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1977 का जेपी आंदोलन — 'संपूर्ण क्रांति' का नारा सत्ता बदलते ही क्यों बिखर गया?

एन. सिंह · ·6 मिनट

५ जून १९७४—पटना के गांधी मैदान में लाखों नौजवानों और नागरिकों का ऐसा अभूतपूर्व सैलाब उमड़ा था जिसने दिल्ली के तख्त को हिला कर रख दिया था।

स्वतंत्रता संग्राम के वयोवृद्ध नायक लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने कांपते हाथों से माइक थामा और ऐतिहासिक उद्घोषणा की: “यह क्रांति केवल बिहार विधानसभा को भंग करने के लिए नहीं है; यह ‘संपूर्ण क्रांति’ (Total Revolution) है—सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक क्रांति!”

छात्रों ने कॉलेजों का बहिष्कार कर दिया, अदालतों और दफ्तरों पर ताले पड़ गए, रेल का चक्का जाम हो गया। परिणाम यह हुआ कि बौखलाई इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया, जेपी समेत देश भर के लाखों नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया।

परंतु जब 1977 में चुनाव हुए, तो भारतीय जनता ने ऐसा ऐतिहासिक चमत्कार किया जो दुनिया के इतिहास में विरल था: तानाशाही को उखाड़ फेंका, इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी दोनों चुनाव हार गए, और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी ‘जनता पार्टी’ की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी!

पूरे देश की आंखों में आंसू थे; ऐसा लगा मानो आज़ादी की दूसरी लड़ाई जीत ली गई हो।

लेकिन अब इसके ठीक दो साल बाद का दृश्य देखिए!

वही जनता पार्टी मोरारजी देसाई, चरण सिंह, जगजीवन राम और जॉर्ज फर्नांडिस के व्यक्तिगत अहकारों, कुर्सी की अंतहीन लड़ाई और दोहरी सदस्यता के विवाद में ऐसी टूटी कि 1980 में जनता ने तंग आकर उसी इंदिरा गांधी को फिर से प्रचंड बहुमत से सत्ता में बैठा दिया!

एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय 10 (‘कांग्रेसी साये से बाहर भारत’) में यह चुभता हुआ सवाल पूछते हैं: आज़ाद भारत का सबसे बड़ा जन-आंदोलन, जिसने लाखों युवाओं की जिंदगियां बदल दी थीं, सत्ता की चौखट पर पहुँचते ही इतनी बुरी तरह क्यों बिखर गया? इस ऐतिहासिक विफलता से 21वीं सदी के भारत को क्या सबक सीखना चाहिए?


संपूर्ण क्रांति से संपूर्ण कलह: जनता पार्टी के पतन के चार कारण

  1. नकारात्मक गठबंधन (Anti-Indiraism as Sole Glue): जनता पार्टी का जन्म किसी साझा सामाजिक-आर्थिक दर्शन या नीतिगत कार्यक्रम से नहीं हुआ था; उसका एकमात्र आधार था—‘इंदिरा हटाओ!’ सोशलिस्ट, जनसंघ (आरएसएस), भारतीय लोकदल और कांग्रेस (ओ)—इन चारों की विचारधाराएं उत्तर और दक्षिण ध्रुव की तरह विपरीत थीं। जब साझा शत्रु (इंदिरा) हट गया, तो उनके पास देश चलाने का कोई एक साझा विज़न नहीं था।
  2. तीन बुजुर्गों की महत्वाकांक्षा का टकराव: 81 वर्षीय मोरारजी देसाई, किसानों के नेता चौधरी चरण सिंह, और दलित नेता बाबू जगजीवन राम—तीनों खुद को प्रधानमंत्री पद का एकमात्र स्वाभाविक दावेदार मानते थे। मंत्रिमंडल की बैठकों में नीतियों पर चर्चा होने के बजाय इस बात पर तू-तू-मैं-मैं होती थी कि कौन किसको हटाएगा!
  3. आंदोलनकारी कार्यकर्ताओं का उपेक्षा: जेपी के साथ लाठियां खाने वाले छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के निस्वार्थ कार्यकर्ताओं को सत्ता में आते ही किनारे कर दिया गया और पुराने खादीधारी मठाधीशों ने मंत्रालयों और मलाईदार पदों पर कब्जा कर लिया।
  4. चरित्र की कमी और अवसरवादिता: जनता को लगा था कि ये नए नेता संत होंगे; परंतु जनता ने देखा कि वे भी बंगलों, गाड़ियों और दलबदल के उसी गंदे खेल में लिप्त हो गए जिसे मिटाने का वे दावा करते थे।

1977 का जनता प्रयोग बनाम 2011 का अन्ना आंदोलन: इतिहास की पुनरावृत्ति

आयाम 1977 का जेपी आंदोलन (जनता पार्टी) 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन (इंडिया अगेंस्ट करप्शन)
मूल नारा ‘संपूर्ण क्रांति’ और भ्रष्टाचार-तानाशाही का अंत ‘जन लोकपाल’ और व्यवस्था परिवर्तन
जनता की उम्मीद एक नए, पारदर्शी और नैतिक भारत का जन्म राजनीति से भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का पूर्ण सफाया
राजनीतिक परिणति कई दलों का बेमेल विलय, जो 2 साल में टूटकर बिखर गया आंदोलन से राजनीतिक दल (आप) निकला, जो कालांतर में पारंपरिक राजनीति में समा गया
अंतिम सबक नेता बदल देने से व्यवस्था नहीं बदलती; वैचारिक स्पष्टता अनिवार्य है बिना ठोस संस्थागत नियंत्रण के कोई भी आंदोलन सत्ता की भूख में भटक जाता है

किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की ऐतिहासिक चीरफाड़

लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के अध्याय 10 में लिखते हैं:

“18 जनवरी 1977 को जब इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा की और जनता पार्टी बनी, तो ऐसा लगा कि भारत एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। परंतु 1977 की जनता पार्टी की विफलता भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्रासद सबक है। जब अलग-अलग विचारधाराओं के स्वार्थी दल केवल एक व्यक्ति को सत्ता से हटाने के नकारात्मक एजेंडे पर एक होते हैं, तो वे सत्ता तो पा जाते हैं लेकिन देश को अराजकता और निराशा के दलदल में धकेल देते हैं। मोरारजी और चरण सिंह की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने उस महान जनक्रांति की पीठ में छुरा घोंप दिया जिसे जयप्रकाश नारायण ने अपने खून-पसीने से सींचा था। जनता ने देखा कि जो लोग कल तक लोकतंत्र बचाने की कसमें खा रहे थे, वे सत्ता मिलते ही कुत्तों की तरह एक-दूसरे पर झपट रहे थे!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 94-95)

लेखक आगे आने वाली पीढ़ियों को सचेत करते हैं:

“आंदोलन करना आसान है, नारे लगाना आसान है; लेकिन सत्ता मिलने के बाद चरित्र, अनुशासन और सुशासन देना दुनिया का सबसे कठिन काम है। 1977 ने साबित किया कि भारत की जनता तानाशाही को उखाड़ फेंकने का माद्दा रखती है, लेकिन अगर विकल्प निकम्मा निकले, तो वह उसे भी कूड़ेदान में फेंकने में देर नहीं करती।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 98)


जन-आंदोलनों की सफलता के लिए चार अनिवार्य सूत्र

  1. सकारात्मक नीतिगत घोषणापत्र (Positive Agenda): आंदोलन केवल किसी व्यक्ति या पार्टी के ‘विरोध’ पर न टिके; उसके पास स्पष्ट आर्थिक, औद्योगिक और प्रशासनिक ब्लूप्रिंट होना चाहिए।
  2. आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन: आंदोलन से उपजी पार्टियों में किसी भी नेता की व्यक्तिगत तानाशाही या गुटबाजी को बर्दाश्त न किया जाए।
  3. कार्यकर्ताओं की सत्ता पर निरंतर निगरानी: आंदोलनकारी नेताओं को सत्ता में जाते ही बेलगाम होने से रोकने के लिए नागरिक समाज (Civil Society) की एक स्वतंत्र लोकपाल समिति होनी चाहिए।
  4. अहंकार का त्याग और राष्ट्रहित को प्राथमिकता: व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को राष्ट्रहित के आगे बौना साबित करने का नैतिक साहस नेतृत्व में होना चाहिए।

एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)

क्या आज का भारतीय युवा किसी भी नए राजनीतिक आंदोलन के नारों पर आँख मूंदकर भरोसा कर लेगा, या वह 1977 के उस महान विश्वासघात से सीख लेकर नेताओं से कड़े सवाल पूछेगा?

जेपी आंदोलन के उस अभूतपूर्व जन-ज्वार, जनता पार्टी के दर्दनाक पतन और आधुनिक भारत की राजनीति के इस सबसे बड़े सबक को समझने के लिए एन. सिंह की चर्चित पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह दसवां अध्याय हर युवा और छात्र नेता को पढ़ना चाहिए।

1977 की जनता पार्टी की विफलता भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्रासद सबक है। जब अलग-अलग विचारधाराओं के स्वार्थी दल केवल एक व्यक्ति को सत्ता से हटाने के नकारात्मक एजेंडे पर एक होते हैं, तो वे सत्ता तो पा जाते हैं लेकिन देश को अराजकता और निराशा के दलदल में धकेल देते हैं।

आज़ाद कलम — एन. सिंह

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