2 रुपये किलो आलू और 50 रुपये का चिप्स — मंडी, दलाल और MSP का असली खेल
एन. सिंह · ·3 मिनट
आपने अक्सर टीवी की खबरों में देखा होगा:
उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र के किसी हाइवे पर किसान अपने सैकड़ों क्विंटल टमाटर या आलू सड़क पर फेंककर चले जाते हैं, क्योंकि मंडी में उन्हें 50 पैसे या 1 रुपये प्रति किलो का भाव भी नहीं मिल रहा होता। मंडी तक ले जाने का भाड़ा भी जेब से लगाना पड़ रहा होता है।
और उसी समय, उसी दिन, दिल्ली, मुंबई या बैंगलोर के किसी सुपरमार्केट में शहर का आम उपभोक्ता वही आलू 30 से 40 रुपये किलो और 15 ग्राम का आलू का चिप्स 20 रुपये में खरीद रहा होता है!
यह कैसा अर्थशास्त्र है?
अन्न उगाने वाले को 1 रुपया नहीं मिलता, और खाने वाले की जेब कट रही है। तो बीच का 30 गुना मुनाफा किस अजगर के पेट में जा रहा है?
मंडी समितियों का सिंडिकेट और दलाली का जाल
अपनी पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ के आठवें अध्याय में लेखकद्वय एन. सिंह और विमला सिंह सरकारी मंडी समितियों (APMC), बिचौलियों और सरकारी खरीद एजेंसियों के इस गठजोड़ का पर्दाफाश करते हैं।
वे बताते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की घोषणा हर साल रबी और खरीफ की 23 फसलों के लिए बड़े गाजे-बाजे के साथ की जाती है। लेकिन हकीकत यह है कि शांता कुमार समिति की रिपोर्ट खुद मानती है कि देश के मात्र 6 प्रतिशत किसानों को ही MSP का लाभ मिलता है, वह भी मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा के गेहूं-धान उत्पादकों को!
बाकी पूरे देश में—चाहे वह बिहार हो, पूर्वी उत्तर प्रदेश हो या मध्य प्रदेश—सरकारी क्रय केंद्र या तो समय पर खुलते नहीं, या वहाँ बारदाने (बोरी) की कमी का बहाना बनाया जाता है, या किसान की फसल में ‘नमी’ और ‘कचरा’ बताकर उसे रिजेक्ट कर दिया जाता है।
थक-हारकर गरीब किसान मंडी के बाहर खड़े उसी आढ़तिये को अपनी फसल MSP से 400-500 रुपये कम पर बेच देता है। और वही आढ़तिया उसी रात सरकारी केंद्र में साठगांठ करके किसान के नाम पर फर्जी पर्ची कटाकर पूरा MSP का मुनाफा अपनी जेब में रख लेता है!
किताब से कड़वा सच
“प्रशासनिक तंत्र और बिचौलियों का यह सिंडिकेट इतना मजबूत है कि कोई भी कानून आए, किसान की जेब कटना तय रहता है। किसान को उसकी फसल का मूल्य तुरंत नकद चाहिए होता है, क्योंकि उसे अगली फसल का खाद-बीज लेना है, बेटी की शादी करनी है या बीमारी का इलाज कराना है। उसकी इसी लाचारी का फायदा उठाकर बाज़ार उसे लूटता है। जब तक ‘फार्म-गेट’ (खेत की मेड़) पर गारंटीशुदा खरीद और नकद भुगतान की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक किसान कभी समृद्ध नहीं हो सकता।”
— ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ (अध्याय 8)
असली समाधान क्या है?
- MSP की कानूनी गारंटी (Legal Guarantee of MSP): तय न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर किसी भी व्यापारी या कंपनी द्वारा खरीद को गैर-कानूनी और दंडनीय अपराध घोषित किया जाए।
- गांव-गांव में सरकारी खरीद और भंडारण केंद्र: हर 5 ग्राम पंचायतों के बीच एक सुसज्जित वेयरहाउस और पारदर्शी डिजिटल क्रय केंद्र हो, जहाँ किसान सीधे अपनी उपज तौलवा सके और 24 घंटे में पैसा उसके बैंक खाते में आ जाए।
- किसान उत्पादक संगठनों (FPO) का सशक्तिकरण: किसानों की अपनी सहकारी कंपनियां बनें जो सीधे रिटेल मार्केट और शहरों के उपभोक्ताओं से जुड़ें, ताकि बिचौलियों की 70-80% दलाली खत्म हो।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
अगर एक कार, मोबाइल या दवा कंपनी को अपनी लागत में मुनाफा जोड़कर बेचने की पूरी आज़ादी है, तो देश का पेट भरने वाले किसान को अपनी फसल का दाम तय करने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए? पुस्तक ‘उजड़ती खेती, उजड़ते गाँव’ का यह अध्याय इस लूट के पूरे तंत्र को बेनकाब करता है।
मंडी व्यवस्था और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का दावा कागज़ों पर बहुत सुंदर दिखता है, लेकिन ज़मीन पर केवल 6% बड़े किसानों को ही इसका लाभ मिलता है। बाकी 94% किसान आढ़तियों और बिचौलियों के रहमोकरम पर लुटने के लिए छोड़ दिए जाते हैं।