'85 बनाम 15' का नारा — क्या सिर गिनने से पेट भरता है?
एन. सिंह · ·6 मिनट
भारतीय राजनीति के चुनावी मंचों पर पिछले तीन दशकों से एक नारा सबसे अधिक गूंजता रहा है—“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी!” और इसी के समानांतर खड़ा किया गया ‘85 बनाम 15’ का ध्रुवीकरण।
सतही तौर पर देखने पर यह नारा अत्यंत आकर्षक, लोकतांत्रिक और न्यायसंगत प्रतीत होता है। लोकतंत्र का सीधा अर्थ है—बहुमत का शासन। यदि देश में 85 प्रतिशत आबादी दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक वर्गों की है, तो देश के संसाधनों, सत्ता के गलियारों और नौकरियों पर उनका 85 प्रतिशत अधिकार होना ही चाहिए।
लेकिन राजनीति में जो नारे सबसे ऊँचे स्वर में लगाए जाते हैं, अक्सर उनके पीछे सबसे बड़ा छल छिपा होता है।
क्या हमने कभी एक पल ठहरकर यह पूछा है कि पिछले तीन दशकों में इस नारे के सहारे कई दल पूर्ण बहुमत से सत्ता में आए, कई मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री बने, अरबों-खरबों के बजट पास हुए—परंतु उस 85 प्रतिशत के भीतर का सबसे कमज़ोर, भूमिहीन, अनपढ़ और मजदूरी करने वाला इंसान आज भी वहीं क्यों खड़ा है, जहाँ वह पचास साल पहले खड़ा था?
नारे का आंतरिक छल: 85% के भीतर का अदृश्य विभाजन
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ में इस नारे की परत-दर-परत पड़ताल करते हुए बताते हैं कि ‘85 प्रतिशत’ कोई एक संगठित, समरूप या एकरस समाज नहीं है। यह सैकड़ों जातियों और उपजातियों का एक ऐसा जटिल ताना-बाना है, जिसमें भयंकर आंतरिक असमानता और शोषण विद्यमान है:
- दबंग पिछड़ी जातियों का एकाधिकार: 85% के नाम पर जब सत्ता मिलती है, तो सत्ता की मलाई और सरकारी ठेके उस वर्ग की केवल एक या दो संख्या-बल में मजबूत और आर्थिक रूप से संपन्न जातियों के हाथ में सिमट कर रह जाते हैं। अत्यंत पिछड़ी जातियां (EBC) और अति-दलित आज भी केवल झंडे उठाने और जिंदाबाद के नारे लगाने के लिए इस्तेमाल होते हैं।
- सिर गिनने बनाम पेट भरने का विरोधाभास: संसद या विधानसभा में जातियों के सिर गिनने से किसी गरीब के चूल्हे में रोटी नहीं पकती। यदि सरकारी अस्पताल में डॉक्टर नहीं है, यदि प्राथमिक स्कूल में छत टपक रही है, और यदि नौजवान को रोजगार नहीं मिल रहा—तो सत्ता में बैठे नेता की जाति चाहे जो हो, पीड़ित 85% का गरीब ही होता है!
- ‘15 प्रतिशत’ को खलनायक बनाकर अपनी विफलता छिपाना: जब नेता अपने क्षेत्र में स्कूल, नहर, सड़क और उद्योग लगाने में नाकाम रहते हैं, तो वे अपनी नाकामी छुपाने के लिए तुरंत ‘15 प्रतिशत’ (कथित सवर्णों) को खलनायक के रूप में पेश करने लगते हैं ताकि जनता अपनी बुनियादी समस्याओं को भूलकर नफ़रत की आग में जलती रहे।
संख्या-बल बनाम योग्यता और संस्थागत पतन
| कसौटी | ‘85 बनाम 15’ की संकीर्ण राजनीति | राष्ट्र-निर्माण का व्यापक दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| सत्ता का आधार | केवल संख्या-बल और जातिगत गोलबंदी | योग्यता, जनसेवा, विजन और नैतिक आचरण |
| विकास का पैमाना | किस जाति के कितने मंत्री और अधिकारी बने | देश में प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य और शिक्षा का स्तर |
| आंतरिक न्याय | 85% के भीतर की शक्तिशाली जातियों का वर्चस्व | पंक्ति के अंतिम, सबसे दुर्बल और शोषित व्यक्ति की सुरक्षा |
| दीर्घकालिक परिणाम | समाज का स्थायी विखंडन, प्रतिभा पलायन और आक्रोश | सामाजिक बंधुत्व, राष्ट्रीय एकता और समावेशी समृद्धि |
किताब से कड़वा सच: एन. सिंह की तीखी टिप्पणी
लेखक एन. सिंह अपनी पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक’ के अध्याय ‘संख्या और सत्ता’ में लिखते हैं:
“85 बनाम 15 का नारा न्याय का उद्घोष कम और सत्ता की सौदेबाजी का गणित ज्यादा बन चुका है। जब संख्या ही योग्यता, अधिकार और न्याय का एकमात्र पैमाना बन जाए, तो प्रतिभा, परिश्रम और चरित्र तीनों एक साथ आत्महत्या कर लेते हैं। इस नारे ने शोषितों को वास्तविक मुक्ति का मार्ग दिखाने के बजाय उन्हें केवल वोट-बैंक की सुरक्षित तिजोरियों में बंद कर दिया है। नेता अपनी संतानों को विदेशों में पढ़ाते हैं, अकूत संपत्तियां बनाते हैं, और गरीब के बेटे के हाथ में ‘85 बनाम 15’ की तख्ती थमाकर उसे सड़कों पर लाठियां खाने के लिए छोड़ देते हैं।”
— एन. सिंह (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 48-49)
लेखक आगे सवाल उठाते हैं:
“यदि केवल संख्या-बल से समाज का कल्याण संभव होता, तो जिस बिहार और उत्तर प्रदेश में दशकों तक 85% की राजनीति करने वाली सरकारों का शासन रहा, वहाँ से लाखों मजदूर आज भी गुजरात, पंजाब और महाराष्ट्र के कारखानों में अपमानजनक परिस्थितियों में मजदूरी करने पर विवश क्यों हैं? सत्ता पाई नेताओं ने, और पलायन का दंश झेला उसी 85% के गरीब बेटे ने!”
— (गिनती से सत्ता तक, पृष्ठ 52)
वास्तविक हिस्सेदारी कैसे मिले? चार ठोस बिंदु
- 85% के भीतर ‘अंतिम व्यक्ति’ की पहचान: आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं का उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) अनिवार्य रूप से लागू किया जाए ताकि उन अति-पिछड़ी जातियों तक लाभ पहुँचे जिन्हें आज तक कोई अवसर नहीं मिला।
- उत्पादन के साधनों पर वास्तविक अधिकार: केवल सरकारी नौकरियों के 2-3 प्रतिशत पदों के लिए लड़ने के बजाय कृषि, छोटे उद्योग, विनिर्माण और आधुनिक तकनीकी कौशल में युवाओं को सक्षम बनाया जाए ताकि वे रोजगार मांगने वाले नहीं, रोजगार देने वाले बनें।
- नफ़रत की राजनीति का खात्मा: किसी भी समुदाय के 15% को स्थायी शत्रु घोषित करके कोई भी समाज शांत और समृद्ध नहीं रह सकता। राष्ट्र का निर्माण पारस्परिक सम्मान और सहयोग से होता है, स्थायी गृहयुद्ध जैसी मानसिकता से नहीं।
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लोकतंत्रीकरण: जब गाँव के गरीब बच्चे को भी दिल्ली या मुंबई के संभ्रांत बच्चों जैसी कोडिंग, विज्ञान और अंग्रेजी की शिक्षा मिलेगी, तब उसे किसी के रहमोकरम या नारे की आवश्यकता नहीं होगी; वह अपने पराक्रम से पूरी दुनिया जीत लेगा।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
क्या हम एक ऐसा लोकतंत्र चाहते हैं जहाँ हमारा अस्तित्व केवल एक संख्या बनकर रह जाए, या एक ऐसा राष्ट्र जहाँ हर नागरिक—चाहे वह किसी भी प्रतिशत में आता हो—समान गरिमा और अवसर के साथ जी सके?
नारों के मायाजाल से परे भारतीय राजनीति के इस निर्मम गणित को समझने के लिए एन. सिंह की पुस्तक ‘गिनती से सत्ता तक: भारत का अनकहा युद्ध’ का यह अध्याय आपकी राजनीतिक समझ को पूरी तरह झकझोर देगा।
85 बनाम 15 का नारा न्याय का उद्घोष कम और सत्ता की सौदेबाजी का गणित ज्यादा बन चुका है। जब संख्या ही योग्यता और अधिकार का एकमात्र पैमाना बन जाए, तो प्रतिभा और परिश्रम दोनों आत्महत्या कर लेते हैं।