गणना से समृद्धि तक — भारत को विश्वशक्ति बनाने का असली रोडमैप क्या है?
एन. सिंह · ·6 मिनट
चिकित्सा विज्ञान का एक बहुत सीधा-सादा और प्राथमिक नियम है।
यदि किसी अस्पताल में भर्ती अत्यंत दुर्बल, कुपोषित और तेज बुखार से पीड़ित मरीज के पास डॉक्टर दिन भर केवल थर्मामीटर लेकर खड़ा रहे, सुबह-दोपहर-शाम उसका तापमान नापे, उसका वजन तोले, उसकी बीमारी की पर्चियां बनाए—परंतु उस मरीज को न तो एक चम्मच पौष्टिक दलिया दे, न शुद्ध पानी दे, और न ही बुखार की कोई अचूक दवा दे—तो क्या वह मरीज कभी स्वस्थ हो पाएगा?
कुछ ही दिनों में उस मरीज की मौत हो जाएगी, और डॉक्टर के हाथ में केवल ‘आंकड़ों की एक सुंदर फाइल’ बची रह जाएगी!
आज हमारे देश की पूरी राजनीति के साथ ठीक यही हास्यास्पद और त्रासद खेल खेला जा रहा है।
चारों तरफ केवल एक ही शोर है—“जातियों को गिनो! उपजातियों को गिनो! किसका कितना प्रतिशत है, उसके आंकड़े जुटाओ!” कोई भी यह बात करने को तैयार नहीं है कि आंकड़े जुटाने के बाद क्या देश के 80 करोड़ गरीब नागरिकों की गरीबी रातों-रात खत्म हो जाएगी? क्या सरकारी स्कूलों की बदहाली सुधर जाएगी? क्या देश के युवाओं को रोज़गार मिल जाएगा?
एन. सिंह अपनी कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के समापन अध्याय में देश के सामने एक ऐसा ऐतिहासिक और ठोस ‘राष्ट्रीय समृद्धि का रोडमैप’ प्रस्तुत करते हैं, जो भारत को संकीर्ण जातिगत गणनाओं के दलदल से निकालकर 21वीं सदी की वास्तविक वैश्विक महाशक्ति बना सकता है।
गणना का भ्रम बनाम समृद्धि की ठोस ज़मीन
हमें यह स्पष्ट समझना होगा कि गणना (Census/Survey) केवल एक ‘साधन’ (Means) है, वह अपने आप में ‘साध्य’ (End) नहीं है।
- आंकड़े कभी रोटी नहीं बन सकते: आप किसी भूखे व्यक्ति से सौ बार कहिए कि तुम 52% में आते हो या 85% में आते हो, उसका पेट नहीं भरेगा। पेट भरने के लिए खेत में पानी, कारखाने में रोज़गार और हाथ में हुनर चाहिए।
- प्रतिभा का पलायन (Brain Drain): जब देश का श्रेष्ठतम युवा यह देखता है कि इस देश में उसकी योग्यता, प्रतिभा और पसीने का कोई मूल्य नहीं है, केवल उसकी जाति और कोटे का खेल चल रहा है—तो वह निराश होकर अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों की ओर भाग जाता है। आज अमेरिका की सिलिकॉन वैली, नासा और बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों का नेतृत्व भारतीय प्रतिभाएं कर रही हैं, जबकि भारत अपने ही देश में जातियों के सिर गिनने में उलझा हुआ है!
- औद्योगिक राष्ट्र ही महान बनते हैं: दुनिया के किसी भी देश ने केवल आरक्षण या सामाजिक समीकरणों के दम पर गरीबी दूर नहीं की है। अमेरिका, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन—इन सभी ने अपने हर नागरिक को विश्वस्तरीय प्राथमिक शिक्षा दी, भारी औद्योगीकरण किया, विनिर्माण (Manufacturing) को बढ़ाया और अपनी सीमाओं को अभेद्य बनाया।
केवल चुनावी गणना का रास्ता बनाम वास्तविक राष्ट्रीय समृद्धि का रास्ता
| क्षेत्र | संकीर्ण चुनावी गणना का मॉडल | एन. सिंह का राष्ट्रीय समृद्धि मॉडल |
|---|---|---|
| शिक्षा | जाति प्रमाण पत्र देखकर कोटे की सीटों पर प्रवेश | पहली से बारहवीं तक सभी के लिए समान, उच्च-गुणवत्तापूर्ण और मुफ्त शिक्षा |
| रोजगार नीति | सिकुड़ती सरकारी नौकरियों में 2% पदों की बंदरबांट | कृषि आधारित उद्योग, एमएसएमई और लाखों नए निजी विनिर्माण रोजगार |
| स्वास्थ्य | प्राइवेट अस्पतालों की लूट और लाचार सरकारी स्वास्थ्य केंद्र | जीडीपी का 5% स्वास्थ्य पर व्यय, हर नागरिक को मुफ्त संपूर्ण इलाज |
| राष्ट्रीय चेतना | नागरिकों को 4000 जातियों में बांटकर स्थायी गृहयुद्ध | ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की भावना, समरसता और अखंड भारतीय पहचान |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह का अंतिम राष्ट्रीय आह्वान
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ के उपसंहार—‘गणना से समृद्धि तक’ में लिखते हैं:
“भारत की महानता का पैमाना यह नहीं होगा कि हमने अपनी जातियों को कितने बारीक टुकड़ों में गिना है; भारत की महानता का पैमाना यह होगा कि हमने अपने देश के अंतिम बच्चे के हाथ में कितनी उत्तम शिक्षा और कितने पक्के अवसर दिए हैं। यदि हम केवल गिनती के खेल में ही उलझे रहे, तो 21वीं सदी की दुनिया हमें पीछे छोड़कर बहुत आगे निकल जाएगी। हमें ‘गिनती की राजनीति’ से ऊपर उठकर ‘समृद्धि की राजनीति’ की ओर बढ़ना होगा। जहाँ जन्म एक पहचान हो सकता है, लेकिन किसी के भाग्य का फैसला करने वाला अभिशाप नहीं! भारत को एक बार फिर से ‘सोने की चिड़िया’ नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, न्याय और शौर्य का ‘अमर सिंह’ बनाना होगा!”
— एन. सिंह (अनोखा भारत, पृष्ठ 288-289)
लेखक आगे भारत के युवाओं को संकल्प दिलाते हैं:
“उठो, और जातियों के इन संकीर्ण दायरों को तोड़कर बाहर निकलो! तुम केवल किसी जाति की संख्या नहीं हो, तुम उस भारत के निर्माता हो जिसने कभी पूरी दुनिया को ज्ञान का प्रकाश दिया था।”
— (अनोखा भारत, पृष्ठ 292)
भारत को विश्वशक्ति बनाने का पंचसूत्रीय महा-रोडमैप
- शिक्षा क्रांति (Universal Quality Education): केंद्रीय बजट का न्यूनतम 6% शिक्षा पर खर्च हो; प्राथमिक स्कूलों का ऐसा आधुनिकीकरण हो कि एक गरीब मजदूर और एक अरबपति का बच्चा एक ही छत के नीचे एक जैसा ज्ञान प्राप्त कर सकें।
- कृषि और ग्रामीण औद्योगीकरण: स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार एमएसपी की कानूनी गारंटी मिले; गाँव-गाँव में खाद्य प्रसंस्करण कारखाने लगें ताकि किसान कच्चा माल बेचने वाला नहीं, तैयार उत्पाद का निर्यातक बने।
- रोजगार सृजन और कौशल विकास: केवल क्लर्क बनाने वाली डिग्रियों के बजाय जर्मनी के ‘डुअल वोकेशनल ट्रेनिंग’ मॉडल की तर्ज पर हर 10वीं पास युवा को रोबोटिक्स, सोलर, इलेक्ट्रिकल, और ऑटोमेशन का व्यावहारिक कौशल दिया जाए।
- सख्त कानून और प्रशासनिक शुचिता: भ्रष्टाचार, पेपर लीक और दलबदल पर मृत्युदंड या आजीवन कारावास जैसे कठोर कानून हों; अदालतों में मुकदमों का फैसला अधिकतम एक वर्ष के भीतर अनिवार्य हो।
- सैनिक राष्ट्रवाद और चारित्रिक उत्थान: नागरिकों में राष्ट्र के प्रति त्याग, कर्तव्य-बोध और अनुशासन जगाने के लिए विद्यालयों से लेकर राजनीति तक अनिवार्य राष्ट्रीय सेवा का नियमन हो।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का अंतिम संदेश)
क्या हम जातियों की कतार में खड़े होकर केवल खैरात और कोटे की भीख मांगते रहेंगे, या अपने पसीने, अपनी प्रतिभा और अपने पुरुषार्थ के दम पर इस भारत को दुनिया का सबसे समृद्ध और शक्तिशाली राष्ट्र बनाएंगे?
भारत के भविष्य की इस संपूर्ण, निष्पक्ष और युगांतकारी योजना को आत्मसात करने के लिए एन. सिंह की कालजयी पुस्तक ‘अनोखा भारत’ का यह अंतिम अध्याय हर देशभक्त, शिक्षक, छात्र और राजनेता को बार-बार पढ़ना चाहिए।
भारत की महानता का पैमाना यह नहीं होगा कि हमने अपनी जातियों को कितने बारीक टुकड़ों में गिना है; भारत की महानता का पैमाना यह होगा कि हमने अपने देश के अंतिम बच्चे के हाथ में कितनी उत्तम शिक्षा और कितने पक्के अवसर दिए हैं।