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14 अक्टूबर 1956 नागपुर: बाबासाहेब आंबेडकर और बुद्ध की भारत वापसी

एन. सिंह · ·5 मिनट

१४ अक्टूबर १९५६—विजयादशमी का पावन दिन। महाराष्ट्र के नागपुर में चंद्रपुर रोड पर स्थित मैदान में श्वेत वस्त्र पहने लगभग पांच लाख लोगों का विशाल जनसमूह उपस्थित था। यह कोई साधारण जनसभा नहीं थी, बल्कि विश्व इतिहास की सबसे बड़ी रक्तहीन क्रांति की पूर्वपीठिका थी।

भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पी डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने वयोवृद्ध बौद्ध महास्थविर चंद्रमणि के हाथों त्रिशरण और पंचशील ग्रहण करके बौद्ध धम्म स्वीकार किया। उसके तुरंत बाद उन्होंने अपने लाखों अनुयायियों को २२ प्रतिज्ञाएं दिलाकर बुद्ध के समतावादी मार्ग पर चलने का संकल्प दिलाया। सदियों से अपनी ही जन्मभूमि में निर्वासित और उपेक्षित रहे तथागत बुद्ध की भारत में यह ऐतिहासिक वापसी थी।

एन. सिंह अपनी कालजयी पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ के समापन अध्याय में इस महाघटना का विश्लेषण करते हुए लिखते हैं:

‘बाबासाहेब आंबेडकर का बौद्ध धम्म की ओर लौटना कोई आकस्मिक या भावुक निर्णय नहीं था। यह उनके दशकों लंबे अध्ययन, चिंतन और सामाजिक संघर्ष का निष्कर्ष था। १९३५ में येवला की धरती पर उन्होंने ऐतिहासिक घोषणा की थी—“मैं हिंदू पैदा हुआ था, यह मेरे वश में नहीं था; परंतु मैं हिंदू रहकर मरूंगा नहीं!” इसके बाद उन्होंने इस्लाम, ईसाई धर्म, सिख धर्म सबका गहरा अध्ययन किया। लेकिन अंततः उन्होंने तथागत बुद्ध के धम्म को ही चुना। क्यों?
क्योंकि बुद्ध का धम्म किसी काल्पनिक ईश्वर, स्वर्ग-नरक या अवतार के भरोसे नहीं चलता। वह प्रज्ञा, शील और करुणा की ठोस जमीन पर खड़ा है। बुद्ध के धम्म में मनुष्य की गरिमा सर्वोपरि है। बाबासाहेब ने बुद्ध को पूजा-पाठ के पिंजरे से निकालकर उसे सामाजिक न्याय, बंधुत्व और वैज्ञानिक चेतना का हथियार बना दिया। उन्होंने इसे ‘नवायण’ कहा—एक ऐसा नया यान जो आधुनिक लोकतंत्र और मानवीय अधिकारों का संवाहक है।’
— ‘बुद्ध धम्म और भारत’


नवायण: प्राचीन सत्य का आधुनिक युगानुकूल रूपांतरण

डॉ. आंबेडकर ने अपनी अमर कृति ‘द बुद्ध एंड हिज धम्म’ में बुद्ध के दर्शन को समकालीन संदर्भों में पुनः व्याख्यायित किया:

  1. धर्म (Religion) बनाम धम्म (Dhamma): बाबासाहेब ने स्पष्ट किया कि ‘रिलीजन’ व्यक्तिगत मोक्ष या ईश्वर-आराधना तक सीमित हो सकता है, परंतु ‘धम्म’ सामाजिक नैतिकता (Social Morality) है। धम्म का उद्देश्य स्वर्ग पाना नहीं, बल्कि इस धरती पर न्यायपूर्ण समाज की स्थापना करना है।
  2. स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व: बाबासाहेब ने फ्रांसीसी क्रांति के नारे को स्वीकार करते हुए कहा कि मैंने यह सिद्धांत किसी विदेशी दर्शन से नहीं, बल्कि अपने गुरु तथागत बुद्ध की शिक्षाओं से ग्रहण किया है। स्वतंत्रता के बिना समता अधूरी है, और बंधुत्व के बिना दोनों व्यर्थ हैं।
  3. २२ प्रतिज्ञाओं का क्रांतिकारी महत्व: नागपुर में ली गई २२ प्रतिज्ञाएं वास्तव में अंधविश्वास, अवतारवाद, श्राद्ध-तर्पण और जातिवादी कर्मकांडों से पूर्ण मुक्ति का घोषणापत्र थीं। इसने शोषित वर्ग को एक नई आत्म-छवि, गरिमा और बौद्धिक स्वतंत्रता प्रदान की।

आज के भारत में बुद्ध और आंबेडकर की प्रासंगिकता

आज जब देश में धर्म के नाम पर उन्माद, लिंचिंग, नफ़रत और सामाजिक ध्रुवीकरण अपने चरम पर है, तब बुद्ध-आंबेडकर का मार्ग एकमात्र संजीवनी है:

  • संवैधानिक मूल्यों की रक्षा: भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के मूल्य सीधे-सीधे बुद्ध के धम्म से प्रेरित हैं। जब हम संविधान की रक्षा करते हैं, तो हम वास्तव में तथागत के करुणा और समता के विचार की रक्षा कर रहे होते हैं।
  • जातिवाद के विरुद्ध अंतिम संग्राम: सदियों से शोषित वर्गों को आज भी जातिगत अपमान और हिंसा का सामना करना पड़ता है। बुद्ध का धम्म उन्हें हीनभावना से निकालकर ‘अत्त दीपो भव’ (अपना दीपक स्वयं बनो) का आत्मसम्मान देता है।
  • विज्ञान और विवेक का युग: अंधविश्वासों, ढोंगी बाबाओं और धार्मिक धंधेबाजों के इस दौर में बुद्ध का तर्कवाद और आंबेडकर का ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’ का नारा ही युवाओं को भटकने से बचा सकता है।

एक सच्चे बौद्ध और नागरिक के रूप में हमारा कर्तव्य

  1. ‘अत्त दीपो भव’ को जीवन का मूलमंत्र बनाना: किसी चमत्कार, किसी बाबा या किसी अलौकिक शक्ति के सामने हाथ फैलाने के बजाय अपनी मेहनत, अपनी शिक्षा और अपने आत्मबल पर विश्वास करें।
  2. सहानुभूति और सामाजिक बंधुत्व का विस्तार: अपने भीतर से हर प्रकार के जातिगत, धार्मिक और क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों को मिटाएं और समाज के सबसे कमज़ोर व्यक्ति के आंसुओं को पोंछने के लिए आगे आएं।
  3. शिक्षा और वैज्ञानिक चेतना का प्रसार: अपने बच्चों को अंधविश्वासों की घुट्टी पिलाने के बजाय उन्हें विज्ञान, गणित, साहित्य और मानवीय अधिकारों की शिक्षा दें।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का अंतिम संदेश)

क्या बुद्ध केवल बौद्धों के हैं? क्या आंबेडकर केवल दलितों के हैं?

सत्य यह है कि बुद्ध और आंबेडकर पूरी मानवता के हैं! वे हर उस मनुष्य के हैं जो स्वतंत्रता से सांस लेना चाहता है, जो नफ़रत से मुक्त होना चाहता है और जो समाज में बराबरी का सपना देखता है।

भारत को फिर से तथागत का भारत—प्रबुद्ध भारत—बनाने की वैचारिक यात्रा को समझने के लिए एन. सिंह की पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का यह प्रेरक समापन हर संवेदनशील इंसान को पढ़ना चाहिए।

डॉ. आंबेडकर ने बुद्ध को किसी चमत्कारिक देवदूत के रूप में नहीं, बल्कि शोषित-पीड़ित मानवता के मुक्तिदाता और वैज्ञानिक विवेक के शिखर पुरुष के रूप में पुनर्जीवित किया।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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