सारनाथ और धर्मचक्र प्रवर्तन — अति-तप और अति-भोग के बीच का 'मध्यम मार्ग'
एन. सिंह · ·3 मिनट
गया के उरुवेला (बोधगया) में बोधिवृक्ष के नीचे जब सिद्धार्थ गौतम को सम्यक संबोधि (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त हुआ, तो वे ‘तथागत’ और ‘बुद्ध’ कहलाए।
ज्ञान प्राप्त करने के बाद वे सबसे पहले कहाँ गए?
वे काशी के समीप ऋषिपत्तन (वर्तमान सारनाथ) के मृगदाव (हिरणों के उपवन) में पहुँचे।
वहाँ वे अपने उन पाँच पुराने साथियों (कौंडिन्य, वाष्प, भद्रिक, महानाम और अश्वाजित) से मिले, जो कभी उन्हें इसलिए छोड़कर चले गए थे क्योंकि बुद्ध ने कठोर उपवास छोड़कर सुजाता की खीर खा ली थी और उन साथियों को लगा था कि “गौतम भ्रष्ट हो गया है!”
आषाढ़ पूर्णिमा की उस पवित्र संध्या को सारनाथ की धरती से तथागत ने दुनिया का पहला ऐतिहासिक उपदेश दिया, जिसे बौद्ध परंपरा में ‘धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त’ (धर्मचक्र प्रवर्तन) कहा जाता है।
दो अंत (अति) और बीच का मार्ग
अपनी पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ में लेखक नथुनी सिंह इस ऐतिहासिक उपदेश की दार्शनिक गहराई को समझाते हैं।
बुद्ध ने उन पाँचों भिक्षुओं से कहा: “भिक्षुओं! साधक को दो अतियों (Extremes) से बचना चाहिए—
- पहला अति: इंद्रियों के भोग-विलास और वासनाओं में आकंठ डूबे रहना, जो हीन, ग्राम्य और विनाशकारी है।
- दूसरा अति: शरीर को तपाना, उपवासों से सुखाना, कांटों पर लेटना और काया-क्लेश करना, जो पीड़ादायक और व्यर्थ है।“
बुद्ध ने कहा कि इन दोनों अतियों को छोड़कर तथागत ने ‘मध्यम मार्ग’ (मज्झिमा पटिपदा) का आविष्कार किया है, जो आंखें खोलता है, ज्ञान देता है, शांति देता है और निर्वाण तक ले जाता है।
और वह मध्यम मार्ग क्या है? ‘आर्य अष्टांगिक मार्ग’ (Eightfold Path):
- सम्यक दृष्टि (Right View)
- सम्यक संकल्प (Right Resolve)
- सम्यक वाक (Right Speech)
- सम्यक कर्म (Right Action)
- सम्यक आजीव (Right Livelihood)
- सम्यक व्यायाम/प्रयत्न (Right Effort)
- सम्यक स्मृति/होश (Right Mindfulness)
- सम्यक समाधि (Right Concentration)
किताब से कड़वा सच
“बुद्ध से पहले भारत में धर्म का अर्थ या तो यज्ञों में आहुति देना और पशुबलि करना था, या फिर जंगलों में जाकर शरीर को भूख-प्यास से तड़पाना था। बुद्ध ने पहली बार धर्म को ‘नैतिक आचरण’ और ‘मानसिक संतुलन’ की ज़मीन पर उतारा। उन्होंने कहा कि मुक्ति किसी देवता की कृपा से नहीं, बल्कि अपने ही विचारों और कर्मों को सम्यक (संतुलित) बनाने से मिलती है। सारनाथ की वह गूँज केवल भारत की नहीं, बल्कि समूचे विश्व के नैतिक जागरण की शुरुआत थी।”
— ‘बुद्ध धम्म और भारत’ (भाग-१, पृष्ठ 18-21)
असली समाधान क्या है?
- आधुनिक जीवन में संतुलन: न तो धन कमाने की अंधी हवस में अपना स्वास्थ्य और परिवार खोएं, और न ही सब कुछ छोड़कर पलायनवादी बनें। काम और विश्राम के बीच संतुलन बनाएं।
- सम्यक आजीविका: धन केवल उस काम से कमाएं जिससे किसी दूसरे प्राणी, समाज या पर्यावरण को नुकसान न पहुँचता हो।
- सम्यक होश (Mindfulness): जो भी काम करें—खाएं, चलें, बोलें—उसे पूरी जागरूकता और उपस्थिति के साथ करें, मशीनी रोबोट की तरह नहीं।
एक विचारणीय सवाल (पुस्तक का संदेश)
आज जब पूरी दुनिया तनाव, डिप्रेशन, अनियंत्रित उपभोक्तावाद और मानसिक रोगों की चपेट में है, तो क्या बुद्ध का 2500 साल पुराना यह ‘मध्यम मार्ग’ हमारी सबसे बड़ी जीवन-संजीवनी नहीं है?
सारनाथ के इस ऐतिहासिक दर्शन को सरल भाषा में समझने के लिए पुस्तक ‘बुद्ध धम्म और भारत’ का यह अंश अवश्य पढ़ें।
वीणा के तारों को इतना मत खींचो कि वे टूट जाएं, और इतना ढीला भी मत छोड़ो कि उनसे संगीत ही न निकले। यही मज्झिमा पटिपदा (मध्यम मार्ग) है—न भोग में डूबना, न शरीर को सुखाना; बल्कि संतुलित होश में जीना।