबों की सब्सिडी मिलती है।
- अगर उसका धंधा डूब जाए, तो बैंकों के लाखों करोड़ रुपये के एनपीए (NPA) को चुपचाप माफ़ कर दिया जाता है।
- लेकिन जब किसान के लिए नलकूप की बिजली, यूरिया की बोरी या न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की बात आती है, तो टीवी के स्टूडियो और अर्थशास्त्री छाती पीटने लगते हैं कि “देश का खजाना लुट रहा है, राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ जाएगा!”
किताब से कड़वा सच
“भारतीय योजनाकारों ने पश्चिम के उस मॉडल की अंधी नकल की जहाँ 2 से 3 प्रतिशत लोग खेती करते हैं। भारत जैसा विशाल, सघन आबादी वाला देश कभी भी अमेरिका या यूरोप के कृषि मॉडल पर नहीं चल सकता। यहाँ कृषि केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जीवन-पद्धति और सामाजिक सुरक्षा की रीढ़ है। जब योजनाओं ने कृषि क्षेत्र में पूंजी निर्माण (Capital Formation) को घटा दिया, तो गाँव के तालाब सूख गए, नहरें पट गईं और किसान पूरी तरह निजी ट्यूबवेल और महंगे डीज़ल के रहमोकरम पर आ गया।”
— ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ (अध्याय 5)
असली समाधान क्या है?
- कृषि में सार्वजनिक निवेश (Public Investment) की बहाली: बजट का कम से कम 25% हिस्सा सीधे ग्रामीण अवसंरचना—नहरों के जीर्णोद्धार, सौर ऊर्जा सिंचाई, कोल्ड स्टोरेज और ग्रामीण सड़कों में लगाया जाए।
- समान वित्तीय आवंटन: जितना इंसेंटिव (PLI Schemes) कॉरपोरेट सेक्टर को दिया जाता है, उसका एक समानुपातिक हिस्सा सीधे ग्रामीण कुटीर उद्योगों और जैविक खेती को मिले।
- योजनाओं का विकेंद्रीकरण: दिल्ली के नीति आयोग के वातानुकूलित कमरों के बजाय ग्राम पंचायतों को अपनी विकास योजना और बजट तय करने का वास्तविक अधिकार मिले।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
यदि योजनाएं केवल शहरों को चमकाने और अमीरों को और अमीर बनाने के लिए बनाई जाएं, तो क्या उस विकास को ‘राष्ट्रीय विकास’ कहा जा सकता है? पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का यह अध्याय देश के आर्थिक नीति-निर्माताओं के चेहरे से नकाब उतारता है।
पहली पंचवर्षीय योजना को छोड़ दें तो भारत की किसी भी योजना ने कृषि को देश की अर्थव्यवस्था का इंजन नहीं माना। हमने यह मान लिया कि फैक्ट्रियों के धुएं में ही तरक्की है और खेत की मिट्टी में केवल पिछड़ापन।